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गौरी लंकेशः निडर पत्रकार जिसे सुला दिया गया मौत की नींद, अब भी जांच में कई पेच

5 सितंबर 2017 में गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया गया था. अगर आज गौरी लंकेश जिंदा होतीं तो वो 58 साल की होतीं.

जांच में गौरी लंकेश की हत्या के पीछे दक्षिणपंथी संगठनों का हाथ सामने आया था (फाइल फोटो) जांच में गौरी लंकेश की हत्या के पीछे दक्षिणपंथी संगठनों का हाथ सामने आया था (फाइल फोटो)

  • 2017 में पत्रकार गौरी की गोली मारकर की गई थी हत्या
  • हत्या के कुछ घंटे पहले तक सोशल मीडिया पर एक्टिव थीं
  • तीखे लेखों की वजह से कट्टरपंथियों के निशाने पर थीं गौरी

29 जनवरी 1962 को दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश का जन्म कर्नाटक में हुआ था. 5 सितंबर 2017 में गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया गया था. अगर आज गौरी लंकेश जिंदा होतीं तो वो 58 साल की होतीं. आखिर कौन थी वो महिला पत्रकार, जिसे मारने के लिए रची गई थी एक खौफनाक साजिश. जिसका खुलासा करने में पुलिस अधिकारियों की एक बड़ी टीम ने करीब डेढ़ साल कड़ी मशक्कत की. आइए जानते हैं इस मामले में कब क्या हुआ.

- 5 सितंबर 2017 को गौरी लंकेश की हत्या के बाद मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए थे. हर एंगल से इस हत्याकांड की जांच कराने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठित कर दिया.

- राज्य पुलिस के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी अतिरिक्त पुलिस आयुक्त बी. के. सिंह और उपायुक्त एम. एन. अनुचेत को इस हत्याकांड की जांच का जिम्मा सौंपा गया. उन्होंने नक्सल और दक्षिणपंथी हिंदुत्व वाले एंगल पर मामले की जांच की.

- एसआईटी महीनों तक अंधेरे में तीर चलाती रही. उसे आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. लाखों टेलीफोन कॉल चेक की गईं. हजारों संदिग्धों से पूछताछ की गई. फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस अधिकारी परेशान थे.

- फरवरी 2018 में इस केस में पहला सुराग मिला. पुलिस ने नवीन कुमार उर्फ हॉटी मंजा नामक एक बदमाश को गिरफ्तार किया. उसके पास से अवैध हथियार बरामद हुआ. 7 दिन की पूछताछ के बाद उसने गौरी लंकेश के हत्यारों की मदद करने की बात कुबूल की.

- पुलिस अधिकारी एमबी सिंह और अनुचेता की टीम तीन महीने की कड़ी मशक्कत के बाद गौरी लंकेश के हत्यारे तक जा पहुंची. उसकी पहचान 25 वर्षीय परशुराम वाघमारे के रूप में हुई. वह उत्तरी कर्नाटक के बीजापुर जिले के सिंधगी कस्बे का रहने वाला है. जहां वो एक दुकान चलाता था.

- जांच में एसआईटी को पता चला कि शातिर आरोपी परशुराम वाघमारे के संबंध कट्टरपंथी संगठन श्री राम सेने और सनातन संस्था से थे. इसके बाद एसआईटी की टीम उसे बेंगलुरु सीआईडी ऑफिस में मौजूद अपने दफ्तर ले आई और वहां उससे लंबी पूछताछ की गई.

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- सख्त पूछताछ के सामने परशुराम वाघमारे टूट गया. उसने कुबूल किया कि किसी के कहने पर उसने पत्रकार गौरी लंकेश का मर्डर किया है. क्योंकि वह हिंदू समाज की भावनाओं को आहत कर रही थी. उसने इस हत्या की साजिश में शामिल दूसरों लोगों के नाम भी उजागर कर दिए.

