प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय दौरे पर चीन पहुंचे हैं. इस दौरे को दोनों देशों के संबंधों में ऐतिहासिक बताया जा रहा है. पीएम मोदी के इस अनौपचारिक दौरे से दोनों देशों के बीच रिश्तों में तनाव दूर होने की उम्मीद की जा रही है. लेकिन इतिहास और कई तथ्यों को देखते हुए भारत-चीन की स्वाभाविक दोस्ती का रास्ता इतना आसान नहीं लगता है.
भारत और चीन दुनिया के दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं. दुनिया की एक-तिहाई आबादी इन दो देशों में है लेकिन आबादी के मामले में बराबरी करने वाले दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी उतनी बेहतर नहीं है. भारत-चीन के बीच लगभग 70 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है जोकि चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार के आधे से भी कम है.
1962 के युद्ध की कड़वी यादें और 4000 किलोमीटर लंबी सीमा (जो विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है) पर तनाव हमेशा बना रहता है. 'शंघाई इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज' के साउथ एशिया के मामलों के विशेषज्ञ चाओ गेनचेंग कहते हैं, "जब तक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद नहीं सुलझ जाता है तब तक दोनों देशों के संबंध बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं."
एशिया की दो वित्तीय राजधानियां शंघाई और मुम्बई के बीच नियमित सीधी फ्लाइट भी नहीं है. बीजिंग और नई दिल्ली के बीच नॉनस्टॉप फ्लाइट्स सप्ताह में केवल तीन बार उड़ान भरती हैं. 2013 में 175,000 चीनी पर्यटक भारत आए. जबकि थाइलैंड पहुंचने वाले चीनी पर्यटकों की संख्या 46 लाख रही.
पीएम मोदी और शी चिनफिंग के बीच भले ही दोस्ती का रंग दिख रहा हो लेकिन अभी भी चीन और भारत के रास्ते में बहुत सी बाधाएं हैं. चीन की पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक दोस्ती और भारत में निर्वासित तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा की दशकों लंबी मेहमाननवाजी ने दोनों देशों के बीच खटास ही पैदा की है.
चीन के सरकारी अखबार 'द ग्लोबल टाइम्स' में एक संपादकीय में पीएम मोदी पर आरोप लगाते हुए लिखा गया था, "मोदी सीमा विवादों और सुरक्षा मसलों पर छोटी-छोटी चाल चल रहे हैं और चीन के साथ मोलभाव में अपना पलड़ा भारी करना चाहते हैं जिससे कि उनके देश में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ जाए. इस संपादकीय में " भारतीय कुलीन वर्ग की अपने लोकतंत्र में अंध भक्ति व आत्मविश्वास और भारत के आम जन की हीनभावना की भी आलोचना की गई थी.
जब सितंबर 2014 में चीनी राष्ट्रपति ने भारत का दौरा किया था तो इसे 'अभूतपूर्व' करार दिया था. 8 सालों में पहली बार चीनी राष्ट्रपति ने भारत की धरती पर कदम रखा था. लेकिन शी की यात्रा से नतीजा निकला- कुल 5 सालों में महज 20 बिलियन डॉलर का निवेश.
जबकि दूसरी तरफ शी ने 2014 के 3 दौरों में अपने सहयोगी पाकिस्तान में
इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 46 बिलियन डॉलर का निवेश करने का वादा किया.
2016-17 के दौरान चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 51.08 बिलियन डॉलर रहा
था. शी के भारत दौरे के बाद चीन के दोस्ताना रवैये की खुशफहमी बस कुछ ही
दिन तक रह पाई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत-चीन सीमा के पिछड़े इलाके कई सौ
चीनी सैनिकों ने एलएसी में घुसपैठ की थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे हैं. एशिया की दो महाशक्तियों के बीच रिश्तों पर बादल मंडराते रहे हैं लेकिन मोदी-शी की इस अनौपचारिक मुलाकात से इन रिश्तों से धुंध छंटने की उम्मीद जताई जा रही है. पिछले कुछ दशकों से बीजिंग और नई दिल्ली के रिश्ते कभी ठंडे तो कभी गर्म पड़ते रहे हैं. सीमा विवाद दोनों देशों के गर्मजोशी के कदमों को पीछे की ओर धकेलता रहा है लेकिन दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी बनी हुई है.
