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2029 में चुनाव लड़ेगी कॉकरोच जनता पार्टी या केजरीवाल से मिलाएगी हाथ? पार्टी फाउंडर अभ‍िजीत ने द‍िए जवाब, पढ़ें- पूरा इंटरव्यू

पहले कभी ऐसा होते नहीं देखा. रातों रात कोई पार्टी बने और उसमें लाखों युवा जुड़ जाएं. लेकिन सोशल मीड‍िया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी इसकी मिसाल बन चुकी है. जेन-जी के गुस्से, भारतीय राजनीति और हर स्थापित पार्टी को ठुकराने की इनसाइड स्टोरी इसमें छुपी हुई है. aaajtak.in ने इस पार्टी के संस्थापक से जाना कि आख‍िर कैसे चंद घंटों में ये सब हो गया. कहीं ये पार्टी क‍िसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ी तो नहीं, इसका एजेंडा आख‍िर है क्या, पढ़ें पूरा इंटरव्यू...

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अभ‍िजीत दीपके बोले- हां, मैं हूं कॉकरोच
अभ‍िजीत दीपके बोले- हां, मैं हूं कॉकरोच

सोच‍िए एक हफ्ता पहले तक अभिजीत बॉस्टन में नौकरी के लिए आवेदन कर रहे थे. फिर अचानक भारत के चीफ जस्टिस ने सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा भारतीयों की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' (पैरासाइट्स) से कर दी. तीन दिन बाद, अभिजीत ने एक राजनीतिक पार्टी लॉन्च कर दी. महज 48 घंटों के भीतर इसके 5.5 लाख फॉलोअर्स हो गए.

चौथे दिन तक इंस्टाग्राम पर 33 लाख फॉलोअर्स और वेबसाइट पर दो लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड मेंबर्स जुड़ चुके थे. कॉकरोच मास्क पहने युवा वॉलेंटियर्स यमुना की सफाई में जुट गए और विपक्ष के सांसद इस मुहिम में शामिल होने की मिन्नतें करने लगे. AAJTAK.IN ने इस आंदोलन के पीछे काम कर रहे ब्रेन यानी अभिजीत दीपके से सीधी बातचीत की.

क्या अभ‍िजीत हैं असली कॉकरोच? 

असल में अभ‍िजीत 30 साल के एक भारतीय छात्र हैं, जिन्होंने हाल ही में बॉस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस (PR) में मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. उन्होंने बताया कि एक हफ्ता पहले तक मैं नौकरी के लिए अप्लाई कर रहा था और तभी यह सब हो गया. तो अब मैं नहीं जानता. शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर है. असली कॉकरोच के सवाल पर उन्होंने कहा कि हां, मैं ही कॉकरोच हूं. भारत के चीफ जस्टिस (CJI) असल में मेरे जैसे युवाओं की ही बात कर रहे थे.

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इसल‍िए बनाई 'कॉकरोच' पार्टी

अभिजीत कहते हैं कि कॉकरोच शब्द वैसे मेरे ल‍िए कोई ट्रि‍गर नहीं है, लेकिन यह बात भारत के चीफ जस्टिस के मुंह से निकलना सबसे बड़ा ट्रिगर था, जो खुद हमारे संविधान के संरक्षक हैं. वही संविधान जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है. जो इंसान हमारी अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करने के लिए बैठा है, वह सिर्फ अपनी राय रखने के लिए हमारी तुलना कॉकरोचों और परजीवियों से कर रहा है. यह बात सबसे ज्यादा चुभने वाली थी. अगर यह टिप्पणी सत्ताधारी दल के किसी नेता ने की होती, जैसा कि वे आमतौर पर करते ही रहते हैं, तो शायद इतना बड़ा बवंडर नहीं खड़ा होता. लेकिन यह उस शख्स की तरफ से आया जिससे हमें अपनी आजादी के संरक्षण की उम्मीद थी.

क्या केजरीवाल जॉइन करेंगे कॉकरोच पार्टी?

अरविंद केजरीवाल के सवाल पर अभिजीत ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि वो चाहें तो अपना समर्थन दे सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि 'जेन-जी' (Gen-Z) का कोई भी युवा यह चाहेगा कि इस आंदोलन में कोई भी स्थापित राजनीतिक दल शामिल हो. बता दें कि अभ‍िजीत के बारे में कहा जा रहा है कि वो आम आदमी पार्टी में कम्युनिकेशंस इन-चार्ज थे.  क्या अरविंद केजरीवाल उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, इसलिए आज यह कदम उठाना पड़ा?

