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वायरल वीडियोः नोटबंदी पर जवाब देती भाजपा दलित विरोधी बन गई

भारतीय जनता पार्टी की ओर से पोल खोल कैम्पेन के नाम से कुछ वीडियो जारी किए गए हैं. वीडियो में जिस महिला नेता को अत्यधिक विचलित और आवेशित दिखाया गया है, उसके हेयरस्टाइल से लेकर चेहरा और संकेत बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती से मिलता जुलता है.

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नोटबंदी पर बीजेपी ने जारी किया वीडियो
नोटबंदी पर बीजेपी ने जारी किया वीडियो

भारतीय जनता पार्टी की ओर से पोल खोल कैम्पेन के नाम से कुछ वीडियो जारी किए गए हैं. ये वीडियो आठ नवंबर को एंटी ब्लैकमनी डे की थीम पर आधारित हैं. इन वीडियो के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी उन बातों और लोगों की ओर इशारा करना चाहती है जिनपर, भाजपा के मुताबिक, नोटबंदी की सबसे तगड़ी मार पड़ी है.

लेकिन इस वीडियो को देखने के बाद कहानी कुछ और ही समझ में आती है. वीडियो में जिस महिला नेता को अत्यधिक विचलित और आवेशित दिखाया गया है, उसके हेयरस्टाइल से लेकर चेहरा और संकेत बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती से मिलता जुलता है.

इस वीडियो में महिला के पीछे किताबों की अलमारी है और मेज पर दो हाथी. चेहरे मोहरे और तेवर में मायावती जैसी ही उग्रता है. हालांकि भाषा संयम की सीमा से बाहर की है और दंभ से भरी हुई. मायावती के बारे में ऐसे कथित चुटकुले राजनीतिक गलियारों में सुनने को मिलते रहे हैं.

महिला नोटबंदी के विरोध में बोल रही है. उसे अफसोस है कि उसके पास जो कुछ सैकड़ों करोड़ रुपए थे, वो नोटबंदी की भेंट चढ़ गए. ऐसी कहानियां बसपा सुप्रीमो के बारे में नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिपेक्ष्य में कही जा रही थीं.

वीडियो की राजनीति

एक बात तो है कि भाजपा का यह वीडियो मायावती विरोधी समाज पसंद करेगा. खासकर अगड़ों में इसे एक जातीय जीत की तरह प्रसारित होते देखा जा सकेगा. लोग कहेंगे कि देखो कैसे चित्त कर दिया इस दलित नेत्री को जो पैसे के दम पर राजनीति करती आ रही थी.

लेकिन इसी वीडियो में एक अंतर्विरोध है कि दलितों को रिझाने में लगी भाजपा के जो नए-नए दलित समर्थक बने हैं, उन्हें इस तरह से मायावती का उपहास नागवार गुज़र सकता है.

यह भी आश्चर्यजनक है कि मायावती पर भाजपा का ताज़ा हमला ऐसे समय में हो रहा है जब वो राजनीतिक रूप से कमज़ोर और हाशिए पर नज़र आ रही हैं. दरअसल, अगड़ों को नोटबंदी की जो चोट लगी है, भाजपा उसे जाति संघर्ष में दलित पहचान वाली नेता के बड़े नुकसान के नेरेटिव में बदलने की कोशिश कर रही है. यह वही नेरेटिव है जिसका सुख उन गरीबों को मिल रहा था, जो नोटबंदी के बाद यह सोचकर खुश थे कि अमीरों के तो और भी ज़्यादा बड़े खजाने बेकार हो गए हैं.

मायावती गुजरात में बहुत प्रासंगिक नहीं हैं, ना ही दलितों की आबादी गुजरात में बहुत बड़ी और निर्णायक है. हां मगर मोदी जी मायावती को चोट की कहानी अगड़ों को सुनाकर शायद कहना चाहते हैं कि दुनिया में कितना ग़म है, तेरा ग़म कितना कम है.

भाजपा को यह भी लगता है कि दलित नेता की छवि का यह परिहास अगर विपक्ष चुनाव में मुद्दा बनाकर आगे बढ़ने की कोशिश करेगा तो इससे जातीय ध्रुवीकरण को बल मिलेगा और भाजपा फायदे में रहेगी. लेकिन भाजपा यह भूल रही है कि राजनीतिक विपक्ष के अतिरिक्त अगर अन्य तरीकों से यह वीडियो दलितों के बीच वायरल होता है तो भाजपा में दलितों की नई आमद भाजपा के खिलाफ जा सकती है.

एक बड़े फायदे के लिए और एक बड़ा फायदा बताने की कोशिश में भाजपा कठिन दांव खेल गई है. देखते हैं ये दांव सही पड़ता है या उल्टा.

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