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मिल्खा सिंह ने अर्जुन पुरस्कार लेने से किया था मना, बनाए कई रिकॉर्ड

जानें उस सवाल का जवाब जो आज भीमिल्खा सिंह के जहन में दौड़ता है....

मिल्खा सिंह मिल्खा सिंह

एथलेटिक्स में भारत का परचम लहराने वाले धावक मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को हुआ था, जिन्हें दुनिया फ्लाइंग सिख के नाम से जानती है. उन्होंने भारत के लिए कई रेस में भाग लिया और अधिकतर रेस में जीत दर्ज की. रिपोर्ट्स के अनुसार वह 75 रेस अपनी जीत दर्ज करवा चुके हैं. वहीं इतनी रेस जीतने के बावजूद देश ये जानना चाहता था कि साल 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में 400 मीटर की दौड़ में सबसे आगे चल रहे मिल्खा सिंह ने पीछे मुड़कर क्यों देखा?

खुद मिल्खा सिंह 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में 400 मीटर की दौड़ के बारे सोचते होंगे , तो जरूर खुद से पूछते होंगे कि आखिर उन्होंने पीछे मुड़कर क्यों देखा. फिर देखा तो पहले स्थान पर आने से चूक गए. लेकिन इस रेस में वह चौथे नंबर पर रहे, जिसके बाद दुनिया उन्हें जानने लगी. उन्हें इस रेस को खत्म करने में 45.73 सेकेंड का वक्त लगा, जो 40 साल तक नेशनल रिकॉर्ड रहा. वहीं हमारी इस स्टोरी में आपको इस सवाल का भी जवाब मिलेगा कि आखिर मिल्खा ने पीछे मुड़कर क्यों देखा.

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा

भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान उनके माता-पिता, भाई और दो बहनों की मौत हो गई थी. आजादी के भारत आने के बाद वो अपनी बहन के साथ रहते थे. एक बार उन्हें टिकट बिना यात्रा करने पर जेल में भी डाल दिया गया था.

नहीं स्वीकार किया अवार्ड

उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए साल 1959 में पद्म अवार्ड से सम्मानित किया गया है और 2001 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड भी दिया गया, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया. मिल्खा सिंह की झलक कभी-कभार ही देखने को मिलती थी, लेकिन अब पुरानी परंपरा के अनुरूप वे अपने मेहमानों को गेट के बाहर तक छोडने आते हैं.

बता दें, उनके गोल्फ खिलाड़ी बेटे जीव मिल्खा का अर्जुन पुरस्कार उनके कमरे में मुश्किल से ही नजर आता है. दीवारों पर हर जगह परिवार की तस्वीरें ही दिखाई देती हैं, खासकर उनके साढ़े तीन साल के पोते हरजय की फ्रेम की हुई फोटो. जब उनसे उनकी शिरकत वाली 80 दौड़ों में से 77 में मिले अंतरराष्ट्रीय पदकों के बारे में पूछा जाता है तो वे कहते हैं, ‘ये सब दिखाने की चीजें नहीं हैं. मैं जिन अनुभवों से गुजरा हूं उन्हें देखते हुए वे मुझे अब भारत रत्न भी दे दें तो मेरे लिए उसका कोई महत्व नहीं है.

अपनी मांगों को लेकर उनमें बड़ी खटास रही है. उन्होंने 2001 में अर्जुन पुरस्कार ठुकरा दिया था. उनका कहना था कि यह पुरस्कार उन्हें बहुत देर से दिया गया. वे पूछते हैं, 'लंदन में 'भाग मिल्खा भाग' के प्रीमियर के बाद मुझे हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आमंत्रित किया गया. क्या हमारी सरकार को नहीं मालूम कि मिल्खा सिंह कौन है?

इस वजह से देखा पीछे मुड़कर....

देश ने भले ही अब तक मिल्खा को पर्याप्त सम्मान न दिया हो लेकिन वे 1960 के रोम ओलंपिक में जीत की पक्की उम्मीद के साथ गए थे. टोक्यो में आयोजित 1958 के एशियाई खेलों में उन्होंने 45.8 सेकेंड का विश्व रिकॉर्ड बनाया था. वे अमेरिका के ओटिस डेविस को छोड़कर लगभग सभी प्रतिद्वंद्वियों को हरा चुके थे. मिल्खा रोम के स्टेडियो ओलंपिको में जब दौड़ रहे थे तो वे सबसे आगे चल रहे थे, लेकिन उन्हें लगा कि वे जरूरत से ज्यादा तेज दौड़ रहे हैं.

आखिरी छोर तक पहुंचने से पहले उन्होंने पीछे मुड़कर देखना चाहा कि दूसरे धावक कहां पर हैं. इसी वजह से उनकी रफ्तार और लय टूट गई. उन्होंने उस समय का विश्व रिकॉर्ड तोड़ते हुए 45.6 सेकंड का समय तो निकाला लेकिन एक सेकेंड के दसवें हिस्से से पिछड़कर वे चौथे स्थान पर रहे. डेविस ने 44.9 सेकेंड के साथ नया विश्व रिकॉर्ड बनाया और स्वर्ण पदक जीत लिया. इसके बाद मिल्खा ने जकार्ता में 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता लेकिन वे समझ गए कि अब वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कभी नहीं कर सकेंगे.

'जब मुझे रोटी मिली तो मैंने देश के बारे में सोचना शुरू किया'

मिल्खा देश के बंटवारे के बाद दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में अपने दुखदायी दिनों को याद करते हुए कहा कि 'जब पेट खाली हो तो देश के बारे में कोई कैसे सोच सकता है? जब मुझे रोटी मिली तो मैंने देश के बारे में सोचना शुरू किया. भूख की वजह से पैदा हुए गुस्से ने उन्हें आखिरकार अपने मुकाम तक पहुंचा दिया. जब आपके माता-पिता को आपकी आंखों के सामने मार दिया गया हो तो क्या आप कभी भूल पाएंगे, कभी नहीं. यह बात मशहूर है कि मिल्खा ने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनके जेहन में नरसंहार की यादें ताजा थीं.

मिल्खा सिंह ने नेहरू के कहने पर किया था ये काम

साल 1960 में मिल्खा सिंह के पास पाकिस्तान से न्योता आया कि वह भारत-पाकिस्तान एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भाग लें, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था. वे दोनो देशो के बीच के बंटवारे को नहीं भुला पा रहे थे इसलिए उन्होंने पाकिस्तान न जाने का फैसला लिया. उस वक्त प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें वहां जाने के लिए समझाया. पाकिस्तान में मिल्खा ने अब्दुल खालिक को  हरा दिया.

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