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इस पर अभ‍िजीत ने बताया कि ऐसा नहीं है. मैंने वहां 2020 से 2023 के बीच एक संक्षिप्त अवधि के लिए काम किया था. मैं वास्तव में उनके स्वास्थ्य और शिक्षा के मॉडल से बहुत प्रेरित था. उस समय की भारतीय राजनीति में स्वास्थ्य और शिक्षा का मुद्दा कहीं नहीं था, और उन्होंने इस पर काम करके दिखाया. इसलिए मैं प्रेरित हुआ और अपना योगदान देना चाहता था. उसके बाद मुझे लगा कि मुझे जीवन में आगे बढ़ना चाहिए. मैंने एक साल का ब्रेक लिया, अपनी एप्लीकेशन तैयार कीं, और 2024 में फैसला किया कि अब निजी जिंदगी और वित्तीय स्थिरता पर ध्यान देने का समय आ गया है. मैंने कुछ विश्वविद्यालयों में अप्लाई किया, बॉस्टन यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला और तब से मैं यहीं हूं.

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बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के बाद भारत...

पिछले एक साल में भारत के पड़ोस में कई बड़े 'जेन-जी' आंदोलन हुए हैं. बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में युवाओं ने तख्तापलट और बड़े बदलाव किए. इंटरनेट पर अक्सर मीम्स बनते थे कि 'भारत का जेन-जी कहां है?' क्या अभ‍िजीत इस आंदोलन के जरिए यह कह रहे हैं कि 'भारत का जेन-जी यहां है?' इस पर अभ‍िजीत ने गर्व से मुस्कराकर कहा कि भारत का जेन-जी हमेशा से यहीं था. सिर्फ तीन दिनों में हमें जो समर्थन मिला है, उसे देखिए. आज हमारे पास तीन लाख रजिस्टर्ड मेंबर्स हैं. इंस्टाग्राम पर हमसे 33 लाख (3.3 मिलियन) लोग जुड़ चुके हैं. क्या आपको सच में लगता है कि यह किसी योजनाबद्ध या प्रायोजित अभियान के जरिए संभव है? बिल्कुल नहीं. यह युवाओं का वो गुस्सा और हताशा है जो अब बाहर आ रही है.

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पल भर का उबाल या ट‍िकाऊ पार्टी 

इसे लंबे समय तक कैसे बनाए रखा जा सकता है. यह पल भर का उबाल या सिर्फ एक सोशल मीडिया ट्रेंड भी तो हो सकता है, जो आया और गया. इसे कैसे टिकाए रखेंगे और आपका असल इरादा क्या है? इस पर अभिजीत ने साफ-साफ कहा कि हां, यह एक बहुत बड़ी चुनौती है और हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं. हम सबसे पहले उन सभी लोगों तक पहुंचेंगे जिन्होंने रजिस्ट्रेशन कराया है और उनकी प्रॉब्लम्स को सुनेंगे. क्योंकि मुझे मिलने वाली सबसे बड़ी शिकायत यही है कि युवा कह रहे हैं,  'हमारी बात कोई नहीं सुनता, हमसे कोई बात नहीं करता, वे तो हमारे अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करते.'

युवाओं के मन में यह दर्द था और अब उनकी तुलना कॉकरोचों और परजीवियों से की जा रही है. इसलिए वे इस वर्तमान व्यवस्था से बेहद खफा हैं जो उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करती है. हम उनसे पूछेंगे कि आपके हिसाब से देश का राजनीतिक विमर्श कैसा होना चाहिए? आप किन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करवाना चाहते हैं? क्योंकि यह आपका दौर है. आपके पास यह तय करने की ताकत है कि इस देश की राजनीति का रुख क्या होगा.

क्या है एक्शन प्लान

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फिलहाल अभ‍िजीत के पास इसे लेकर कोई ठोस एक्शन प्लान नहीं है, लेकिन वो लोगों की बात सुनकर रणनीति तय करेंगे. अभिजीत कहते हैं कि पार्टी बने अभी सिर्फ तीन-चार दिन ही हुए हैं. इसमें से कुछ भी पहले से तय नहीं था. अगर मुझे इसकी प्लानिंग करनी होती, तो मैं अमेरिका में बैठकर नहीं करता, मैं भारत में होता. लेकिन मैं एक बात साफ कर दूं कि यह सब उस हताशा का परिणाम है जिसे देश का युवा कई सालों से अपने अंदर दबाए बैठा है. भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, और विडंबना देखिए कि उस युवा आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा वर्कफोर्स (रोजगार) से बाहर है.

