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दिल्‍लीः बेखौफ बदमाश, लाचार पुलिस, कहीं भी आप बन सकते हैं गोली का शिकार

सिर्फ पिछले छह महीने के अंदर दिल्ली के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक सड़कों पर शूटआउट की 12 वारदातें हो चुकी हैं. महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर पहले ही दिल्ली पुलिस पर सवाल उठते रहे हैं. अब तो सड़क पर भी कोई सुरक्षित नहीं है.

अपराधी दिल्ली में खुलेआम पुलिस को चुनौती दे रहे हैं अपराधी दिल्ली में खुलेआम पुलिस को चुनौती दे रहे हैं

ऐसा होता तो नहीं है. ना कभी हुआ है कि पूरी दिल्ली पुलिस एक साथ छुट्टी पर चली गई हो. मगर क्या करें. जब 15-15 जिला पुलिस और 209 थानों के रहते दिल्ली की सड़कों पर ऐसी तस्वीरें आम दिनों की बात लगने तो शक होता है कि सचमुच दिल्ली में पुलिस है भी या नहीं? और अगर है और छुट्टी पर भी नहीं है तो फिर बदमाशों के अंदर पुलिस का खौफ क्यों नहीं है?

सिर्फ पिछले छह महीने के अंदर दिल्ली के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक सड़कों पर शूटआउट की 12 वारदातें हो चुकी हैं. महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर पहले ही दिल्ली पुलिस पर सवाल उठते आ रहे हैं. अब तो सड़क पर कब, कौन, कहां किसी गोलीबारी में फंस जाए इसकी भी गारंटी नहीं है.

अब तो लगता है कि खामखा हम लोग यूपी बिहार को कोसते हैं. डी-कंपनी के शूटरों को बेवजह भाव देकर उनका रेट बढ़ाते हैं. पर्दे पर शूटआउट के सीन देख कर ऐंवई ताली बजाते हैं. बैठे होंगे दिल्ली में देश के सरकार. चलता होगा देश दिल्ली के इशारे पर. पर इनके आगे दिल्ली में किसी की नहीं चलती. इन्होंने तो मुंबई के शूटरों को भी मात दे दी है. ये एक तस्वीर सिर्फ तस्वीर भर नहीं है. बल्कि ये दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और पूरी दिल्ली पुलिस के गिरते जलाल और इक़बाल के ज़िंदा सबूत हैं.

जो दिल्ली साल के 365 दिन रेड और हाई अलर्ट पर सांसें लेत हो उसी दिल्ली में सरे-राह इस तरह किसी को गोलियों से छलनी करना इतना आसान होगा सोच से परे की चीज हैं. याद नहीं आता दिल्ली का कोई भी ऐसा कोना बचा हो जहां से ऐसी तस्वीरें ना आई हों. सड़क पर इस तरह शूटआउट का ट्रेंड इस तेजी से बढ़ गया है कि पुलिस नाम की चीज से भरोसा ही उठ गया है.

कैसी पुलिस और काहे का पुलिस का खौफ. इस शूटर को देख कर कहीं से भी ज़रा सा भी अहसास होता है कि इसे पुलिस-कानून का कोई खौफ भी होगा. साफ है कि दिल्ली की नाक ये पुलिस मुख्यालय और इस मुख्यालय में बैठने वाले पुलिस मुखिया अमूल्य पटनायक और उनकी फोर्स का खौफ अपराधियों के दिलों से जाता रहा है. अगर ऐसा नहीं होता तो खुलेआम सड़क पर ये सब नहीं होता.

तस्वीरें दिल्ली के द्वारका की हैं. उसी द्वारका की जहां कुछ दिन पहले ही बदमाशों के बीच हुए मुठभेड़ की तस्वीरों ने सिहरन पैदा कर दी थी. ये तस्वीर 24 सितंबर की है. शाम के चार बजे बजे थे. जगह द्वारका मोड़ था. एक चौड़ी सी गली का सीन है. गली के दाईं तरफ तीन कारें पार्क हैं. बाईं तरफ भी तीन ही कार पार्क नज़र आ रही हैं. कार के बीच में एक बाइक भी खड़ी है. सामने की तरफ सड़क पर अच्छी खासी आवाजाही है.

दाईं तरफ सबसे आगे सफेद रंग की एक कार खड़ी है. इसी कार के ड्राइवर वाली सीट पर बैठे शख्स से एक दूसरा शख्स कुछ बात करता है और सामने की तरफ चला जाता है. उसके जाने के बाद ड्राइवर की सीट पर बैटा शख्स कार का दरवाजा बंद कर लेता है. सामने से एक महिला चली आ रही है.

पर जैसे ही महिला कार को क्रास करने लगती है अचानक वो घबरा जाती है. ठीक उसी वक्त कार भी अचानत सामने की तरफ बढ़ने लगती है. महिला तो निकल जाती है. मगर कार फंस जाती है. क्योंकि तब तक कंधे पर बैग लटकाए और हेलमेट से चेहरा छुपाए एक लड़का ठीक कार के सामने आ जाता है. उसके हाथ में पिस्टल थी. कार के सामने आते ही वो पहली गोली कार के फ्रंट शीशे के अंदर ठीक उस जगह का निशाना लेकर चलाता है, जहां पर ड्राइवर बैठा होता है. इसके बाद अगले ही सेकेंड वो ड्राइवर की तरफ वाली विंडो से गोली दागता है.

ड्राइवर की सीट पर बैठे शख्स को अब तक अहसास हो चुका था कि ये उस पर हमला है. लिहाज़ा वो किसी तरह गाड़ी को आगे भगाने की कोशिश करता है. वो गाड़ी से उस हमलवार को भी कुचलने की कोशिश करता है. मगर तब तक गोली चालाते शूटर बराबर में गोड़ी दूसरी कार के छत पर चढ़ जाता है. इधर, जैसे ही वो छत पर चढ़ता है. कार में बैठा शख्स तेजी से दरवाजा खोल कर दोनों हाथों से कमर पकड़े सामने की तरफ भागता है. शायद उसे तब तक गोली लग चुकी थी.

अब हमलावर कार की छत पर चढ़ कर उस भागते हुए शख्स पर निशाना लगाता है. पर शायद चैंबर में गोली फंस जाती है. वो दो बार फायर करता है. इसके बाद पिस्टल को चेक करते हुए कार से उतर कर भाग जाता है. कुछ दूरी पर हमलवार की बाइक पार्क थी. वो बाइक पर बैठता है और निकल जाता है.

जिस शख्स को गोली मारी गई उसका नाम नरेंद्र है. नरेंद्र प्रापर्टी डीलर है. जहां पर उसे गोली मारी गई उसके ठीक सामने उसका दफ्तर है. नरेंद्र को दो गोली लगी. और इन्हीं दो गोलियों ने उसकी जान ले ली. ज़ाहिर है हमलावर नरेंद्र का दुश्मन था और नरेंद्र को ठिकाने लगाने के लिए शूटर भेजा था.

सिर्फ पिछले छह महीने में दिल्ली की सड़कों पर खुलेआम शूटआउट की ये बारहवीं वारदात है. अब आप ही बताइए. खाली यूपी-बिहार को कोसना कहां तक सही है?

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