- जांच में पता चला कि सभी आरोपी केवल साक्षर भर थे. उन्हें दुनियादारी के बारे में ज्यादा पता नहीं था. उन्हें ब्रेनवॉश करके गौरी लंकेश की हत्या का काम सौंपा गया था. गिरफ्तारी से बचने के लिए खासा प्लान तैयार किया गया था. वे उस रास्ते से गौरी लंकेश के घर पहुंचे थे, जहां कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं था. हत्या के बाद आरोपी फौरन शहर छोड़ कर चले गए थे. उनका प्रोफाइल काफी लो था.

- पुलिस के हाथ बड़ी कामयाबी लग चुकी थी लेकिन अभी तक इस हत्याकांड की साजिश रचने वाला शातिर मास्टर माइंड पुलिस की पहुंच से बाहर था. अब पुलिस की एसआईटी उसे पकड़ने की योजना पर काम कर रही थी.

- जांच में पता चला कि कातिलों के तार महाराष्ट्र में दाभोलकर और पनसारे हत्याकांड से भी जुड़े हो सकते हैं. लिहाजा महाराष्ट्र पुलिस की टीम ने बेंगलुरू आकर साक्ष्य जुटाए थे.

- उधर, श्रीराम सेने के संस्थापक प्रमोद मुतालिक ने गौरी के हत्यारों का अपने संगठन से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया था. उनका दावा था कि वाघमारे आरएसएस का कार्यकर्ता है. इसके बाद आरएसएस ने भी इस तरह के आरोपों को पूरी तरह नकार दिया था.

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- जांच अधिकारियों को इनपुट मिला था कि पुणे का एक इंजीनियर आमोल काले और अमित दिगवेकर ही गौरी और कुलबर्गी, पंसारे और दाबोलकर की हत्याओं का मास्टर माइंड हैं. इस मामले में एक बाद एक करीब आधा दर्जन आरोपी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. हालांकि अभी भी इस मामले की जांच बंद नहीं हुई है. कई पेच ऐसे हैं, जिन्हें एसआईटी को सुलझाना है.

- इसी दौरान अगस्त 2019 में कर्नाटक सरकार ने गौरी लंकेश जांच से जुड़ी एसआईटी को उम्दा जांच के लिए 25 लाख रुपए का सम्मान दिया. प्रदेश सरकार ने ही इन अधिकारियों को सम्मानित करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से सिफारिश की थी. इसके बाद जांच अधिकारी (आईपीएस) एमएन अनुचेत, डिप्टी एसपी रंगप्पा और इंस्पेक्टर राजा को केंद्र सरकार ने 'केंद्रीय गृह मंत्री पदक' से सम्मानित किया. अनुचेत और उनकी टीम के 40-50 अधिकारियों ने 15-16 महीने में गौरी लंकेश हत्या मामले की गुत्थी सुलझा लेने का दावा किया था.

- 10 जनवरी 2020 को पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के एक और आरोपी ऋषिकेश देवडीकर को झारखंड के धनबाद से गिरफ्तार कर लिया गया. बेंगलुरु की एसआईटी ने एक पेट्रोल पंप पर छापेमारी कर आरोपी ऋषिकेश को गिरफ्तार किया. 44 वर्षीय ऋषिकेश सुराग और सबूतों की तलाश में उसके घर की तलाशी भी ली गई थी.

हत्या से पहले ट्विटर पर एक्टिव थीं गौरी

बताते चलें कि 2017 में गौरी लंकेश ने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के खिलाफ एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसके कारण उनके खिलाफ मानहानि का केस दायर किया गया. इस मामले में उन्हें 6 महीने की जेल हुई थी. गौरी ने कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर. के. दत्ता से बात करते हुए अपने जीवन को खतरा बताया था. हत्या के कुछ घंटे पहले तक गौरी सोशल मीडिया पर एक्टिव थीं. उन्होंने रोहिंग्या से जुड़ी खबरों के लिंक शेयर किए और कई ट्वीट्स को री-ट्वीट किया. अपने आखिरी ट्वीट में फेक पोस्ट पर लिखा था, 'हम लोगों में से कुछ लोग फेक पोस्ट शेयर करने की गलती कर देते हैं. चलिए एक्सपोज करने की कोशिश के बजाए इसके प्रति एक-दूसरे को सतर्क किया जाए.'

