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दिल्ली शूटआउट: गैंगवार, हनीट्रैप या कुछ और?

गैंगवार और हनीट्रैप दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं. जुर्म की दुनिया के खिलाड़ी अपने दुश्मनों को मौत के मुंह में पहुंचाने के लिए सालों से गैंगवार का सहारा लेते रहे हैं. जबकि हनीट्रैप में हुस्न के सहारे दुश्मन का राज़ जान लेने की रवायत है.

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गैंगवार और हनीट्रैप दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं. जुर्म की दुनिया के खिलाड़ी अपने दुश्मनों को मौत के मुंह में पहुंचाने के लिए सालों से गैंगवार का सहारा लेते रहे हैं. जबकि हनीट्रैप में हुस्न के सहारे दुश्मन का राज़ जान लेने की रवायत है. दिल्ली में शूटआउट की सबसे ताज़ा वारदात कुछ ऐसी ही है. एक ऐसा शूटआउट, जो हनीट्रैप के ज़रिए गैंगवार का शक पैदा करता है.

साउथ वेस्ट दिल्ली का नजफगढ़ इलाक़ा अब तक नामालूम ऐसे कितने की वारदातों का गवाह बन चुका है. इस बार ये वारदात रोहिणी के इलाके में शाम के समय हुई है. इस वारदात को देखकर लोग कुछ समझ पाते इससे पहले ही एक शख्स को पार्क के गेट के बाहर बेतहाशा भागते हुए देखा. वह जान बख्श देने की फ़रियाद लगाता दौड़ रहा था और चार से पांच लोग उसकी हर चीख़ अनसुनी कर लगातार उसका पीछा कर रहे थे.

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इन्हीं लोगों ने बेहद क़रीब से उस पर एक के बाद एक कई गोलियां बरसाईं और फिर देखते ही देखते गोलियों से छलनी हुआ वो शख्स सड़क पर गिर कर ढेर हो गया. यह सबकुछ इतनी जल्दी हुआ कि ज़्यादातर लोगों को पूरा माजरा समझने का मौका ही नहीं मिला, लेकिन देखनेवालों ने देखा कि गोलियों का शिकार बना शख्स किसी लड़की के साथ एक बाइक पर जापानी पार्क पहुंचा था और जैसे ही हमलावरों ने उसे रोक कर फायरिंग शुरू की, लड़की मौका-ए-वारदात से भाग निकली जबकि एक आई-20 कार में आए क़ातिल भी अपने शिकार की जान लेने के बाद उसी कार में सवार होकर भीड़ में गुम हो गए.

क़त्ल के पीछे लव एंगल या हनी ट्रैप
घटना के बाद प्रशांत विहार थाने की पुलिस मौके पर थी और आनन-फ़ानन में का शिकार हुए शख्स को उठा कर पास के अंबेडकर अस्पताल में पहुंचाया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मुर्दा करार दे दिया. यहां तक तो मामला किसी पुरानी रंजिश की वजह से हुए क़त्ल का लग रहा था. कुछ लोगों को इस क़त्ल के पीछे लव एंगल या हनी ट्रैप जैसी बात भी लगी, क्योंकि मकतूल के साथ एक लड़की भी मौका-ए-वारदात पर पहुंची थी और क़त्ल के दौरान ही वो लड़की भी मौके से रहस्यमयी तरीक़े से गायब हो गई, लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब मरनेवाले की पहचान साफ़ हुई, मामले में बड़ा टिवस्ट आ गया.

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मरने वाला विधायक का ड्राइवर
मरनेवाला कोई और नहीं बल्कि साउथ वेस्ट दिल्ली के झाड़ौदा कलां गांव का रहनेवाला 25 साल का नौजवान विपिन सिरोही था. वही विपिन जो कभी विधायक भरत सिंह का ड्राइवर हुआ करता था और उनकी क़त्ल का चश्मदीद गवाह भी. गैंगस्टर से नेता बने किशन पहलवान के भाई भरत सिंह का क़त्ल भी उनके दुश्मनों ने कुछ इसी तरीक़े से इसी साल 29 मार्च को तब कर दिया था, जब वो नजफ़गढ़ इलाके में किसी फैमिली फंक्शन में शामिल होने पहुंचे थे. ऐसे में ये मामला अब सिर्फ़ , लव अफ़ेयर और हनी ट्रैप जैसी बातों से भी कहीं आगे बढ़ लग रहा था.

