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बिहार के चुनावी मुद्दों का आज भी केंद्रबिंदु है भिखारी ठाकुर की ‘बिदेसिया’ का नायक!

भोजपुरी नाटककार भिखारी ठाकुर के अमर नाटक बिदेसिया का नायक बेरोजगारी की समस्या के बीच पलायन के मुद्दे को रेखांकित करता है. आज दशकों बाद भी बिहार चुनाव में बेरोजगारी ही प्रमुख मुद्दा है. क्यों नहीं बदलते जमीनी हालात और क्यों मची है सियासी रार?

बिहार चुनाव में अहम है रोजगार का मुद्दा बिहार चुनाव में अहम है रोजगार का मुद्दा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा फिर उछला
  • कोरोना संकट और लॉकडाउन ने और बढ़ा दी समस्या
  • चुनाव से पहले सभी दलों ने की वादों की बौछार

भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के अमर नाटक 'बिदेसिया' का नायक लंबी बेरोजगारी और घर के बिगड़ते आर्थिक हालात का सामना करने के लिए परदेस जाता है. उसके परिवार से दूर रहने के वियोग, कोलकाता जैसे बड़े शहर में उसके संघर्ष और फिर परिवार के एक होने की कहानी है बिदेसिया. जो दशकों से थिएटर की दुनिया में अजर-अमर है तो साथ ही आज भी बिहार की बुनियादी समस्याओं और जमीनी हालात की तस्वीर को भी बयां करता है.

करीब 12 करोड़ की आबादी वाला बिहार मुख्यत: ग्रामीण अर्थव्यवस्था आधारित राज्य है. यहां कई दशकों से बढ़ती बेरोजगारी, चौपट उद्योग-धंधे, काम-धंधों के लिए देश के बड़े शहरों की ओर पलायन बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. हर दल इस समस्या को दूर करने का वादा कर सत्ता में आता है लेकिन हालात सुधरे नहीं और दशकों से हालात जस के तस हैं.

हर चुनाव में उछलता है बेरोजगारी का मुद्दा
बिहार के हर चुनाव में बेरोजगारी का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहता है. राज्य में व्यापार और उद्योगों में रोजगार सृजन की पर्याप्त क्षमता के अभाव के कारण राज्य में रोजगार के अवसरों की कमी है. आर्थिक जगत की संस्था CMIE के सर्वे के अनुसार अप्रैल 2020 में बिहार में बेरोजगारी की दर 46.6 फीसदी थी. यह संख्या राष्ट्रीय दर से लगभग दोगुनी है. कोरोना संकट ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है.

जमीनी स्तर पर क्या हैं हालात?
मार्च में लॉकडाउन लगने के बाद बड़े शहरों में कल-कारखानों में कामकाज बंद हुए तो गांवों की ओर भागती प्रवासी मजदूरों की भीड़ को पूरे देश ने देखा. तब से अबतक 40 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर बिहार लौटे. जाहिर है मनरेगा के अलावा स्थानीय तौर पर लोगों के पास-कामकाज के सीमित साधन हैं. प्रवासी मजदूरों के लौटने के बीच 5 महीने में 11.22 लाख नए जॉब कार्ड बने हैं लेकिन मनरेगा हर तरह के रोजगार का विकल्प नहीं बन सकता.

ग्रामीण इलाकों में असर ज्यादा
एक साथ तीन समस्याएं- कोरोना संकट, लॉकडाउन और फिर बाढ़ बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करने वाला साबित हो रहा है क्योंकि प्रवासी मजदूरों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होता है करीब 30 फीसदी. उनके द्वारा घर वापस भेजे गए पैसों से हीं ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलती है. घर लौटे मजदूरों को खेती-बारी में काम मिल सकता था लेकिन कई इलाकों में बाढ़ के कारण फसलों को नुकसान पहुंचा और खेती का काम भी प्रभावित हुआ है.

फिर लौटने लगे मजदूर
बिहार में जहां पलायन का मुद्दा चिंता का विषय है वहीं बिहार के प्रवासी मजदूर दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना जैसे कई राज्यों के लिए फायदेमंद हैं. बल्कि अब तो फिर से लॉकडाउन खुलने के साथ ही मजदूरों से भरी ट्रेनें वापस शहरों की ओर लौटने लगी हैं. लेकिन चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे बेरोजगारी के मुद्दे पर सियासी टकराव भी बिहार में तेज हो रहा है.

रोजगार के मुद्दे पर सियासी टकराव
15 साल के शासन के बाद फिर नीतीश सरकार इस मुद्दे पर घिरी हुई है. घर लौटे प्रवासी मजदूरों की स्किल मैपिंग और 75 उद्योगों में उन्हें रोजगार दिलाने के कई प्लान का ऐलान भी नीतीश सरकार ने किया है. लेकिन विपक्ष इन कोशिशों को अपर्याप्त बता रहा है. चुनाव से ठीक पहले आरजेडी ने बेरोजगारी पर पोर्टल शुरू किया है साथ ही ऐलान किया है कि अगर राज्य में आरजेडी की सरकार आई तो विभिन्न विभागों में खाली पड़े 4 लाख पदों को भरा जाएगा.

लेकिन करोड़ों रोजगार की बाट जोह रहे बिहार के युवाओं के लिए ये कोशिशें कितनी पर्याप्त होंगी? बिहार के लोग चाहते हैं कि रोजी-रोटी के विकल्प स्थानीय तौर पर ही पैदा हों और 'विदेसिया' को अपने घर के वियोग से फिर न गुजरना पड़े. लेकिन जातिवाद की सियासी गोटी पर हर चुनाव में फैसले करने वाले बिहार में चुनाव में इस बार रोजगार के वादे वोटरों को कितना लुभाएंगी, ये तो वक्त ही बताएगा. 

 

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