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'मह‍िमामंडन के लायक नहीं मुगल', जानें NCERT सिलेबस चेंज पर क्‍या है इतिहासकारों की राय

एनसीईआरटी ने इतिहास की 12वीं की किताबों से मुगल दरबार का इतिहास हटा दिया है. अब यही किताबें यूपी में 12वीं कक्षा में पढ़ाई जाएंगी. इतिहास से टॉपिक हटाने को लेकर देशभर में एक अलग बहस छ‍िड़ गई है. इसमें समाजशास्त्री और इतिहासकार अलग अलग तरह की राय रख रहे हैं.

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प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में अब 12वीं के छात्रों  को मुगल दरबार का इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा. एनसीईआरटी की किताब के सिलेबस में हुए इस नये बदलाव के बाद अब इतिहास में मुगल काल नही है. NCERT के बदलाव को यूपी सरकार लागू कर रही है. इतिहास से मुगल काल हटाने को लेकर इत‍िहासकार और समाजशास्त्री अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं. 

वक्त के साथ श‍िक्षा बदलती है
अंबेडकरवादी चिंतक और जेएनयू के समाज शास्त्र के प्रोफेसर प्रो. विवेक कुमार का कहना है कि हमारे यहां पढ़ाया जाता है कि श‍िक्षा एक इंडिपिडेंट वेरिएबल है, यान‍ि श‍िक्षा में परिवर्त‍न होगा. फिर दूसरी बात कि अंतराल के साथ श‍िक्षा में बदलाव होता ही है. तीसरा पहलू ये है कि श‍िक्षा बदलाव भी लाती है और साथ में बदली भी जाती है. ऐसे में श‍िक्षा और संस्कृति के अंदर जो निरंतरता है, उसे बनाए रखने के लिए बहुत सी चीजें सिलेबस में बढ़ाई जाती हैं और बहुत सी चीजें निकाल दी जाती हैं. 

प्रो विवेक कुमार सती प्रथा का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि कभी सती प्रथा हमारे देश की सांस्कृतिक प्रथा के तौर पर पढ़ाई जाती थी. बाद में उसे कुप्रथा कर दिया गया. ठीक वैसे ही कल हम गंगाजमनी तहजबी के तहत मुस्ल‍िम इतिहास को पढ़ा रहे थे. लेकिन आज लग रहा है कि पृथकता हो गई है. इसी प्रकार पाकिस्तान में बहुत से हिंदू धर्म के महानायक पढ़ाए जाते थे, बाद में जनरल जियाउल हक के समय वो बदल दिए गए.

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क्या पढ़ाया जा रहा, क्या नहीं, ये वक्त के साथ बदलेगा, लेकिन इतिहास कभी बदला नहीं जा सकता.  मेरा मानना है कि अब वो दौर है जब इन्फार्मेशन और टेक्नोलॉजी के चलते युवा सिर्फ किताबों पर ही निर्भर नहीं हैं. आज हरेक विषय के बारे में इंटरनेट में जानकारियों का खजाना है. आप सोचकर देख‍िए कि कभी बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, सावित्री बाई फुले, शाहूजी महाराज किसी को कोर्स में नहीं पढ़ाया गया. लेकिन आज समाज में इन सभी महानायकों के बारे में चेतना आ चुकी है. हमारे शैक्षण‍िक पाठ्यक्रमों में लोक चेतना स्पष्ट नजर आती है जिसमें बहुत सारे पहलुओं का मिश्रण होता है. हमेशा से इत‍िहास में कुछ चीजें हटाई गईं और कुछ विषय जोड़े गए, लेकिन इसमे लोक की चेतना का बहुत बड़ा रोल रहा. 

इसके पीछे वजह क्या, कहीं ये राजनीतिक तो नहीं? 
जाने-माने इतिहासकार सलिल मिश्रा कहते हैं कि इतिहास में जोड़-घटाव चलते रहते हैं, लेकिन हमें यह जानना होगा कि इसके पीछे वजह क्या है. यह रिसर्च का विषय है. हमें यह भी जानना होगा कि इस बदलाव का आधार क्या है, उसका आधार शोध है या कोई और राजनीतिक कारण हैं. हमारी सामाजिक ज्ञान की दुनिया है, उसे पॉलिट‍िक्स ने हाईजैक कर लिया है, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. 

मह‍िमामंडन के लायक नहीं मुगल शासक!
जेएनयू के इत‍िहास विभाग के प्रोफेसर, प्रो हीरामन तिवारी का कहना है कि यह जो हमारा इतिहास है, इसका पुनरावलोकन होते ही रहना चाहिए. मेरा मानना है कि मुगल साम्राज्य की महानता के साथ साथ उनकी क्रूरता और आक्रामकता भी इत‍िहास में दर्ज होनी चाहिए. मुगलों के पूर्ववर्ती या परवर्ती शासनकाल में जिस तरह अपने धार्मिक साम्राज्य को क्रूरता से स्थापित करने के अत‍िरिक्त जिस विनाशकारी प्रवृत्त‍ि को अपनाया गया, उसका समावलेाकन करना चाहिए न कि महिमामंडन करना चाहिए. इसको उजागर करते रहना चाहिए. किसी का महिमामंडन तब होता है जब वो इस लायक हों. मेरा मानना है कि मुगल महिमा मंडन लायक नहीं थे. इतिहास को हर देश अपने हिसाब से पढ़ाता है, जो उसमें सच्चाई हो, बच्चों को वो पढ़ना चाहिए. 

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हमारे देश में खासकर बंगाल में चर्च‍िल को ज्यादातर इतिहासकार 1943 में बंगाल में भूख से हुई लाखों मौतों का ज़िम्मेदार मानते हैं. लेकिन चर्च‍िल के विरुद्ध ब्र‍िटेन में एक शब्द नहीं बोल सकते. लोकतांत्र‍िक देश में हमें ऐसी दासता की मानसिकता नहीं रखनी है. बच्चा विवेकी होता है, वो अपना सही गलत की पहचान खुद कर लेगा. उसे अकबर दि ग्रेट पढ़ाने के बजाय यह पढ़ाओ कि उनके पूर्ववर्ती और परवर्ती शासक कैसे थे, वो जिस देश की म‍िट्टी में रहना और खाना करते थे, कैसे वहीं के मंदिरों और पूजास्थलों को तोड़ा. यह कहां की महानता है. इसलिए इत‍िहास को एक सारगर्भ‍ित प्रकार से देखना चाहिए.

 

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