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रजा पहलवी और खामेनेई के बीच क्यों है कट्टर दुश्मनी, क्या है इसके पीछे का पूरा इतिहास?

रजा पहलवी और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के बीच दुश्मनी क्यों है? आइये, इसके पीछे का इतिहास समझते हैं.

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रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी के बेटे हैं (Photo:AP)
रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी के बेटे हैं (Photo:AP)

ईरान की राजधानी तेहरान समेत देश के कई बड़े शहरों में सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं. कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इन विरोध प्रदर्शनों में अब तक 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे संजीदा दौर से गुजर रहा है.

इसी बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के विरोधियों की सूची में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बाद अब जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है रजा पहलवी.

रजा पहलवी का नाम उस वक्त सुर्खियों में आया जब उन्होंने ईरान में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों को और तेज करने के लिए अपने X (पूर्व ट्विटर) प्लेटफॉर्म पर लोगों से सड़कों पर उतरने की खुली अपील की.ऐसे में सवाल उठता है कि अमेरिका में रह रहा यह शख़्स आखिर क्यों लगातार ईरान की सत्ता के खिलाफ आवाज उठा रहा है. और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व से उसकी दुश्मनी की असली वजह क्या है?

निर्वासन में पला एक क्राउन प्रिंस

रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी के बेटे हैं. उनका जन्म अक्टूबर 1960 में हुआ था. जन्म के साथ ही उन्हें ईरान के मयूर सिंहासन का वारिस माना गया. लेकिन उनकी किस्मत का यह रास्ता बहुत जल्द बदल गया.

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1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई और पहलवी राजशाही का अंत हो गया. रजा पहलवी ने बहुत कम उम्र में देखा कि कैसे उनके पिता, जिन्हें कभी पश्चिमी देशों का मज़बूत समर्थन हासिल था, एक-एक देश में शरण की तलाश करते रहे. आखिरकार 1980 में मिस्र में कैंसर से उनके पिता की मौत हो गई.

राजशाही खत्म हो चुकी थी. क्राउन प्रिंस और उनका परिवार सत्ता से पूरी तरह बाहर हो गया. वे अमेरिका में निर्वासन में रहने को मजबूर हुए. इसके बाद के वर्षों में पहलवी परिवार ने निजी त्रासदियां भी देखीं. रजा पहलवी की बहन और भाई दोनों ने अपनी जानें दे दी.एक समय ऐसा लगा कि पहलवी राजवंश अब सिर्फ इतिहास की किताबों तक सिमट कर रह जाएगा.लेकिन आज, छह दशक से ज्यादा उम्र में, रजा पहलवी एक बार फिर खुद को ईरान के भविष्य से जोड़कर देख रहे हैं.

मोहम्मद रजा पहलवी को इस्लामिक क्रांति के चलते ईरान छोड़कर जाना पड़ा था. (फाइल फोटो)

दुश्मनी की असली जड़: 1979 की इस्लामी क्रांति

रज़ा पहलवी और ईरान के धार्मिक नेतृत्व के बीच दुश्मनी किसी निजी टकराव का नतीजा नहीं है. इसकी जड़ें 1979 की उस इस्लामी क्रांति में हैं, जिसने ईरान की सत्ता व्यवस्था, राजनीति और समाज को पूरी तरह बदल दिया.इस क्रांति का नेतृत्व अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने किया था. खुमैनी के नेतृत्व में न सिर्फ पहलवी राजशाही का अंत हुआ, बल्कि ईरान में एक नई व्यवस्था लागू हुई, जिसे इस्लामी गणराज्य कहा गया.

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 दो अलग-अलग ईरान की कल्पना

यही वह बिंदु है जहां रजा पहलवी और अयातुल्लाह खुमैनी की सोच आमने-सामने टकराती है.मोहम्मद रजा शाह पहलवी ने अपने शासनकाल में ईरान को एक आधुनिक और अपेक्षाकृत सेक्युलर देश बनाने की कोशिश की.. शाह चाहते थे कि ईरान पश्चिमी दुनिया, खासकर अमेरिका, के करीब जाए और एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभरे.

इसके ठीक उलट, अयातुल्लाह खुमैनी का मानना था कि यह पूरा मॉडल इस्लामी मूल्यों के खिलाफ है. उनके अनुसार शाह की नीतियां ईरान को धार्मिक रूप से कमजोर कर रही थीं और देश को पश्चिमी ताकतों पर निर्भर बना रही थीं. खुमैनी ने शाह को अमेरिका की कठपुतली तक कहा और यह दावा किया कि ईरान की असली पहचान सिर्फ इस्लामी शासन में ही सुरक्षित रह सकती है.

यहीं से ‘विलायत-ए-फकीह’ की अवधारणा सामने आई, जिसमें देश की सर्वोच्च सत्ता चुनी हुई सरकार के बजाय धार्मिक नेता के हाथों में होती है.

इसी वजह से है दुश्मनी...

आज जब रजा पहलवी इस्लामी गणराज्य को तानाशाही बताते हैं और लोकतांत्रिक, सेक्युलर व्यवस्था की बात करते हैं, तो वह असल में उसी वैचारिक लड़ाई को आगे बढ़ा रहे होते हैं जो 1979 में शुरू हुई थी. ईरान की मौजूदा सत्ता उन्हें पश्चिमी ताकतों का समर्थक और राजशाही की वापसी का प्रतीक मानती है. वहीं रज़ा पहलवी खुद को ईरानियों की आज़ादी और भविष्य की आवाज बताने की कोशिश करते हैं.

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खामेनेई उसी क्रांतिकारी व्यवस्था के उत्तराधिकारी हैं. वहीं रजा पहलवी उसी राजशाही के वारिस हैं, जिसे इस्लामी क्रांति ने खत्म किया था. यहीं से दोनों के बीच टकराव की रेखा साफ हो जाती है.

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