क्या हैं पांच सूत्रीय एजेंडा, क्या जमीनी हैं ये?

कॉकरोच जनता पार्टी की वेबसाइट पर पांच सूत्रीय एजेंडा (5-Point Agenda) है. जैसे किसी भी चीफ जस्टिस को रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा सीट या कोई सरकारी पद नहीं मिलेगा. वैध वोट काटने वाले चुनाव आयुक्त को यूएपीए (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया जाएगा. महिलाओं को 33% नहीं बल्कि 50% आरक्षण और कैबिनेट में आधी जगह मिलेगी. अंबानी और अडानी के मालिकाना हक वाले मीडिया घरानों के लाइसेंस रद्द किए जाएंगे. अब सवाल यह है कि क्या सच में आज के भारत में यह सब करना मुमकिन है, या यह सब सिर्फ क्लिक्स और सुर्खियां बटोरने के लिए है?

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इस पर अभिजीत का कहना है कि मुझे लगता है कि यह इस बारे में है कि एक आदर्श स्थिति क्या होनी चाहिए और हमें किस दिशा में प्रयास करना चाहिए. हम एक ऐसे भारत के लिए संघर्ष कर रहे हैं जहां सभी संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों, चाहे वह न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या फिर मीडिया. आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा यह है कि ये सभी संस्थान सत्ताधारी दल के इशारे पर काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जो कि एक बेहद खतरनाक संकेत है.

क्या आंदोलन कुछ दिन में ठंडा पड़ जाएगा?

देख‍िए ये बात तो तय है कि अभ‍िजीत के आलोचक कहेंगे कि 'जेन-जी' सिर्फ इंटरनेट पर गुस्सा निकालता है और जब सड़कों पर उतरता है तो सिर्फ रील्स बनाने के लिए. क्या यह आंदोलन भी कुछ दिन में ठंडा पड़ जाएगा? इस पर अभिजीत ने कहा कि नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. पिछले कुछ महीनों से मैं एक बड़ा बदलाव देख रहा हूं. पहले लोग हताश थे लेकिन अपनी असंतुष्टि को जाहिर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. अब अगर आप इंस्टाग्राम पर जाएं, तो ये युवा खुलकर बोल रहे हैं.

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उन्होंने आगे कहा कि यह सिर्फ पहला चरण है. कल को वे सड़कों पर भी उतर सकते हैं. लेकिन मैं आपको याद दिला दूं, अगर वे सड़कों पर उतरे, तो यह नेपाल या बांग्लादेश जैसा नहीं होगा. ये लोग बहुत समझदार हैं. मैंने सैकड़ों युवाओं से बात की है और वे समझा रहे हैं कि उन्हें बेहद लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना है. वे अपने संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर आवाज उठाने की अहमियत को बखूबी समझते हैं. ये युवा आज की पूरी कैबिनेट मिनिस्ट्री से कहीं ज्यादा समझदार हैं.

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लेकिन चुनाव तो अभी भी वही पुरानी पार्टियां जीत रही हैं, के सवाल पर कहा कि यदि आप लोकतंत्र का सम्मान करते हैं, तो आपको इस बात को स्वीकार करना होगा कि वे चुनाव जीत रहे हैं. लेकिन वे चुनाव कैसे जीत रहे हैं? हमें उस प्रक्रिया पर भी खुलकर चर्चा करनी चाहिए.

चीफ जस्टिस की सफाई के बाद भी क्यों...? 

उस कमेंट में चीफ जस्ट‍िस का इशारा उन लोगों की तरफ था जो असंतुष्ट हैं और खुद कुछ बेहतर नहीं कर रहे हैं. क्या कॉकरोच जनता पार्टी इस सफाई को स्वीकार करती है? इस पर अभिजीत ने जवाब दि‍या कि मुझे उनकी यह सफाई और भी ज्यादा घटिया और निंदनीय लगी. क्योंकि उन्होंने कहा कि उनका इशारा उन लोगों पर था जिनके पास असली डिग्री नहीं है या जिनकी डिग्री फर्जी है.

