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MBA की जरूरत नहीं, बिना डिग्री ही बन रहे करोड़ों के स्टार्टअप फाउंडर्स! क्या आपने देखा ये नया ट्रेंड?

Career Trends: भारी-भरकम फीस और दो साल का समय देने के बजाय मिलेनियल फाउंडर्स अब 'कॉर्पोरेट इनक्यूबेटर्स' को स्टार्टअप की असली पाठशाला मान रहे हैं. फोर्ब्स की रिपोर्ट बताती है कि कैसे ये प्रोग्राम्स 'न्यू एज MBA' बनकर उभर रहे हैं.

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डिग्री की टेंशन खत्म! बिना MBA किए ऐसे बन रहे करोड़ों के स्टार्टअप फाउंडर्स
डिग्री की टेंशन खत्म! बिना MBA किए ऐसे बन रहे करोड़ों के स्टार्टअप फाउंडर्स

बिजनेस की दुनिया में पैर जमाने के लिए अब सिर्फ टॉप बी-स्कूल की डिग्री ही काफी नहीं है. फोर्ब्स की एक हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, आज के मिलेनियल फाउंडर्स पारंपरिक MBA और वेंचर कैपिटल फेलोशिप के बजाय 'कॉर्पोरेट इनक्यूबेटर्स' को तरजीह दे रहे हैं. इसे 'रिटेल का MBA' कहा जा रहा है, जहां किताबी थ्योरी नहीं, बल्कि धंधे की असली बारीकियां सिखाई जाती हैं.

क्यों फेल हो रहा है पारंपरिक MBA का फॉर्मूला?
रिपोर्ट में MAED की फाउंडर डेनिस वसी का उदाहरण दिया गया है. डेनिस के मुताबिक, इनक्यूबेटर्स सालों की जानकारी को कुछ महीनों में समेट देते हैं. यहां आप सिर्फ ब्रांडिंग नहीं, बल्कि ऑपरेशंस, डेटा और बिजनेस को 'स्केल' करना सीखते हैं. आज का युवा वर्ग ऐसे 'लीनियर करियर' (सीधी नौकरी) में यकीन नहीं रखता. वे फ्रीलांसिंग और पर्सनल ब्रांडिंग के दौर में पले-बढ़े हैं, इसलिए वे दो साल क्लासरूम में बैठने के बजाय सीधे 'मैदान' में उतरकर सीखना चाहते हैं.

इनक्यूबेटर बनाम MBA: क्या है अंतर?
सबसे पहले रियल-टाइम इंफ्रास्ट्रक्चर का अंतर है. MBA में आप पुराने केस स्टडीज पढ़ते हैं, जबकि कई इनक्यूबेटर्स में आप सीधे सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स और इन्वेंट्री मैनेजमेंट पर काम करते हैं.

दूसरा अंतर नेटवर्किंग और मार्केट एक्सेस का है. जैसे आप सेफोरा के प्रोग्राम का उदाहरण लें, तो 2016 से अब तक इसने 40 से ज्यादा ब्रांड्स को सपोर्ट किया है, जिनमें से आधे से ज्यादा को नेशनल रिटेल स्टोर्स में जगह मिली. यह वो 'मार्केट एक्सेस' है जो कोई डिग्री नहीं दिला सकती.

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तीसरा ऑपरेशंस का है, डेनिस कहती हैं कि सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि सिर्फ एक अच्छा प्रोडक्ट और मार्केटिंग काफी है. किसी ब्रांड की असली रीढ़ उसका 'ऑपरेशन' होता है, जो इनक्यूबेटर्स में सिखाया जाता है.

फंडिंग के लिए अब 'गिड़गिड़ाना' बंद
फोर्ब्स की रिपोर्ट एक और अहम बदलाव की ओर इशारा करती है. अब फाउंडर्स शुरुआती दौर में ही बाहर से पैसा (वेंचर कैप‍िटल) उठाने के बजाय खुद के दम पर 'प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट' तैयार करने पर जोर दे रहे हैं. वे अपनी कंपनी पर अपना कंट्रोल और ऑटोनॉमी चाहते हैं.

भारत के संदर्भ में क्या है इसके मायने?
भारत में भी JioGenNext, गूगल फॉर स्टार्टअप्स और NASSCOM 10,000 स्टार्टअप्स जैसे प्रोग्राम्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. भारतीय युवा भी अब मोटी फीस वाले MBA के बजाय इन इनक्यूबेटर्स की ओर देख रहे हैं, जहां उन्हें मेंटरशिप के साथ-साथ ग्लोबल मार्केट तक पहुंच मिलती है.

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