कांग्रेस के इतिहास में पहली बार गांधी परिवार की किसी सदस्य प्रियंका गांधी वाड्रा को किसी राज्य की उम्मीदवार चयन स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया है. प्रियंका गांधी को असम स्क्रीनिंग कमेटी की जिम्मेदारी दी गई है. पार्टी के भीतर इसे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा को सत्ता से हटाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, जो गांधी परिवार के कड़े आलोचक रहे हैं. वहीं कुछ लोग इसे संगठन में प्रियंका गांधी की भविष्य की बड़ी भूमिका से भी जोड़कर देख रहे हैं.
स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरपर्सन के तौर पर प्रियंका गांधी का काम काफी संवेदनशील होगा. उन्हें असम की सभी विधानसभा सीटों से संभावित उम्मीदवारों के नामों की जांच करनी होगी और योग्य उम्मीदवारों के नाम कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति यानी सीईसी को भेजने होंगे. अंतिम फैसला भले ही सीईसी लेती हो, लेकिन राज्य स्तर पर उम्मीदवारों को छांटने की अहम जिम्मेदारी स्क्रीनिंग कमेटी की ही होती है.
प्रियंका गांधी के साथ सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को भी इस कमेटी में शामिल किया गया है. इसे भी एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. कुछ हफ्ते पहले इमरान मसूद ने प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त बताया था, जिस पर विवाद हुआ था. बाद में उन्होंने साफ किया था कि उन्होंने सवाल के जवाब में ऐसा कहा था. पार्टी के अंदर कुछ लोग इसे इमरान मसूद के लिए इनाम मान रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि कांग्रेस यह बताना चाहती है कि उसका फोकस विवाद नहीं बल्कि संगठन मजबूत करना है.
असम के लिए ही क्यों चुनी गईं प्रियंका गांधी?
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक असम प्रियंका गांधी के लिए नया राज्य नहीं है. 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई थी और तब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम का सीनियर ऑब्जर्वर बनवाया गया था. पार्टी का मानना है कि गांधी परिवार की राजनीतिक पकड़ और प्रियंका गांधी की संगठन पर मजबूत पकड़ असम में कांग्रेस को मजबूत कर सकती है.
सूत्रों का यह भी कहना है कि कांग्रेस को लगता है कि असम इकाई के कुछ नेता सत्तारूढ़ खेमे के करीब हैं. ऐसे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सीधे हस्तक्षेप से ही इस स्थिति को बदला जा सकता है. प्रियंका गांधी यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि साफ छवि और प्रतिबद्ध उम्मीदवारों के नाम ही सीईसी तक पहुंचें, ताकि टिकट मिलने के बाद दलबदल जैसी स्थिति न बने.
क्या असम में कांग्रेस की वापसी संभव है?
कांग्रेस यह मानती है कि असम में वापसी आसान नहीं है, क्योंकि हिमंत बिस्वा शर्मा की पकड़ मजबूत है. फिर भी आंकड़े बताते हैं कि मुकाबला एकतरफा नहीं है. पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए को 126 में से 75 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं. वोट प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 43.9 प्रतिशत और कांग्रेस गठबंधन को 42.3 प्रतिशत वोट मिले थे. दोनों के बीच अंतर सिर्फ 1.6 प्रतिशत का था. इससे साफ है कि अगर विपक्षी दलों में बेहतर तालमेल हो और सही उम्मीदवार चुने जाएं, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है.
आने वाले समय में क्या होगा?
कांग्रेस के भीतर यह भी माना जा रहा है कि संसद और संगठन में प्रियंका गांधी की सक्रियता लगातार बढ़ रही है. असम स्क्रीनिंग कमेटी की जिम्मेदारी मिलने से उनकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई है. इसे सिर्फ असम तक सीमित फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि आने वाले समय में कांग्रेस में उनकी बड़ी भूमिका का संकेत भी माना जा रहा है.
कुल मिलाकर असम में प्रियंका गांधी की तैनाती सिर्फ चुनावी औपचारिकता नहीं, बल्कि कांग्रेस की एक रणनीति है. पार्टी युवा नेतृत्व, मजबूत संगठन और सही उम्मीदवार चयन के जरिए भविष्य की जमीन तैयार करना चाहती है. सत्ता परिवर्तन तुरंत हो या न हो, लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस अब असम को हल्के में लेने के मूड में नहीं है.