वो आगे कहते हैं कि हम सभी जानते हैं कि आज भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों में रहता है. ग्रामीण भारत का युवा बिना किसी औपचारिक डिग्री के भी दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करता है. उसके पास इतनी सुख-सुविधाएं नहीं थीं कि वह किसी बड़े संस्थान से औपचारिक शिक्षा ले सके. तो क्या जिसके पास डिग्री की प्रिविलेज (विशेषाधिकार) नहीं है, उसे इस लोकतंत्र में आवाज उठाने का कोई हक नहीं है? चीफ जस्टिस यहां क्या कहना चाहते हैं? क्या वो संविधान, जिसकी रक्षा की उन्होंने शपथ ली है, यह नहीं कहता कि हर नागरिक को, चाहे उसकी शैक्षणिक योग्यता या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो, अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा अधिकार है? आप कैसे कह सकते हैं कि जिसके पास डिग्री नहीं है, वो कॉकरोच है? चीफ जस्टिस के मुंह से यह सुनना बेहद निराशाजनक है.

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आज की राजनीति से काबिल होंगे मेरी पार्टी के लीडर

क्या भारतीय राजनीति के इस दौर में आपको कोई ऐसा नेता दिखता है जो आज के युवाओं का नेतृत्व कर सके? इस पर अभ‍िजीत बाेले कि मैं उनका नेतृत्व नहीं कर रहा हूंं.  बुनियादी तौर पर यह आंदोलन इन युवाओं ने खुद खड़ा किया है. मुझे इसकी कतई उम्मीद नहीं थी. बिना नेतृत्व (Leaderless) के चलने वाले आंदोलन और भी खतरनाक होते हैं, इतिहास गवाह है कि उनका क्या हश्र हुआ. इस पर 
उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि यह बिना लीडर के रहेगा.

यह आंदोलन जल्द ही देश को नए चेहरे देगा. आज जो चेहरे राजनीति में हैं, उनसे कहीं ज्यादा पढ़े-लिखे और काबिल चेहरे सामने आएंगे, जो भारतीय राजनीति के लिए एक बहुत अच्छा संकेत होगा. फिलहाल देश का कोई भी स्थापित राजनेता जेन-जी का प्रतिनिधित्व नहीं करता. मैं आपसे पूछता हूं कि आखिरी बार आपने कब किसी भारतीय राजनेता को जेन-जी के युवाओं से सीधे संवाद करते हुए सुना था? आप एक पत्रकार हैं, लंबे समय से इस क्षेत्र में हैं. कृपया मुझे उस नेता का नाम बताइए जिसने इस युवा आबादी की असल समस्याओं को एड्रेस करने की कोशिश की हो?

क्या कॉकरोच पार्टी 2029 के रण में उतरेगी?
अभिजीत ने बताया कि इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इस आंदोलन को शुरू हुए अभी सिर्फ तीन दिन हुए हैं. हम युवाओं से बात करेंगे, उनकी राय लेंगे कि हमें आगे क्या कदम उठाना चाहिए और क्या नहीं. क्योंकि उनकी सबसे बड़ी शिकायत यही है कि देश की कोई भी पार्टी उनकी बात नहीं सुनती, उन्हें पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है. लेकिन अब इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप स्थिति बदल रही है, स्थापित पार्टियां भी अब मजबूरन हमारे इस मूवमेंट पर नजर रख रही हैं. कई बड़े नेता हमें समर्थन देने की बात कह रहे हैं. लेकिन जेन-जी के युवाओं ने अपना मन साफ कर लिया है. वे मुझसे लगातार कह रहे हैं,  'अभिजीत, आप जो चाहें करें, लेकिन किसी भी पारंपरिक राजनीतिक दल की परछाई इस आंदोलन पर नहीं पड़नी चाहिए.'

