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यूपीः कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी, जानें क्या है मामला?

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) की पत्नी लुईस खुर्शीद (Louise Khurshid) के खिलाफ एक स्थानीय अदालत ने गैर-जमानती वॉरंट (non-bailable warrant) जारी किया है. उनके ऊपर 71 लाख रुपये से ज्यादा के गबन का आरोप है.

सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस (फाइल फोटो) सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 71.50 लाख रुपये के गबन का आरोप
  • 16 अगस्त को होगी मामले की सुनवाई

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) की पत्नी लुईस खुर्शीद (Louise Khurshid) के खिलाफ एक स्थानीय अदालत ने गैर-जमानती वारंट (non-bailable warrant) जारी किया है. उत्तर प्रदेश की फर्रुखाबाद कोर्ट ने ये वारंट डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट में 71 लाख रुपये के गबन के मामले में जारी किया है. 

सीजेएम प्रवीण कुमार त्यागी ने लुईस खुर्शीद के साथ-साथ ट्रस्ट के सचिव अतहर फारुकी के खिलाफ भी गैर-जमानती वारंट जारी किया है. मामले पर 16 अगस्त को सुनवाई होगी.

क्या है मामला?

मार्च 2010 में डॉ. जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट को यूपी के 17 जिलों में विकलांगों को व्हीलचेयर, ट्राई साइकिल और सुनने के यंत्र बांटने के लिए केंद्र सरकार की ओर से 71 लाख 50 हजार रुपये दिए गए थे. 2012 में यही रकम गबन करने का आरोप ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर लगा था. उस वक्त सलमान खुर्शीद यूपीए-2 सरकार में केंद्रीय मंत्री थे. हालांकि, उन्होंने इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

इस पूरे मामले की जांच इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने शुरू की और जून 2017 में EOW इंस्पेक्टर राम शंकर यादव ने लुईस खुर्शीद और अख्तर फारुकी के खिलाफ कायमगंज थाने FIR दर्ज की. लुईस खुर्शीद ट्रस्ट की प्रोजेक्ट डायरेक्टर थीं. 

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दिसंबर 2019 में फाइल हुई चार्जशीट

इस मामले में 30 दिसंबर 2019 को चार्जशीट दाखिल की गई. इसमें आरोप लगाया गया कि ट्रस्ट ने यूपी के वरिष्ठ अधिकारियों के फर्जी दस्तखत करके और सील लगाके केंद्र सरकार से 71.50 लाख रुपये का अनुदान हासिल किया था. 

ट्रस्ट ने दावा किया था कि उसने एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, कासगंज, मैनपुरी, अलीगढ़, शाहजहांपुर, मेरठ, मुरादाबाद, बरेली, गौतमबुद्ध नगर, रामपुर, संत कबीर नगर और इलाहाबाद समेत प्रदेश के दर्जनभर से ज्यादा जिलों में कैम्प आयोजित कर विकलांगों को वो उपकरण बांटे थे. 

हालांकि, जब जांच हुई तो पाया गया कि ऐसे कैम्प कभी लगाए ही नहीं गए. ये कैम्प सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह गए.

 

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