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एजुकेशन न्यूज़

NEET: एग्जाम देने वालों में बेट‍ियां आगें, क्यों लड़कियों को भाता है डॉक्टर बनना?

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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हाल ही में हुई नीट परीक्षा में इस साल 18.72 लाख परीक्षार्थ‍ियों ने एग्जाम दिया. इस परीक्षा में इस बार एक नया रिकॉर्ड बना है, वो ये है कि पिछले सालों से इस साल 2.56 लाख से अधिक लड़कियों की संख्या बढ़ी है. ओवर ऑल एग्जाम में 10.64 लाख लड़कियां हैं. ये आंकड़ा इस ओर इशारा करता है कि बेट‍ियों को ये पेशा सबसे ज्यादा लुभाता है. अगर इंजीनियर-डॉक्टर जैसे दो प्रभावी करियर की तुलना करें 12वीं के बाद लड़कियां इंजीनियर बनने की बजाय डॉक्टर बनना ज्यादा पसंद करती हैं. ऐसा क्यों है, क्या इस फील्ड में लड़कियों के लिए कुछ खास है, या कुछ और ही बात है. 

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जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सोशल साइंस विभाग में श‍िक्षक व समाजशास्त्री प्रो विवेक कुमार इसके पीछे समाज के पूरे ढांचे को वजह बताते हैं. वो कहते हैं कि यह बहुत सुखद है कि लड़कियां नीट के जरिये डॉक्टरी के पेशे को पसंद करती हैं. लेकिन इसके पीछे कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्क‍ि समाज की एक सोची समझी व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है. समाज एक अलग तरह के मनोविज्ञान से संचालित होता है, यहां कई कथन इस तरह लोगों के मन में घर कर गए हैं जो कि बिना किन्हीं कारणों से सच्चाई बन गए हैं, उनमें से एक है कि लड़कियां मैथ में अच्छी नहीं होतीं, उनका विषय होमसाइंस है. 

 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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प्रो विवेक कहते हैं कि चूंकि अब श‍िक्ष‍ित माता-पिता बेट‍ियों  को पढ़ाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं तो ऐसे में होम साइंस से ज्यादा बायोलॉजी के विषय पढ़ाने पर जोर होने लगा है. लेकिन अगर आप देखें तो इसके पीछे कहीं न कहीं आज भी वो अवधारणा गहरे पैठ बनाए दिखती है. साथ ही वो कहते हैं कि करियर के लिए भी डॉक्टरी पेशे को लड़कियों के लिए सॉफ्ट प्लेस के तौर पर देखा जाता है. टीचिंग के पेशे की तरह लोगों को लगता है कि डॉक्टर बनकर तमाम ट्रांसफर पोस्ट‍िंग या सिविल इंजीनियर की तरह साइट पर काम करने से अच्छा डॉक्टरी का पेशा है, जिसमें परिवार का सम्मान भी है और जॉब सि‍क्योरिटी के साथ स्थिरता भी ज्यादा है जिससे वो शादी के बाद एक शहर में ही रहकर काम कर सकती हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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दिल्ली यूनिवर्सिटी में सोशल सांइस डिपार्टमेंट के पूर्व डीन और समाज शास्त्री प्रो जेपी दुबे इसे एक अलग नजरिये से देखते हैं. वो कहते हैं कि लड़कियों को डॉक्टर बनना ज्यादा पसंद होता है, इसके पीछे की वजह आज के समय में बदला माहौल है. वहीं सामाजिक संरचना के ल‍िहाज से देखें तो परिवार में जो ग्रूमिंग होती है, उसमें दो तीन ऑप्शन हमारे सामने होते हैं. परिवार के लोग चाहते हैं कि बेट‍ियां भी एक्सेल करें लेकिन ऐसी जगह जहां कठ‍िनाइयां कम हों. यही कंसर्न बच्चों को प्रेरित कर देता है, बेटे करियर के लिए अलग दिशा में और बेट‍ियां अलग दिशा में सोचती हैं. कुछ ही बच्चे होते हैं जो कुछ हटकर करने की सोचते हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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लड़कों के मामले में समाज का सेफ्टी या सिक्योरिटी का फीचर घट जाता है. प्रो दुबे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि लड़कियां किसी भी करियर को ठुकराती हैं, लेकिन बात अपनाने की है. अगर लड़कियों में कुछ हटकर करने की जज्बे की बात करें तो वो कहीं ज्यादा होता है. उदाहरण के लिए जब एनडीए ने लड़कियों के लिए दरवाजा खोला तो इसमें भी लड़कियां आ गईं. समाज की पुरानी धारणा अब टूट रही है. लेकिन सामाजिक संरचना इस तरह की बनी रही है कि बीटेन ट्रैक को लड़कियां पकड़ लेती हैं, एक ऐसा ट्रैक जो समाज में लड़कियों के लिए अच्छा साबित हो चुका है. ऐसा बीटेन ट्रैक जो सॉफ्ट है जिसमें एग्रेसन नहीं है, लड़कियां उसी को अपनाती हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (PTI)
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प्रो विवेक कहते हैं कि अभी भी हम कितना भी आंकड़ें दे लें लेकिन घरेलू बंधन से पितृसत्तात्मक सोच गई नहीं है. पहले कहा जाता था कि लड़कियां मैथ में अच्छी नहीं होतीं, वो गेम्स में अच्छी नहीं होतीं. आज बॉक्स‍िंग से लेकर क्रिकेट तक में लड़कियां कमाल कर रही हैं. इंडिया के ही दूसरे हिस्सों को देखें तो वेस्टर्न इंडिया, नॉर्थ इंडिया और ईस्ट इंडिया में विषयों को लेकर अभी भी दिक्कत बनी हुई हैं, वहीं साउथ इंडिया में मैथ पढ़ने को लेकर ऐसी अवधारणाएं कम हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (PTI)
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बात साफ है, लड़कियां किन व‍िषयों को पढ़कर क्या करियर बनाती हैं, ये अहम नहीं है. अहम यह है कि उन पदों पर पहुंचकर उनके भीतर चेंज क्या आते हैं, वो डिसीजन क्या लेती हैं, उनकी निजी जिंदगी में पितृसत्ता वाली सोच कितनी हावी होती है. क्या वो किसी बड़े पद जाकर स्त्री विरोधी कुरीतियों की ख‍िलाफत करने का जज्बा रखती हैं, क्या वो अपने लिए फाइनेंश‍ियल प्लानिंग कर पाती हैं. ऐसे तमाम सवालों के जवाब ही तय करते हैं कि उनका करियर कितना मुफीद है. डॉक्टर बनना शायद इसलिए भी मुफीद माना जाता है, क्योंकि डॉक्टरी पेशे में बेरोजगारी न के बराबर है, कोई भी डॉक्टर डिग्री लेकर बेरोजगार नहीं रहता, वहीं दूसरी डिग्री में रिस्क फैक्टर ज्यादा है.