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पश्चिम बंगाल: ‘लेफ्टओवर’ के तमगे से छुटकारा पाने के लिए लेफ्ट की मशक्कत

बंगाल में कभी 34 साल तक लगातार शासन करने वाले लेफ्ट फ्रंट को राज्य में पिछले एक दशक से भी अधिक समय से चुनावी झटकों का सामना करना पड़ रहा है. भगवा उछाल के बावजूद लेफ्ट नेताओं को उम्मीद है कि जल्दी ही लेफ्ट के पक्ष में दोबारा माहौल बनेगा.

26 नवंबर को बंगाल बंद के दौरान वाम दलों का प्रदर्शन (फोटो- पीटीआई) 26 नवंबर को बंगाल बंद के दौरान वाम दलों का प्रदर्शन (फोटो- पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वाम दलों की चुनौती
  • बिहार में जीत से मिला जोश, बंगाल में जनाधार बचाने का संकट
  • बीजेपी के उभार और ममता के कैडर से होगी टक्कर

बिहार में लेफ्ट पार्टियों के असरदार प्रदर्शन ने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाया है. पश्चिम बंगाल चुनाव से कुछ महीने दूर है. बिहार में महागठबंधन के हिस्से के रूप में लेफ्ट पार्टियों ने 29 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और 16 में जीत हासिल की. 

अगर 26 नवंबर को ट्रेड यूनियन्स की देशव्यापी हड़ताल की बात की जाए, जिसका लेफ्ट एक हिस्सा था, तो ‘भारत बंद’ का देश के अन्य राज्यों में तो असर फीका रहा लेकिन बंगाल के कई हिस्सों में जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया. लेफ्ट ने बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं को बंद को सफल बनाने के लिए सड़कों पर उतारा था.  

बंगाल में कभी 34 साल तक लगातार शासन करने वाले लेफ्ट फ्रंट को राज्य में पिछले एक दशक से भी अधिक समय से चुनावी झटकों का सामना करना पड़ रहा है. भगवा उछाल के बावजूद लेफ्ट नेताओं को उम्मीद है कि जल्दी ही लेफ्ट के पक्ष में दोबारा माहौल बनेगा. लेफ्ट नेताओं को उम्मीद है कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप, लचर कानून व्यवस्था, बेरोजगारी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसी परिस्थितियां लेफ्ट के दोबारा उभार की वजह बनेंगी. 

क्या है गेम-प्लान?  

1. सत्ता विरोधी लहर (एंटी इंक्मबेंसी फैक्टर) 

ममता बनर्जी के एक दशक के शासन के बाद अक्सर तृणमूल और लेफ्ट शासन के बीच तुलना की जाती है. कानून और व्यवस्था से लेकर महिलाओं की सुरक्षा, सरकारी योजनाओं के अमल से लेकर भ्रष्टाचार, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिनका लेफ्ट नेता सबसे ज्यादा फायदा उठाने के लिए उम्मीदें बांधे बैठे हैं. लेफ्ट कार्यकर्ता इन मुद्दों पर नाराजगी को लेकर लोगों की भावनाओं को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं. 

2. अम्फान चक्रवात राहत 

अम्फान चक्रवात ने पूरे दक्षिण बंगाल में भारी तबाही मचाई. यहां के लोग प्रशासन और सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी से बड़ी राहत की उम्मीद लगाए बैठे रहे. इस संबंध में लेफ्ट नेताओं का आरोप है कि टीएमसी और बीजेपी दोनों ही पीड़ितों को राहत पहुंचाने में नाकाम रही. ऐसा कह कर उन्होंने एक ही तीर से बंगाल में ममता बनर्जी सरकार और केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा.  

लेफ्ट नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार ने मुफ्त में राशन मुहैया कराया था लेकिन यह सरकारी खजाने से बाहर था. उन्होंने साथ ही राहत परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोपों का हवाला दिया. लेफ्ट नेताओं ने दावा किया कि उनकी पार्टियों के कार्यालयों में मुफ्त कैंटीन चला कर कई दिनों तक लोगों को राहत दी गई. 

 3. कोविड-19 स्थिति 

शुरुआत में तृणमूल कांग्रेस सरकार ने जिस तरह से इस महामारी को संभाला उसके लिए उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. शवों के गायब होने से लेकर मरीजों के साथ गलत बर्ताव के आरोप सामने आए. कई मोर्चों पर केंद्र सरकार को गुमराह करने के आरोपों को लेकर स्टेट मशीनरी की खिंचाई हुई. 

सीपीआई (एम) नेता फौद हलीम ने कहा, “पश्चिम बंगाल में यहां मुद्दा भ्रष्टाचार रहेगा. इस तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार लगातार चलता रहता है. अम्फान राहत और कोविड-19 महामारी के दौरान भी ये दिखा. वो राहत जो लोगों में बांटी जानी थी…और जिस तरह से बीजेपी अपने संगठनात्मक जाल को फैलाने के लिए इन भ्रष्ट लोगों की मदद ले रही है.”  

