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इस बार के चुनाव में दानापुर दियारा भी एक मुद्दा, लोगों ने बयां किया दर्द

बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में पटना के दानापुर विधानसभा में 3 नवम्बर को वोटिंग होनी है. सियासी उठापटक के बीच अब क्षेत्रों के हिसाब से मुद्दे भी हावी होते जा रहे हैं. इस बार के चुनाव में दानापुर दियारा भी एक मुद्दा है और नेता इस मुद्दे को लेकर चुनावी मैदान में हैं.

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शहर से जुड़ने का साधन पीपापुल या फिर नाव की खतरनाक सवारी (फोटो आजतक)
शहर से जुड़ने का साधन पीपापुल या फिर नाव की खतरनाक सवारी (फोटो आजतक)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पटना के दानापुर विधानसभा में 3 नवम्बर को वोटिंग
  • नेता इस मुद्दे को लेकर चुनावी मैदान में


बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में पटना के दानापुर विधानसभा में 3 नवम्बर को वोटिंग होनी है. सियासी उठापटक के बीच अब क्षेत्रों के हिसाब से मुद्दे भी हावी होते जा रहे हैं. इस बार के चुनाव में दानापुर दियारा भी एक मुद्दा है और नेता इस मुद्दे को लेकर चुनावी मैदान में हैं. मगर इन सब के बीच दानापुर दियारा के लोगों का दर्द एक बार फिर से उभरकर सामने आ रहा है.  

दानापुर दियारा जहां आज भी लोगों को विकास की उम्मीद है. यहां नदी के कटाव में दर्जनो गांव बह गए.  यहां की आबादी का एक मात्र पीपापुल ही सहारा है. शहर से जुड़ने का साधन पीपापुल या फिर नाव की खतरनाक सवारी है. पीपापुल तो अभीं नहीं है नाव ही इन लोगों का सहारा बना है तो सुबह नाव से खुद को साथ में अपनी बाइक को नाव पर लादकर दानापुर लाते है और फिर शाम को फिर से नाव पर लादकर वापस दियारा अपने घर ले जाते है. यहां एक पक्के पुल की मांग एक बार फिर से जोरों पर है.

पक्के पुल की मांग 

गंगा में बह चुके दियारा के अनेकों गांव के लोगों को दानापुर के प्रखंड कार्यालय में शरण दी गई. नेताओं के द्वारा वादा किया गया की 3 डेसिमिल जीमप दी जाएगी. जमीन देकर दियारा के विस्थापितों को कही बसाया जाएगा  मगर वादे, वादे बनकर ही रह गए न तो इनको जमीन मिला और न ही कोई नेता इनका हालचाल जानने आए टूटे-फूटे झोपडियों में रह रहे लोगों का अपना ही दर्द है। इनके लिए न तो शौचालय है और न ही ठीक से पीने के पानी की व्यवस्था है.

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बरसात के दिनों में इन लोगों के हाल बहुत बुरे हो जाते हैं. अब ये लोग किसी को भी वोट नहीं देने का मन बना चुके है. दियारा से विस्थापित संजू देवी बताती है कि कोई नेता हम लोगों की नहीं सुनता है. नेता चुनाव में आते हैं तो कहते है कि आप लोगों के लिए हम जमीन देगें, लेकिन इनका वादा सिर्फ चुनावी मौसम में होता है फिर वे लोग भूल जाते है. वहीं दियारा से विस्थापित संजय बताते हैं कि गरीब को कौन पूछता है. नेता आते हैं. वोट मांगते हैं, वादा करते है और चले जाते हैं. इसके बाद इन लोगों को हम लोग पांच साल बाद याद आते है.

(इनपुट- मनोज सिंह)

 

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