किसी राजनीतिक दल से हाथ नहीं मिलाएंगे?
बताया कि हम अपना एक पूरी तरह स्वतंत्र आंदोलन शुरू करेंगे. हमारा तात्कालिक लक्ष्य भारत के राजनीतिक विमर्श (Political Discourse) को बदलना है. पिछले 10-12 सालों से इस देश की राजनीति का स्तर क्या रहा है? वही हिंदू-मुस्लिम की बातें, जो गोल-गोल घूम रही हैं. आखिर यह सब कब तक चलेगा? इससे देश के युवाओं को क्या मिल रहा है? अगर इससे किसी का कुछ भला हो रहा हो, तो मुझे बताइए. हकीकत यह है कि इससे कुछ नहीं मिल रहा और देश का जेन-जी इस बात को समझ चुका है. मैं पिछले दो साल से अमेरिका में बैठकर देख रहा हूं कि यहां के युवाओं के बीच चर्चा का स्तर क्या है. 

'NEET पेपर लीक' पर क्या बोले अभ‍िजीत 

अभ‍िजीत आगे कहते हैं कि अमेर‍िका में बात होती है कि एआई (AI) इंडस्ट्री को और बड़ा कैसे बनाया जाए, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में कैसे क्रांति लाई जाए, कैसे पूरे अमेरिका को क्लीन और रिन्यूएबल एनर्जी पर शिफ्ट किया जाए. वहां के युवाओं की चर्चा इन मुद्दों पर होती है. और हमारे देश में क्या हो रहा है? सिर्फ हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-मुस्लिम. और इसी घटिया राजनीति का परिणाम है 'NEET पेपर लीक'. 

नीट परीक्षा देने वाले एक 17 साल के मासूम बच्चे ने आत्महत्या कर ली. उसने सिर्फ इसलिए अपनी जान दे दी क्योंकि देश का पेपर लीक हो गया था. वह बच्चा कल को डॉक्टर बनता, देश की सेवा करता, न जाने कितने लोगों की जान बचाता. लेकिन इस सरकार ने, इस सड़ी-गली राजनीतिक प्रणाली ने उसे खुदकुशी करने के लिए मजबूर कर दिया. और इसका क्या नतीजा निकला?

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क्या देश के शिक्षा मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दिया? क्या विपक्ष ने इतना दबाव बनाया कि मंत्री को कुर्सी छोड़नी पड़े? चाहे बीजेपी हो या विपक्ष, हम इन लोगों पर कैसे भरोसा करें? मैं हाल ही में यूरोप की एक खबर पढ़ रहा था. पुर्तगाल में एक भारतीय पर्यटक (टूरिस्ट) की मौत हो गई. उस एक पर्यटक की मौत के कारण वहां के एक मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. 

अभ‍िजीत सवाल उठाते हुए कहते हैं कि पुर्तगाल में एक विदेशी नागरिक की मौत पर मंत्री इस्तीफा दे देता है. और यहां हमारे देश का भविष्य, हमारे बच्चे सरकार की नाकामी और सिस्टम के भ्रष्टाचार के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, और वो मंत्री आज भी शान से अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ है. राजस्थान के शिक्षा मंत्री कहते हैं कि यह कोई बड़ी बात नहीं है. तो क्या भारत में एक इंसान की जिंदगी की यही कीमत रह गई है?

आंदोलन की फंडिंग कहां से आएगी?
फाउंडर अभ‍िजीत ने बताया कि हम इन सभी तकनीकी और रणनीतिक पहलुओं पर काम कर रहे हैं. मैं बस इतना कहूंगा कि प्लीज हमें थोड़ा समय दीजिए. हम जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते जिससे इस पवित्र आंदोलन को कोई नुकसान पहुंचे. हम जो भी करेंगे, पूरी ठोस रणनीति के साथ करेंगे. मैं जानता हूं कि लोग मुझसे बार-बार हमारा अगला कदम और स्ट्रेटजी पूछ रहे हैं.

लेकिन तीन दिन पहले तक हमें खुद नहीं पता था कि हमारे साथ दो लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड लोग खड़े होंगे. अगर हमें अंदाजा होता, तो हम पहले से ही पूरी रणनीति तैयार रखते. इसलिए अभी बहुत शुरुआती वक्त है, थोड़ा समय दीजिए. हम सत्ता में बैठे लोगों को यह कहने का कोई मौका नहीं देना चाहते कि 'हमने तो पहले ही कहा था कि यह आंदोलन दो दिन का बुलबुला है और नहीं टिकेगा.' क्योंकि व्यवस्था में बैठे लोग सिर्फ आपके असफल होने का इंतजार करते हैं ताकि वे अपनी पीठ थपथपा सकें. हम उन्हें यह मौका बिल्कुल नहीं देंगे.

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