लेकिन चीन और भारत की आर्थिक साझेदारी द्विपक्षीय से ज्यादा बहुपक्षीय है. चीन के शब्दों में, 'भारत इसके दायरे में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है' लेकिन फिर भी भारत चीन के 10 बड़े व्यापारिक साझेदारों की सूची में भी नहीं आता है. इससे भी खराब संकेत यह है कि यह लगातार घटता जा रहा है. 2011-12 में भारत-चीन के बीच द्विपक्षीय समझौता 73 बिलियन डॉलर था. दो साल बाद यह 66 बिलियन डॉलर से भी कम पहुंच गया था. 2016-17 में मामूली बढ़ोत्तरी के साथ भारत का चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार 71.48 बिलियन डॉलर तक पहुंचा. नई दिल्ली चीन के साथ लगातार व्यापारिक घाटे को लेकर परेशान है. भारत का जिन 10 देशों के साथ पिछले 3 सालों में सबसे ज्यादा व्यापार घाटा बढ़ा है, उनमें चीन भी है. दोनों देशों की क्षमता और इनकी बड़े आकार की अर्थव्यवस्था को देखते हुए दोनों देशों के बीच व्यापार मामूली स्तर पर हो रहा है.
भारत की चीन साथ आर्थिक साझेदारी के स्तर पर तो चुनौतियां है ही, साथ ही भारत-चीन के सामने कई और चुनौतियां भी हैं.
कई भारतीय चीनियों को संदेह की नजर से देखते हैं खासकर डोकलाम मुद्दे के
बाद से भारतीयों का चीन पर भरोसा और कम हुआ है. 1962 के चीन के साथ हुए
युद्ध की छाया के साथ-साथ वर्तमान में मौजूद सीमा मसला भी दोनों देशों को
दोस्ती के रास्ते पर आगे बढ़ने नहीं दे रहा है. 1962 के पहले भारत और चीन
की विकासशील दुनिया के प्रतिनिधियों के तौर पर मजबूत साझेदारी रही थी. भारत
-चीन ने इस युद्ध से एक दशक पहले पहले गुट-निरपेक्ष आंदोलन को स्थापित
किया था जिससे शीत युद्ध के दौरान विकासशील देशों को स्वतंत्र पहचान मिल
सके. लेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और चाऊ-एन लाई
सीमा विवाद और हिमालय में तिब्बितयों के सैन्य संघर्ष पर राजनीति असंतोष को
सुलझाने में नाकाम रहे.
आज की तारीख में ये राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ गई है. एक सदी के बीत जाने
के बाद भी सीमा मसला अनसुलझा ही है. जहां नई दिल्ली बीजिंग के दक्षिण एशिया
के पड़ोसियों के साथ रिश्तों को शक की नजर से देखता है, वहीं बीजिंग अपने
पूर्व के पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्तों को लेकर चिंतित रहता है.
दक्षिण एशिया में छोटे देश चीन को भारत के खिलाफ देखना चाहते हैं, वैसे ही
चीन के सुदूर पूर्व के पड़ोसी भारत को चीन के खिलाफ खड़े देखना चाहते हैं.
लेकिन सारे पावर गेम के बावजूद, दक्षिण एशिया और सुदूर पूर्व के देश एशियन
इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और मैरीटाइम सिल्क रोड जैसी आर्थिक
गतिविधियों में भारत-चीन की साझेदारी चाहते हैं. यही एक बात थोड़ी संतोषजनक कही जा सकती है.
दक्षिणी चीन सागर में वर्चस्व को लेकर भी भारत-चीन आमने सामने रहते हैं. जब वियतनाम ने तेल और गैस के क्षेत्र में भारत को निवेश करने का आमंत्रण दिया था तो चीन ने इसका विरोध किया था. दक्षिणी चीन सागर पर चीन अपना अधिकार समझता है और इस वजह से अमेरिका भी उसका विरोध करता रहा है.