बॉलीवुड फिल्म ‘हक’ कुछ ही दिन पहले रिलीज हुई है. भारत में इस फिल्म को काफी पसंद किया गया, अब पाकिस्तान में भी इसकी काफी चर्चा हो रही है. इस फिल्म में तीन तलाक के मुद्दे को उठाया गया है. दरअसल, ‘हक’ शाह बानो केस पर आधारित है, जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा एक ऐतिहासिक मामला रहा है. यह मुद्दा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में भी महिलाओं के अधिकारों पर बहस होती रहती है. इसी वजह से वहां के लोग भी इस फिल्म से खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं.
पाकिस्तानी दर्शकों को यह बात अच्छी लगी कि फिल्म किसी धर्म या देश के खिलाफ नहीं, बल्कि एक महिला के इंसाफ और उसके कानूनी हक की बात करती है. सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि यह फिल्म नफरत नहीं फैलाती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है और महिलाओं के हक की बात करती है. तो चलिए जानते हैं पाकिस्तान में क्या है तलाक की प्रक्रिया.
जानें क्या है तलाक की प्रक्रिया
भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में शादी और तलाक सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया भी है. हालांकि दोनों देशों की सांस्कृतिक जड़ें काफी हद तक एक जैसी हैं, लेकिन शादी और तलाक से जुड़े कानूनों में बड़ा फर्क देखने को मिलता है. भारत में शादी और तलाक अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के तहत होते हैं. जैसे हिंदुओं के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाइयों के लिए इंडियन डिवोर्स एक्ट और सभी नागरिकों के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट लागू होता है. भारत में तलाक की प्रक्रिया आमतौर पर फैमिली कोर्ट के जरिए होती है, जिसमें सहमति से तलाक, विवादित तलाक, गुजारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी जैसे पहलुओं पर अदालत फैसला करती है.
ऐसे होता है पाकिस्तान में तलाक
वहीं, पाकिस्तान में शादी और तलाक की प्रक्रिया पूरी तरह फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961 के तहत संचालित होती है. यहां निकाह का रजिस्ट्रेशन यूनियन काउंसिल में होता है और तलाक की प्रक्रिया भी उसी से जुड़ी होती है. पाकिस्तान में पति या पत्नी दोनों को तलाक लेने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए यूनियन काउंसिल को नोटिस देना, 90 दिन की प्रतीक्षा अवधि और सुलह की कोशिश जैसे नियम अनिवार्य हैं.
खास बात यह है कि विदेश में रहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों पर भी यही कानून लागू होता है, बस उन्हें एंबेसी या काउंसलेट के जरिए प्रक्रिया पूरी करनी होती है. यानी जहां भारत में तलाक की प्रक्रिया धर्म और कोर्ट पर ज्यादा निर्भर करती है, वहीं पाकिस्तान में यह एक केंद्रीय और तय कानूनी ढांचे के तहत होती है. इन्हीं फर्कों को समझने के लिए हम लाहौर के वकील से जानेंगे कि पाकिस्तान में तलाक की पूरी कानूनी प्रक्रिया क्या है और किन शर्तों का पालन करना जरूरी होता है.
जानिए क्या कहते हैं वकील
पाकिस्तान के वकील जामिला ( सिद्दीकी ट्रेंड सेंटर) के अनुसार, तलाक एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसके जरिए पति-पत्नी का विवाह खत्म किया जाता है. पाकिस्तान में तलाक से जुड़े कानून फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961 के तहत आते हैं. इस कानून के अनुसार, पति या पत्नी दोनों में से कोई भी तलाक की प्रक्रिया शुरू कर सकता है. विदेश में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी वही नियम मानने होते हैं, बस कुछ कानूनी औपचारिकताएं अतिरिक्त होती हैं. सही प्रक्रिया के लिए किसी अनुभवी वकील की मदद लेना फायदेमंद होता है. तो चलिए लाहौर के वकील से जानते हैं क्या है वहां की तलाक प्रक्रिया.
पाकिस्तान में तलाक के लिए जरूरी कानूनी शर्तें
सबसे पहले पति फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करता है. अर्जी दाखिल करने के बाद कोर्ट पत्नी को नोटिस भेजती है. कोर्ट पहले पति-पत्नी के बीच समझौते की कोशिश करती है. अगर समझौता नहीं होता, तो कोर्ट तलाक की डिक्री दे देती है. तलाक की डिक्री यूनियन काउंसिल में रजिस्टर की जाती है. अगर पत्नी को फैसला गलत लगता है, तो वह अपील कर सकती है.
क्या होती है तलाक की डिक्री
तलाक की डिक्री कोर्ट द्वारा दिया गया वह लिखित कानूनी आदेश होता है, जिससे यह साफ हो जाता है कि पति-पत्नी का विवाह अब कानूनी रूप से खत्म हो चुका है. आसान शब्दों में कहें तो, जब तक कोर्ट तलाक की डिक्री जारी नहीं करता, तब तक पति-पत्नी कानून की नजर में शादीशुदा ही माने जाते हैं.
पाकिस्तान में तलाक कानून क्या कहता है?
