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कांग्रेस, राजद, जेडीयू, हर नांव पर सवार हो चुके हैं जीतनराम मांझी, ऐसा रहा सियासी सफर

बिहार की ऐसी कोई बड़ी पार्टी नहीं है जिसमें जीतनराम मांझी नहीं रहे हों. 1980 में उन्हें अपना पहला चुनाव लड़ने के साथ ही मंत्री बनने का मौका मिला था. इसके बाद मांझी को अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी (PTI फोटो) बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी (PTI फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार के दलित चेहरे के तौर पर मांझी की पहचान
  • लालू से लेकर नीतीश की कैबिनेट में रहे मंत्री
  • नौ माह तक संभाला बिहार के मुख्यमंत्री का पद

जीतनराम मांझी वैसे तो बीते तीन दशक से बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन उन्हें व्यापक पहचान मई 2014 में मिली जब अचानक से नीतीश कुमार ने उन्हें सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया. जीतन राम मांझी बिहार में दलित चेहरे के तौर जाने जाते हैं. साल 2015 में नीतीश से अलग होने के बाद उन्होंने हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा नाम की पार्टी बनाई थी. हालांकि एक बार फिर वह नीतीश के पाले में जाने के लिए तैयार हैं.

कांग्रेस से साथ शुरू हुआ सफर

जीतनराम मांझी ने साल 1980 में कांग्रेस के साथ अपने सियासी सफर की शुरुआत की थी. इसके बाद बिहार की ऐसी कोई बड़ी पार्टी नहीं है जिसमें जीतनराम नहीं रहे हों. 1980 में उन्हें अपना पहला चुनाव लड़ने के साथ ही मंत्री बनने का मौका मिला था. इसके बाद मांझी को अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा था. साल 1985 में भी दोबारा जीते, लेकिन 1990 में फतेहपुर सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से उन्हें पराजय झेलनी पड़ी थी.

साल 1990 में हार के बाद मांझी जनता दल में शामिल हुए लेकिन 1996 में जनता दल टूट गया और लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी आरजेडी बना ली. जीतन राम मांझी भी लालू प्रसाद यादव के साथ चले गए और 1996 में बाराचट्टी विधानसभा सीट से विजयी हुए और विधायक बने. पिछले चार दशकों में मांझी कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू की सरकारों में मंत्री रह चुके हैं. राबड़ी देवी की सरकार में भी जीतनराम मंत्री बने और साल 2005 तक आरजेडी में रहे.

नीतीश ने बनाया मुख्यमंत्री

मांझी ने 2005 के चुनाव में RJD को मिली हार के बाद नीतीश कुमार की जेडीयू का दामन थाम लिया और उनके करीबी बन गए. इसके बाद उन्हें 2008 में नीतीश सरकार में मंत्री बनाया गया. साल 2010 मेंके चुनाव में मांझी को मखदुमपुर विधानसभा सीट से जीत हासिल हुई. नीतीश के भरोसेमंद बने रहने का फायदा उन्होंने 2014 में हुआ जब सीएम के पद से इस्तीफा देकर नीतीश कुमार ने अपनी कुर्सी उन्हें सौंपी. हालांकि जब नीतीश ने बाद में उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा तो वो चुनौती बनकर उनके सामने खड़े हो गए, लेकिन आखिर में उन्हें ही मात खानी पड़ी. 

एनडीए से लेकर महागठबंधन तक में उन्हें अनदेखी झेलनी पड़ी है. जेडीयू से निकाले जाने के बाद उन्होंने महागठबंधन का हाथ भी थामा लेकिन जल्द ही मांझी वहां से भी बाहर आ गए. अब एक बार फिर मांझी बिहार चुनाव से पहले नीतीश की नांव पर सवार होने जा रहे हैं.
कठपुतली सरकार के आरोप 

बिहार में मांझी को सीएम बनाने के फैसले को लेकर नीतीश कुमार भी खूब आलोचना भी हुई थी. तब विपक्षी दल बीजेपी ने मांझी को कठपुतली सरकार करार दिया था और आरोप लगाया कि दलित होने की वजह से नीतीश ने उनका चुनाव किया है. हालांकि मांझी लगातार इन आरोपों को नकारते रहे. मांझी सिर्फ 9 महीने तक मुख्यमंत्री पद पर रहे इसके बाद नीतीश ने ही मांझी को जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया. 

जब की थी चूहे खाने की वकालत

साल 2008 में मांझी का एक बयान काफी सुर्खियों में रहा जब उन्होंने बिहार में खाद्यान संकट के बीच लोगों को चूहे खाने की सलाह दी थी. उनका तर्क था कि चूहे फसल को बर्बाद करते हैं और उन्हें खाने से चिकन के बराबर प्रोटीन मिल सकता है. बता दें कि मांझी जिस मूसहर जाति से ताल्लुक रखते हैं उस समुदाय में चूहे का शिकार आम बात है.

 

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