Patan Assembly Seat Result: छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. राज्य में सभी की नजर पाटन विधानसभा सीट पर थी. यहां से भूपेश बघेल चुनाव मैदान में थे. उनके सामने उनके ही भतीजे बीजेपी प्रत्याशी विजय बघेल थे. इस दिलचस्प मुकाबले में चाचा ने भतीजे को पटखनी दी है.
बता दें कि जिस दुर्ग जिले में पाटन विधानसभा सीट है वहां सबसे ज्यादा ओबीसी समुदाय के मतदाता हैं. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद ओबीसी समाज से आते हैं. आंकड़ों के मुताबिक पाटन में 1.93 लाख मतदाताओं में से 35 फीसदी साहू हैं जबकि कुर्मी मतदाता 30% के करीब हैं. वहीं अनुसूचित जाति में आने वाले सतनामी समुदाय की भी वोटिंग में 15% हिस्सेदारी है. बता दें कि ओबीसी के दो प्रमुख समुदाय- कुर्मी और साहू छत्तीसगढ़ की आबादी का लगभग 36% हिस्सा हैं. ओबीसी वोटरों पर भूपेश बघेल की काफी मजबूत पकड़ मानी जाती है.
भूपेश बघेल का राजनीतिक करियर
अगर भूपेश बघेल की राजनीतिक करियर की बात करें तो जब 80 के दशक में छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था, भूपेश बघेल ने उसी समय यूथ कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. दुर्ग जिले के रहने वाले भूपेश बघेल जल्द ही अपनी राजनीतिक समझ की वजह से यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए थे.
1994-95 में भूपेश बघेल को मध्यप्रदेश यूथ कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. 1993 में जब मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो भूपेश कांग्रेस से दुर्ग की पाटन सीट से उम्मीदवार बने और जीत दर्ज की. इसी सीट पर इस बार उनके अपने भतीजे विजय बघेल उन्हें चुनौती दे रहे हैं. छत्तीसगढ़ जब मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था तो पाटन से चुनाव जीतने के बाद भूपेश बघेल दिग्विजय सिंह की सरकार में मंत्री भी बने थे.
2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और पाटन छत्तीसगढ़ का हिस्सा बना, तो भूपेश छ्त्तीसगढ़ विधानसभा पहुंचे. वहां भी वो कैबिनेट मंत्री बने. 2003 में कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हो गई, तो भूपेश को विपक्ष का उपनेता बनाया गया. हालांकि साल 2004 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो भूपेश बघेल को कांग्रेस ने दुर्ग से उम्मीदवार बनाया लेकिन बीजेपी के ताराचंद साहू ने उन्हें करीब 65 हजार वोटों से मात दे दी थी.
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनकी सीट बदली और राजधानी रायपुर से चुनाव लड़वाया. इस बार उनके सामने रमेश बैश थे. रमेश बैश के हाथों भी उन्हें हार का सामने करना पड़ा था जिसके बाद अक्टूबर 2014 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. बीते विधानसभा चुनाव (2018) में उन्होंने रमण सिंह के सरकार को उखाड़ फेंका था और कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई थी.