नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानी एनसीईआरटी आठवीं की किताब में किए गए बदलाव को लेकर चर्चा में है. दरअसल, एनसीईआरटी ने आठवीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर कंटेंट शामिल किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एनसीईआरटी के इस कदम की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि यह न्यायपालिका पर पहली गोली चलाने जैसा है. इसके साथ ही कोर्ट ने एनसीईआरटी को यह निर्देश दिया है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करें कि किताब की सभी कॉपी, हार्ड कॉपी या सॉफ्ट कॉपी, चाहे वे रिटेल दुकानों या स्कूलों में रखी हों, पब्लिक एक्सेस से हटा दी जाएं.
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार और एनसीईआरटी की ओर से आश्वासन दिया कि जिस अध्याय को तैयार करने वाले दो व्यक्तियों को भविष्य में किसी भी मंत्रालय से जोड़ा नहीं जाएगा. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जिन दो व्यक्तियों ने इस अध्याय को तैयार किया है, वे फिर कभी इस मंत्रालय से जुड़े नहीं होंगे. यहां तक कि कोई अन्य मंत्री भी होगा, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
अब सवाल ये है कि क्या एनसीईआरटी किताबों में बदलाव सिर्फ दो व्यक्तियों के फैसले के आधार पर होता है, जिनपर कार्रवाई की बात कही जा रही है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर किताबों में कुछ भी बदलाव करने का फैसला कैसे होता है और कौन ये तय करता है कि क्या बदलाव जाएगा...
कौन लिखता है चैप्टर?
पहली स्टेज
किताबों में किसी भी चैप्टर लिखने की शुरुआत National Curriculum Framework से होती है. ये तय करता है कि कंटेंट का तरीका कैसा होगा, किन विषयों पर ज़्यादा ध्यान रहेगा और पढ़ाने की दिशा क्या होगी. NCF के आधार पर सिलेबस व किताबें तैयार करना NCERT के मुख्य कामों में से एक है. यह प्रक्रिया समय-समय पर बदलावों के लिए चलती रहती है. जब फ्रेमवर्क तय हो जाता है, तब हर क्लास और हर विषय का पूरा सिलेबस अलग-अलग तैयार किया जाता है. इन सब चरणों के बाद ही किताब लिखने वाली टीम अपना काम शुरू करती है.
दूसरी स्टेज
आम धारणा के उलट, NCERT की किताबों को कोई एक लेखक नहीं लिखता है. इन्हें संस्थागत समितियों के जरिए तैयार किया जाता है, जिन्हें Textbook Development Committees (TDCs) कहा जाता है. इन समितियों में आम तौर पर विश्वविद्यालयों के टीचर्स और सब्जेक्ट के एक्सपर्ट, पढ़ाने की पद्धति (पेडागॉजी) के जानकार, चीफ एडवाइज़र और NCERT के फैकल्टी मेंबर होते हैं. NCERT खुद पहले कई बार बता चुका है कि स्कूल की किताबें किसी एक व्यक्ति की राय पर नहीं, बल्कि एकेडमिक समझ पर आधारित होती हैं.
खासकर जब बड़े स्तर पर बदलाव या सुधार किए जाते हैं, तो राष्ट्रीय स्तर की हाई-लेवल समितियां भी बनाई जाती हैं, जो सेलेबस और किताबों को अंतिम रूप देती हैं. यह सब नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क और नई शिक्षा नीति से जुड़े बदलावों के तहत होता है. किताबें कई लोगों की भागीदारी से लिखने का मकसद यही होता है कि किसी एक सोच का असर न पड़े, तथ्यों में गलती न रहे और एजुकेशन सिस्टम का संतुलन बना रहे.
तीसरी स्टेज
किसी भी NCERT की किताब के छपने से पहले वह कई स्तर की एकेडमिक और संस्थागत जांच से गुजरती है. सबसे पहले इंटरनल एकेडमिक रिव्यू होता है, जिसमें ड्राफ्ट चैप्टर को NCERT के विषय विभाग, एडिटर और करिकुलम विशेषज्ञ देखते हैं. वे देखते हैं कि कंटेंट कितना सही है, क्या वह जिस क्लास के बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, वो उनसे हिसाब से ठीक है या नहीं, उनकी उम्र के हिसाब से वो सही है या नहीं. इसके बाद बाहरी एक्सपर्ट रिव्यू का काम आता है, जिसमें यूनिवर्सिटी के विद्वान और विषय विशेषज्ञ कंटेंट की गुणवत्ता और अकादमिक मजबूती का आकलन करते हैं.
इसके बाद तीसरा काम होता है पैडागॉजी और सेंसिटिविटी चेक. इसमें देखा जाता है कि किताबें संवैधानिक मूल्यों, एजुकेशन के लक्ष्य, क्लासरूम के माहौल के हिसाब से सही है या नहीं. जब सोशल साइंस और सिविक्स जैसे विषयों में बदलाव होता है तो उसकी ज्यादा जांच की जाती है. ऐसा कई बार ऐसा हुआ है कि जब किताबों पर सुझाव या गंभीर प्रतिक्रिया मिली, तो NCERT ने अलग कमेटियां बनाकर कंटेंट की दोबारा समीक्षा करवाई. ऐसा ही अभी हो रहा है, जब न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाने पर बवाल हो रहा है.
ये तीन लेवल पर कंटेंट चेक होने के बाद फाइनल अप्रूवल होता है. ये काम सरकार की ओर से किया जाता है. दरअसल, NCERT अकादमिक रूप से स्वायत्त संस्था है, लेकिन यह Ministry of Education के अधीन काम करती है, जो राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और वितरण से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है. अगर सीधे शब्दों में कहें तो NCERT अकादमिक कंटेंट को अंतिम रूप देता है. Ministry of Education नीतिगत निगरानी बनाए रखता है.
प्रिंट होने के बाद चैप्टर कैसे बदला जाता है?
यह प्रक्रिया NCERT के उस तय सिस्टम से जुड़ी होती है, जिसमें किताब छपने के बाद भी अगर गंभीर आपत्तियां सामने आती हैं तो कमेटियां बनाकर कंटेंट की समीक्षा की जा सकती है. ऐसा नहीं है कि एक बार किताब छप गई तो कुछ नहीं हो सकता. अगर कोई आपत्ति आती है तो उसकी जांच की जाती है और एक्शन लिया जाता है. जैसे इस बार किताबों को वापस मंगवाना पड़ रहा है.
भारत की शिक्षा व्यवस्था में किताबों में संशोधन कोई नई बात नहीं है. नई शिक्षा नीति के बाद हुए पाठ्यक्रम पुनर्गठन और सिलेबस हल्का करने की कवायद में NCERT की किताबों में पहले ही सैकड़ों बदलाव हो चुके हैं. इससे यह साफ है कि पाठ्यक्रम तैयार करना एक बार का काम नहीं, बल्कि लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है.