लड़की के रहस्यमयी किरदार से पुलिस परेशानी में
विधायक भरत सिंह का ड्राइवर और उनके क़त्ल के चश्मदीद गवाह विपिन सिरोही को उसके दुश्मन गोलियों से छलनी कर चुके थे, लेकिन क्या ये सिर्फ़ उसके चश्मदीद गवाह होने का अंजाम था? या फिर इस क़त्ल की कहानी कुछ और थी. गैंगवार पर माथापच्ची कर रही पुलिस को मौका-ए-वारदात पर सामने आई एक रहस्यमयी लड़की की कहानी ने और भी उलझा दिया. रोहिणी में जापानी पार्क के बाहर हुए इस शूटआउट ने दिल्ली पुलिस को उलझा कर रख दिया है. वारदात के तौर-तरीके और मकतूल के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देख कर मामला गैंगवार का लगता है. लेकिन इस वारदात में शामिल एक लड़की के रहस्यमयी किरदार ने पुलिस की पेशानी पर बल डाल दिए हैं.

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ऐसे में इसे लेकर फिलहाल कई सवाल

--क्या ये वाकई गैंगवार का नतीजा है?

--अगर हां, तो क्या ये गैंगवार में हनी ट्रैप का इस्तेमाल है?

--क्या पूर्व विधायक भरत सिंह के क़त्ल का चश्मदीद गवाह होने की वजह से ही विपिन की जान ली गई है?

--क्या ये विपिन के साथ किसी की कोई और रंजिश का अंजाम है?

--या फिर क़त्ल के पीछे रिश्तों की उलझी पहेली या लव अफेयर की कहानी है?

विपिन नजफ़गढ़ के पूर्व विधायक भरत सिंह का ड्राइवर था और इसी साल 29 मार्च को जब एक पार्टी में भरत सिंह का क़त्ल हुआ, तब विपिन ना सिर्फ़ खुद ही भरत सिंह गाड़ी चलाता हुआ पार्टी वाली जगह यानी मौका ए वारदात पर पहुंचा था, बल्कि उसने तमाम क़ातिलों को क़रीब से भी देखा था. ऐसे में पुलिस ने जिन चार लोगों को भरत सिंह के क़त्ल का चश्मदीद गवाह बनाया था, उनमें विपिन भी एक था.

विपिन की सालों से भरत सिंह और उनके भाई किशन पहलवान से नज़दीकी से भी ये लग रहा था कि वो अदालत में क़ातिलों के खिलाफ़ एक मज़बूत गवाह साबित होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी वजह से क़ातिलों ने पीछा कर विपिन का क़त्ल कर दिया. कहनेवाले कह सकते हैं कि चार में सिर्फ़ एक गवाह की जान लेने से मामले पर वैसा कोई असर पड़ना मुमकिन नहीं है, लेकिन लोगों का कहना ये भी है कि जिस तरह सरेशाम विपिन का क़त्ल किया गया, उससे दूसरे गवाहों का भी होना लाज़िमी है.

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कौन है वो लड़की?

इसी अदावत और गैंगवार के बीच विपिन के साथ मौजूद एक रहस्यमयी लड़की की पहेली ने पुलिस को उलझा दिया है. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि विपिन के साथ बाइक से जापानी पार्क पहुंची लड़की आख़िर कौन थी? वैसे तो विपिन शादीशुदा था. लेकिन क्या वो विपिन की कोई गर्लफ्रैंड है, कोई जानकार या फिर कोई रिश्तेदार? सवाल ये भी है कि क़त्ल के वक़्त लड़की आख़िर रहस्यमयी तरीके से गायब क्यों हो गई? अगर वो विपिन की कोई गर्लफ्रैंड या रिश्तेदार होती, तो वो क़ातिलों से विपिन की जान बख्श देने की फ़रियाद कर सकती थी. लेकिन ऐसा करने के बजाय वो जिस तरह मौके से भाग खड़ी हुई, वो शक पैदा करता है. ऐसे में पुलिस को लग रहा है कि हो ना हो कहीं विपिन को उसके दुश्मनों ने इसी लड़की के ज़रिए तो नहीं फंसाया यानी क्या ये गैंगवार में हनीट्रैप का इस्तेमाल था?