ऐसा हुआ था गौरी का मर्डर

5 सितंबर 2017 को गौरी लंकेश को बेंगलुरु में उस वक्त मौत के घाट उतार दिया गया था, जब वे जब राज राजेश्वरी नगर स्थित अपने घर लौटकर दरवाज़ा खोल रही थीं. ठीक उसी वक्त हमलावरों ने उन पर गोलियां बरसाई थीं. उनके सीने में दो और सिर पर एक गोली लगी थी. गोली लगने से मौका-ए-वारदात पर ही गौरी लंकेश की मौत हो गई थी. बेंगलुरु के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सुनील कुमार ने मीडिया को बताया था कि 5 सितंबर की शाम गौरी जब अपने घर लौटी, तब उनके घर के बाहर ये हमला हुआ था." गौरी के हत्या पर देश के पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने खासा रोष जताया था. दिल्ली में प्रेस क्लब और जंतर-मंतर पर इस हत्याकांड के विरोध में शांतिपूर्वक धरना भी आयोजित किया गया था.

कौन थीं गौरी लंकेश

गौरी का जन्म 29 जनवरी 1962 को कर्नाटक के एक लिंगायत परिवार में हुआ था. उनके पिता पी. लंकेश कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक, कवि एवं पत्रकार थे. वे पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता भी थे. 1980 में उन्होंने लंकेश नामक कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका की शुरुआत की थी. उनकी तीन संतानें थी- गौरी, कविता और इंद्रजीत. कविता ने फिल्म को पेशे के रूप में अपनाया और कई पुरस्कार जीते. गौरी ने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाने का निश्चय किया. पत्रकार के रूप में उनके पेशेवर जीवन की शुरुआत बेंगलुरू में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से हुई. चिदानंद राजघट्ट से विवाह करने के बाद वे कुछ दिन दिल्ली रहीं. इसके बाद पुनः बेंगलूरू लौटकर उन्होंने 9 सालों तक 'संडे' मैग्जीन में संवाददाता के रूप में काम किया. उनकी अंग्रेजी और कन्नड़ भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी. उन्होंने बेंगलूरू में रहकर मुख्यतः कन्नड़ में पत्रकारिता करने का निर्णय किया.

वर्ष 2000 में उनके पिता पी. लंकेश की मृत्यु हो गई. उस समय गौरी इनाडु के तेलुगू चैनल में कार्यरत थीं. तब तक वे पत्रकारिता में 16 वर्ष पूरे कर चुकी थीं. पिता की मौत के बाद गौरी ने अपने भाई इंद्रजीत के साथ 'लंकेश पत्रिके' के प्रकाशक मणि से मिलकर उसे बंद करने को कहा. मणि ने इससे इनकार किया और पत्रिका का प्रकाशन जारी रखने पर उन्हें मना लिया. गौरी ने लंकेश साप्ताहिक अखबार का संपादन दायित्व संभाला और इंद्रजीत ने व्यवसायिक दायित्व. किंतु दोनों में 2001 तक आते-आते पत्रिका की विचारधारा को लेकर मतभेद पैदा हो गए. 2005 में ये मतभेद खुलकर सबके सामने आ गए, जब पत्रिका में गौरी की सहमति से पुलिस पर नक्सलवादियों के हमला करने से संबंधित एक रिर्पोट छपी.

13 फरवरी 2005 को पत्रिका के मुद्रक प्रकाशक इंद्रजीत ने नक्सलियों का समर्थन करने का आरोप लगाकर वो रिर्पोट वापस ले ली. 14 फरवरी को उसने गौरी के खिलाफ पुलिस में प्रकाशन कार्यालय से कंप्यूटर, प्रिंटर और स्कैनर चुराने की शिकायत की. गौरी ने भी इंद्रजीत की बंदूक दिखाकर धमकी देने की शिकायत की. 15 फरवरी को इंद्रजीत ने पत्रकार वार्ता बुलाकर गौरी पर पत्रिका के जरिए नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. गौरी ने भी पत्रकार वार्ता कर इसका खंडन किया और कहा कि भाई का विरोध उसके सामाजिक सक्रियतावाद से है. इसके बाद उन्होंने अपनी कन्नड़ साप्ताहिक अखबार 'गौरी लंकेश पत्रिके' का प्रकाशन शुरु किया था.

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