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एजुकेशन न्यूज़

मनोचिकित्सक के पास पहुंच रहे BTS बैंंड के दीवाने किशोर, कहीं ये डिजिटल ड्रग तो नहीं?

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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गुजरात के अहमदाबाद में बीते 10 दिनों में कम से कम 8 स्कूली बच्चों के माता पिता शहर के शेल्बी अस्पताल पहुंचे हैं. अहमदाबाद मिरर ने इसे रिपोर्ट करते हुए लिखा है कि इन बच्चों के पेरेंट्स ये श‍िकायत लेकर आए थे कि उनके बच्चे साउथ कोरियन बैंड BTS के सदस्यों के खाने, कपड़े पहनने और यहां तक कि उन्हीं की तरह रहने की लत से जूझ रहे हैं. इस बैंड को सुनकर वो इससे पूरी तरह प्रभावित हैं, उनकी जिंदगि‍यों में इसका असर साफ-साफ दिखता है. मनोचिकित्सक इस तरह की एक्ट‍िविटी के ऑब्सेशन लेवल तक पहुंचने वाले बच्चो को डिजिटल ड्रग के लती मानकर इलाज करते हैं. आइए मनोचिकित्सक से जानते हैं कि आख‍िर ये लत क्या है, और इसके लक्षण और इलाज क्या हैं. 

 

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डिजिटल दुनिया ने देश के हजारों या यूं कहें कि लाखों बच्चों को इस कदर अपनी चपेट में ले लिया है कि वे इस पर अपनी नींद और दिमाग सब लुटा रहे हैं. अहमदाबाद में अस्पताल पहुंचे ये वो केस हैं जो रिपोर्ट किए गए. IHBAS दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि आजकल ऐसे बच्चों की तादाद बहुत ज्यादा है जो मोबाइल या कंप्यूटर पर म्यूजिक बैंड, किसी यू ट्यूब चैनल या गेम या फिर किसी ऐसे डिजिटल एंटरटेनमेंट प्लेटफॉर्म के लती हो गए हैं जो उनकी जिदंगी में पूरी तरह जगह बना चुका है. वहीं किसी म्यूजिक बैंड की तेज धुनों का आदी होना एक अलग तरह का नशा है, मनोचिकित्सक इसे डिजिटल ड्रग कहते हैं. कोरोना के बाद ये लत बच्चों में और ज्यादा बढ़ी है. खासकर किशोर अपनी पढ़ाई और खेल का महत्वपूर्ण समय इस लत में लगा रहे हैं. 

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डिजिटल ड्रग्स आख‍िर है क्या 

डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि इसे बाइनोरल बीट्स  (तेज धुन) या ऑडियो ड्रग्स भी कहा जाता है. इसमें दो अलग अलग फ्रीक्वेंसी की वेव्स साउंड कानों से होते हुए दिमाग तक जाती हैं जो व्यक्त‍ि को एंटरटेन करती हैं. इसे सुनने पर नशे जैसी फीलिंग आती है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसे ऑडियो उपलब्ध हैं, जिसे सुनकर लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ हो रहे हैं. विशेषज्ञ एक हद से ज्यादा इसे सुनना खतरनाक मानते हैं क्योंकि कुछ समय सुनने के बाद ही व्यक्ति इसका इतना आदी हो जाता है कि उसे इलाज की जरूरत पड़ती है. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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इसमें दो अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की साउंड वेब्स दिमाग में भेजी जाती है. मसलन एक कान में 500 हर्ट्ज वहीं दूसरे में 520 हर्ट्ज. इन दोनों ही फ्रीक्वेंसी में थोड़ा गैप होता है. इससे दिमाग में एक अलग तरह का ऑडिटरी इल्यूजन पैदा होता है और दिमाग की सामान्य कोशिकाओं का दायरा इससे घटता है, थोड़ी देर में इसका बायोफीडबैक आने लगता है जो कि ब्रेन को अच्छा महूसस कराता है. कई बार व्यक्ति भावुक हो जाता है. यही नहीं उसके सोचने-समझने की क्षमता पर भी इसका असर पड़ता है. इससे पीडि़त व्यक्ति इस साउंड को सुनने में इतना तल्लीन हो जाता है कि अपने दैनिक कार्यों से दूर हो जाता है. मेडिकल भाषा में इसे कैनाबिस (भांग) बीड्स भी कहते हैं. 

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खतरनाक है इस म्यूजिक की आदत

म्यूजिक का हद से ज्यादा लती होने का दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहा है. सुनने वाला व्यक्त‍ि कुछ ही समय के बाद इसका लती हो जाता है. ये लत प्रतिबंधित मादक द्रव्य के जैसे होती है. यदि एक बार व्यक्ति ने सुन लिया तो उसे बार-बार सुनने की तलब लगती है. फिर इसे बार बार और अधिक समय तक सुनने से हाथ पैर सुन्न पड़ जाते हैं. इससे  मांसपेशियों में खिंचाव और जकडऩ की समस्या होने लगती है.  यही नहीं इससे टीनेजर्स के व्यवहार में आक्रामकता, बेचैनी और घबराहट जैसे लक्षण आते है. होता ये है कि अगर पीड़ित व्यक्ति को एक दिन साउंड सुनने को नहीं मिलता तो इसके विदड्रॉल साइन दिखने लगते हैं. इसमें तड़प, बेचैनी, घबराहट, मरीज के व्यवहार में आक्रामकता और ध्यान में कमी आने लगती है. 

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एक स्टडी के मुताबिक डिजिटल ड्रग यानी कि तेज म्यूज‍िक के लती लोगों में 5.3 पर्सेंट छोटी उम्र के लोग होते हैं. डॉ ओम प्रकाश कहते हैं कि इससे छुटकारा पाने के लिए मनोचिकित्सक किसी मेडिस‍िन के बजाय सीबीटी (कॉग्न‍िट‍िव बिहेविरल ट्रेनिंग)के जरिये भी ठीक किया जाता है. सबसे पहले तो इसमें परिवार का महौल भी काफी ज‍िम्मेदारी निभाता है. हम अपने बच्चों को जो गैजेट दे रहे हैं, उसके यूज पर भी पूरी मॉनिटरिंग होनी चाहिए. इसके अलावा टीनेजर्स बच्चों से इस बारे में तार्किक बात रखते हुए सबसे पहले उन्हें इसकी आदत कम और फिर धीरे धीरे छोड़ने के लिए प्रेरित करना होगा.