 4. सेक्युलर मंच मुहैया कराना  

सीपीआई (एम) की योजना न केवल अपने पारंपरिक लेफ्ट सहयोगियों, बल्कि अन्य सेक्युलर दलों को भी साथ लेने की है. पार्टी राजनीतिक दायरे के बाहर के संगठनों और बुद्धिजीवियों को भी साथ जोड़ना चाहती है. हलीम कहते हैं, '' हमारा फोकस सांप्रदायिक संघर्ष से मुक्त एक नया बंगाल बनाने पर है,  ऐसा बंगाल जो प्रगतिशील हो और रचनात्मक हो.” 

हलीम की बातों से सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम भी सहमति रखते हैं. सलीम कहते हैं, “तृणमूल शासन के पिछले 10 साल के शासन में, बंगाल ने भ्रष्टाचार, लूट, अराजकता और सांप्रदायिक सद्भाव में खलल को देखा. बीजेपी और तृणमूल दोनों ही पार्टियां बंगाल की नैतिकता और संस्कृति को नष्ट कर रही है. अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं पर हमले किए जाते हैं. उनके अधिकारों और सुरक्षा के मुद्दों को हाईलाइट किया जाएगा.” 

5. किसान, युवा और श्रमिक 

लेफ्ट किसानों और युवाओं तक पहुंचने के लिए नए सिरे से प्रयास कर रहा है. वह यह सुनिश्चित करने का वादा करता है कि किसानों को उनके उत्पादों के लिए उचित मूल्य मिले, शिक्षित युवाओं को राज्य में नौकरी के अवसर मिलें. लेफ्ट इन वर्गों तक अपनी स्थानीय समितियों के जरिए संदेश पहुंचाना चाहता है. 

सलीम ने कहा, “श्रमिक वर्ग और किसान पीड़ित हैं. लेकिन केंद्र सरकार दिल्ली में किसानों के आंदोलन को  प्रतिबंधित कर लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों पर हमला कर रही है. किसानों के मुद्दे हमारे मुद्दे हैं, हमारे मुख्य मुद्दे बेरोजगारी, औद्योगीकरण और कृषि संकट हैं.” 

6. महंगाई 

लेफ्ट खाद्य सामान की महंगाई पर प्रभावी अंकुश लगाने के वादे के साथ मध्यम वर्ग से अपील करेगा. इसके लिए लेफ्ट की ओर से जमाखोरों और मुनाफाखोरों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात की जाती है. सलीम कहते हैं, “बिहार चुनाव के नतीजे सभी के देखने के लिए हैं. वामपंथियों को सफलता इसलिए मिली क्योंकि हमने आम आदमी से संबंधित मुद्दों को उठाया.” 

अतीत में लेफ्ट का चुनावी प्रदर्शन 

लेफ्ट ने आखिरी बार बंगाल में 2006 में सरकार बनाई थी. तब लेफ्ट को 48.41 प्रतिशत के वोट शेयर के साथ 227 सीटों पर जीत मिली थी. महज पांच साल बाद, लेफ्ट में 39.68 फीसदी वोट शेयर के साथ 60 सीटों पर सिमट गया. 

दशकों तक कांग्रेस का विरोध करने वाले लेफ्ट ने 2016 में ममता बनर्जी का मुकाबला करने के लिए द ग्रैंड ओल्ड पार्टी के साथ हाथ मिलाया. हालांकि, उस चुनाव में लेफ्ट दलों (CPI-M, CPI, फॉरवर्ड ब्लॉक और RSP) ने मिलकर सिर्फ 32 सीटें जीतीं, इनमें से 26 सीट सीपीआई (एम) की थी. वहीं कांग्रेस ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 44 पर जीत हासिल की. 

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2019 के संसदीय चुनावों में बंगाल में बीजेपी का उदय हुआ. भगवा पार्टी ने 41 फीसदी वोट हासिल किए, तृणमूल से सिर्फ तीन फीसदी कम. 2019 का ये चुनाव कांग्रेस और लेफ्ट ने अलग अलग लड़ा लेकिन उनका संयुक्त वोट शेयर सिर्फ 13 प्रतिशत रहा. 

कांग्रेस ने 2019 लोकसभा चुनाव में 6 प्रतिशत वोट शेयर के साथ दो सीटें जीतीं, जबकि वाम दल 7 प्रतिशत वोट शेयर पाने पर भी एक सीट भी जीतने में नाकाम रहा.  

चुनौतियां 

चुनाव की उत्साही तैयारियों के बावजूद, सीपीआई-एम जानती है कि पार्टी में नए नेतृत्व के लिए रिक्तता है. पॉलिटिकल एनालिस्ट अभय कुमार ने आजतक से कहा, '' सीपीआई-एम का केंद्रीय नेतृत्व खस्ताहाल है. सीताराम येचुरी और प्रकाश करात गुटों के बीच की प्रतिद्वंद्विता बंगाल और त्रिपुरा में पार्टी को पुनर्जीवित नहीं कर पाएगी.” 

अभय कुमार कहते हैं, “सीपीआई (एम) अपने पुराने वोट बैंक पर वापस आ सकती है लेकिन वह भी असंभव लगता है. अधिकतर जमीनी स्तर के सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं के लिए, उनकी सबसे बड़ी दुश्मन ममता बनर्जी हैं, और वे आखिरी वक्त पर बीजेपी तक को वोट दे सकते हैं, जिससे ममता बनर्जी को हराया जा सके.” 

(नई दिल्ली में आशीष रंजन के इनपुट्स के साथ) 

 

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