डिजिटल अरेस्ट. सुनने में भले ही कानूनी शब्द लगे, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के कानून में डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई प्रावधान नहीं है. इसके बावजूद हर दिन देश के अलग-अलग शहरों से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी के मामले सामने आ रहे हैं. एक फोन कॉल के जरिए लोगों के दिमाग पर कब्जा किया जा रहा है और फिर बैंक बैलेंस मिनटों में साफ हो जाता है.
साइबर अपराधियों का यह पूरा खेल माइंड अरेस्ट का है. जो डर गया, वही फंस गया. ठग खुद को कभी CBI अफसर बताते हैं, कभी इनकम टैक्स अधिकारी, तो कभी सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर वीडियो कॉल करते हैं. डर इतना गहरा बैठाया जाता है कि पढ़े-लिखे, अनुभवी और जिम्मेदार लोग भी ठगों की बातों पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं. दिल्ली के डॉक्टर इंदिरा तनेजा इसका बड़ा उदाहरण हैं.
एक फोन कॉल से शुरू हुई बातचीत में उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने का डर दिखाया गया. फर्जी पुलिस स्टेशन, नकली वर्दी, वीडियो कॉल पर फर्जी जज. सबकुछ इतना प्रोफेशनल कि शक की गुंजाइश ही खत्म कर दी गई. डर के इसी जाल में फंसकर डॉक्टर तनेजा और उनके पति ने 14 करोड़ रुपए से ज्यादा गंवा दिए. इंदिरा तनेजा बताती हैं कि कैसे TRAI से कॉल आने की बात कही गई.
इसके बाद ठगों ने उन्हें मुंबई के एक पुलिस स्टेशन से जोड़ा. FIR, गिरफ्तारी और बैंक अकाउंट फ्रीज होने की धमकी दी गई. डर के कारण उन्होंने किसी से बात नहीं की और यही ठगों की सबसे बड़ी जीत बन गई. ऐसा ही मामला पटना के एक डॉक्टर दंपत्ति के साथ हुआ. कई दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर, कभी CBI अफसर बनकर, कभी जज बनकर वीडियो कॉल किए गए.
जब तक साजिश समझ में आई, तब तक 2 करोड़ 20 लाख रुपए खाते से उड़ चुके थे. साइबर ठगों का जाल यहीं नहीं रुका. पंजाब पुलिस के पूर्व IG अमर सिंह से 8 करोड़ रुपए की ठगी हुई. रिटायर्ड अफसर रमेश चंद्र भी इसी डर के खेल का शिकार बने. पैटर्न साफ है. ठग सीधे पैसे नहीं मांगते, पहले दिमाग पर कब्जा करते हैं.
साइबर एक्सपर्ट अमित दुबे के मुताबिक, देश में हर दिन 30 से 35 हजार साइबर क्राइम की शिकायतें दर्ज हो रही हैं. 2023 में 22 लाख साइबर फ्रॉड केस सामने आए और आने वाले समय में यह आंकड़ा 50 लाख तक पहुंच सकता है. कानून साफ है. कोई भी जांच एजेंसी डिजिटल अरेस्ट नहीं करती. ना कोई एप डाउनलोड करवाती है, ना सुप्रीम कोर्ट का लिंक भेजती है.
डिजिटल अरेस्ट सिर्फ साइबर अपराधियों का हथियार है. अब सवाल ये कि डिजिटल अरेस्ट से लूटा गया पैसा जाता कहां है. जांच में सामने आया इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड नेटवर्क. इस नेटवर्क का सबसे बड़ा नाम है 37 साल का चेन जी. चीन में जन्मा, कंबोडिया की नागरिकता लेने वाला चेन जी भारत से लेकर अमेरिका, चीन और यूरोप तक साइबर ठगी का खेल चला रहा था.
कंबोडिया के प्रिंस होल्डिंग ग्रुप के जरिए उसने रियल एस्टेट, बैंकिंग और लग्जरी ब्रांड्स में निवेश किया. डिजिटल अरेस्ट से लूटी गई रकम कंबोडिया के प्रिंस बैंक तक पहुंचती थी. यही नहीं, कंबोडिया और आसपास के इलाकों में साइबर स्कैम सेंटर्स बनाए गए, जहां अलग-अलग देशों से लोगों को लाकर ठगी करवाई जाती थी. जून 2025 से जनवरी 2026 के बीच कंबोडिया में 118 स्कैम सेंटर्स पर रेड हुई.
23 देशों के करीब 5 हजार लोग गिरफ्तार किए गए. चेन जी की गिरफ्तारी के बाद साइबर फ्रॉड नेटवर्क में हड़कंप मच गया. फिलहाल चेन जी चीन की हिरासत में है. लेकिन खतरा टला नहीं है. म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया में फैले स्कैम सेंटर्स अभी भी सक्रिय हैं. साइबर अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत डर है. इस डर को हराने का एक ही तरीका है, सतर्कता, जानकारी और सही वक्त पर शिकायत.