वैसे एक गौर करनेवाली बात ये भी है कि भरत सिंह के क़त्ल के इल्ज़ाम में फिलहाल उसका दुश्मन नंबर एक उदयवीर सिंह काला और उसके गैंग के ज़्यादातर बदमाश सलाखों के पीछे हैं. ऐसे में अगर इस वारदात में काला का ही हाथ है, तो क्या इसके लिए काला ने सुपारी दी है या फिर काला की तरह ही भरत सिंह और किशन पहलवान के किसी और दुश्मन ने विपिन को अपना निशाना बनाया है? क़ातिलों ने जिस तरह भरत सिंह मर्डर केस के चश्मदीद गवाह विपिन सिरोही को सरेआम पीछा कर मौत के घाट उतारा, उसने भरत सिंह के क़त्ल का वाकया भी ताज़ा कर दिया.

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दिल्ली के नजफगढ़ में गैंगवार की ये कहानी कोई साल दो साल नहीं, बल्कि 25 साल पुरानी है. जब दिल्ली तेज़ी से तरक्की कर रही थी और भू-माफियाओं ने औने-पौने दाम पर करोड़ों की ज़मीन का सौदा शुरू कर दिया था, लेकिन ज़मीन की इसी सौदेबाज़ी ने तब के बाहुबलियों के बीच दुश्मनी की ऐसी बीज डाल दी कि उसका अंजाम आज भी दिख रहा है.

जिस गैंगवार ने नजफगढ़ के पूर्व विधायक भरत सिंह की जान ले ली, उसकी शुरुआत कोई साल-दो साल नहीं, बल्कि आज से तकरीबन 25 साल पहले हुई थी, जब भरत सिंह और उनके भाई किशन पहलवान ने जुर्म की दुनिया में पहली बार क़दम रखा था. इससे पहले दिल्ली में गैंगवार का कभी कोई इतिहास नहीं रहा, लेकिन किशन पहलवान ने तेज़ी से सोना बनती ज़मीन और प्रापर्टी के खेल में रातों-रात पैसा बनाने के लिए जुर्म की अंधी गलियारों से कुछ ऐसी दौड़ लगाई कि फिर कभी इससे बाहर नहीं निकल सका और अपने भाई किशन के साथ-साथ भरत सिंह भी जुर्म के इन गलियों से गुज़र कर दौलत और शोहरत बटोरते रहे. यह और बात है कि अपने भाई के मुकाबले भरत सिंह की पहचान थोड़ी अलग और साफ़-सूथरी थी, शायद इसी की बदौलत भरत सिंह ने सियासत की दुनिया में अपने भाई के मुकाबले जल्दी पैर जमाने में कामयाबी हासिल कर ली. उन्होंने पहले दिचाऊ वार्ड से निगम का चुनाव जीता और तब 2008 में पहली बार विधायक बने.

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हालांकि कोई 25 साल पहले इन दोनों भाइयों की पहली अदावत हुई अनूप-बलराज गैंग से, वही अनूप-बलराज जो किशन-भरत की तरह जुर्म की दुनिया में अपने पैर जमाने की कोशिश में लगे थे और इसके बाद तो इन भाइयों के बीच कब-कब और कहां-कहां कितनी बार भिड़ंत हुई, इसका सही-सही हिसाब किसी के पास नहीं वक्त के साथ अनूप-बलराज के पैर उखड़ गए लेकिन किशन-भरत तब तक इस खेल के माहिर खिलाड़ी बन चुके थे और साथ उनके दुश्मनों की एक नई पौध पैदा हो चुकी थी.

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