फैमिली लॉ ऑर्डिनेंस 1961 के अनुसार पति और पत्नी दोनों को तलाक लेने का अधिकार है. तलाक के बाद दोनों को दोबारा शादी करने की अनुमति होती है. बच्चों की कस्टडी का फैसला कानून के अनुसार होता है. पत्नी और बच्चों को गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) मिल सकता है. संपत्ति का बंटवारा भी कानून के तहत किया जाता है. तलाक के बाद नाडरा से तलाक सर्टिफिकेट बनवाना जरूरी होता है.
विदेश में रहने वाले पाकिस्तानियों के लिए तलाक की प्रक्रिया
जो पाकिस्तानी विदेश में रहते हैं, उन्हें भी वही कानून मानने होते हैं, लेकिन कुछ अतिरिक्त कदम होते हैं. अगर पति विदेश में है. पति को उस देश में स्थित पाकिस्तानी एंबेसी या काउंसलेट में तलाक की सूचना देनी होती है. एंबेसी यह सूचना पाकिस्तान की यूनियन काउंसिल को भेजती है.
अगर पत्नी विदेश में रहती है तो
पत्नी पाकिस्तान में किसी वकील को पावर ऑफ अटॉर्नी देकर अपना प्रतिनिधि बना सकती है. वकील उसकी तरफ से कोर्ट की कार्रवाई पूरी करता है. इसके बाद तलाक की प्रक्रिया वही रहती है जो पाकिस्तान में रहने वालों के लिए होती है.
वहीं, Lexology.com के अनुसार, पाकिस्तान में मुस्लिम शादी को एक कानूनी समझौता (Civil Contract) माना जाता है. जैसे कोई और एग्रीमेंट खत्म किया जा सकता है, वैसे ही शादी भी कानून के तहत खत्म की जा सकती है. पाकिस्तान में तलाक के कई कानूनी तरीके मौजूद हैं.
पाकिस्तान में तलाक के मुख्य तरीके
1. पति द्वारा तलाक (तलाक)
पति इस्लामी और कानूनी तरीके से अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है.
2. पत्नी को तलाक का अधिकार (तलाक-ए-तफ़वीज़)
अगर निकाहनामा में पति ने पत्नी को तलाक का अधिकार दिया हो, तो पत्नी खुद तलाक दे सकती है. इसे तलाक-ए-तफ़वीज़ कहा जाता है.
3. अदालत से तलाक (खुला)
अगर पत्नी के पास तलाक का अधिकार नहीं है, तो वह कोर्ट में खुला के लिए अर्जी दे सकती है. कोर्ट से मंजूरी मिलने पर तलाक होता है.
खुला लेने की स्थिति में पत्नी को आमतौर पर हक़ मेहर वापस करना होता है.
4. आपसी सहमति से तलाक (तलाक-ए-मुबारात)
पति-पत्नी दोनों की सहमति से तलाक लिया जा सकता है. इसमें दोनों मिलकर तलाक का लिखित समझौता करते हैं.
पाकिस्तान में तलाक की कानूनी प्रक्रिया (THE MUSLIM FAMILY LAWS ORDINANCE, 1961 के तहत)
अगर सुलह नहीं होती, तो—
तलाक कब फाइनल माना जाता है?
90 दिन पूरे होने के बाद तलाक प्रभावी (Effective) हो जाता है. इसके बाद यूनियन काउंसिल डिवोर्स सर्टिफिकेट जारी करती है. अगर पत्नी गर्भवती हो, तो तलाक
90 दिन या बच्चे के जन्म (जो भी बाद में हो) के बाद ही फाइनल माना जाता है.
महिलाओं के लिए खास नियम
अगर निकाहनामा में तलाक का अधिकार नहीं है, तो पहले कोर्ट से खुला की डिक्री लेनी होती है, फिर उस डिक्री को यूनियन काउंसिल में जमा करना होता है. खुला लेने पर पत्नी को हक़ मेहर छोड़ना या लौटाना पड़ता है.
बच्चों की कस्टडी और खर्च
बच्चों की कस्टडी का मामला गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट 1890 के तहत होता है. केस उसी शहर की फैमिली कोर्ट में होता है जहां बच्चा रहता है. कोर्ट हमेशा बच्चे की भलाई (वेलफेयर) को सबसे ऊपर रखती है. आमतौर पर पिता को बच्चों का कानूनी अभिभावक माना जाता है. मां को छोटे बच्चों की देखभाल (फिजिकल कस्टडी) मिलती है. लड़के और लड़की की उम्र के हिसाब से कस्टडी का फैसला अलग हो सकता है. अगर मां या पिता के चरित्र को लेकर गंभीर सवाल हों, तो कोर्ट फैसला बदल सकती है. इसके अलावा संपत्ति, गुजारा भत्ता और मेहर पत्नी और बच्चों का मेंटेनेंस, हक़ मेहर, दहेज और तोहफों की वापसी, संपत्ति से जुड़े विवाद इन सब मामलों का फैसला फैमिली कोर्ट एक्ट 1964 के तहत अलग से किया जाता है.