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नोटबंदी: डिजिटल पेमेंट ने बढ़ाई छोटे व्यापारियों की मुसीबत, लोग परेशान

नोटबंदी को लेकर जहां मोदी सरकार इसे सही कदम बता रही है, वहीं इसके बारे में छोटे व्यापारियों और आम लोगों की क्या राय है, यह जानना जरूरी है. पढ़ें पूरी खबर...

प्रतिकात्मक तस्वीर प्रतिकात्मक तस्वीर

नोटबंदी को एक साल पूरा होने वाला है. लेकिन इस एक साल के दौरान लोगों को कई कड़वे अनुभव हुए. आज हम आपको ऐसे ही लोगों के बारे में बताएंगे, जिनके लिए नोटबंदी एक बुरा सपना साबित हुआ.

सबसे पहले बात लक्ष्मीनगर में रहने वाले प्रमोद की. प्रमोद पेशे से इंश्योरेंस एडवाइजर हैं. पिछले साल लागू हुई नोटबंदी के बाद प्रमोद ने भी अपने पेशे में डिजिटल पेमेंट को तवज्जो देना शुरू कर दिया था. लेकिन बीते महीने इनके साथ जो हुआ, उसने कैशलेस ट्रांजेक्शन के बारे में इनके सोचने का नजरिया बदल दिया.

अक्टूबर में प्रमोद ने कार्ड से एक पॉलिसी का पेमेंट किया था. इसके बाद रकम प्रमोद के खाते से तो कट गई, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी को नहीं मिली. तब से प्रमोद कई बार बैंक के कस्टमर केयर में फोन कर चुके हैं और कई बार बैंक के चक्कर लगा चुके हैं. लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी इनके खाते से निकली रकम इन्हें नहीं मिली है. अब प्रमोद पूछ रहे हैं कि उनका पैसा आखिर गया तो गया कहां. प्रमोद कहते हैं कि वो जिंदगी में डिजिटल पेमेंट नहीं करेंगे. सब कैश में ही करेंगे. प्रमोद के मुताबिक बैंक ने उनसे फॉर्म तो भरवा लिया, लेकिन कोई बताने को तैयार नहीं कि पैसा कहां गया.  

प्रमोद अकेले नहीं, जिनको नोटबंदी ने परेशान किया. शाहदरा में किराने की थोक दुकान चलाने वाले बालकिशन शर्मा के मुताबिक पिछले साल 8 नवम्बर तक सब ठीक था. लेकिन नोटबंदी ने कमर तोड़कर रख दी है. नोटबंदी लागू होने के बाद के कुछ महीने तो बहुत ही भारी गुजरे, लेकिन अब साल भर बाद कहीं जाकर संभल पाए हैं. हालांकि बालकिशन बताते हैं कि व्यवसाय में घाटा ही चल रहा है, क्योंकि लोग अब नोट कम रखते हैं. जबकि इनका धंधा कैश पर ज्यादा चलता है.  

घोंडा में रेस्टोरेंट चलाने वाले राहुल चौधरी की कहानी भी कुछ अलग नहीं. नोटबंदी लागू होने के बाद  Paytm से लेकर सभी बैंकों के डेबिट और क्रेडिट कार्ड लेने की शुरुआत की, जिसकी तस्वीर इनके काउंटर पर चिपके इन पोस्टरों से झलकती है. लेकिन मलाल इस बात का है कि हर ग्राहक Paytm लेकर नहीं आता. इसलिए अभी भी कैश पर ही जोर रहता है. राहुल के मुताबिक रेस्टोरेंट में पहले पैर रखने की जगह नहीं होती थी. लेकिन अब इक्का-दुक्का लोग ही आ रहे हैं. उनमें से ज्यादातर वो जो सिर्फ समोसा, चाय और कोल्डड्रिंक पीकर ही चले जाते हैं. लिहाजा अब स्टाफ की सैलरी देने के भी वांदे हैं.

साफ है कि सरकार भले ही आंकड़ों को दिखाकर नोटबंदी को सही बताने और अर्थव्यवस्था के सही पटरी पर होने की बात कर रही है, लेकिन छोटे और मझले व्यापारियों का बजट पटरी से उतरा हुआ ही दिख रहा है. 

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