करीब पौने तीन लाख लोगों की जान और 41 लाख से ज्यादा लोगों को बीमार कर देने वाला कोरोना अगर सिर्फ एक महामारी है तो गनीमत है. लेकिन अगर ये साजिश है तो यकीन मानिए कोरोना के खत्म होने के बाद एक नई जंग शुरू हो जाएगी. और अगर ऐसा हुआ तो बहुत मुमकिन है कि ये मौजूदा कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो. क्योंकि ऐसी सूरत में तब एक तरफ चीन होगा और दूसरी तरफ पूरी दुनिया.
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दरअसल, जब से कोरोना वायरस ने दुनिया को अपनी चपेट में लिया है, तभी से पूरी दुनिया चीन की तरफ देख रही है. दुनिया के तमाम देश एक सुर में इस जानलेवा वायरस को चीन की देन बता रहे हैं. और सबसे बड़ी बात कि चीन के साथ साथ इसमें अमेरिका का हाथ भी सामने आ रहा है.
चीन के जिस वुहान शहर से कोरोना का वायरस फैला और वुहान के जिस वायरोलॉजी लैब से इसके लीक होने की खबर आ रही है जानते हैं, वुहान की उस लैब को चमगादड़ पर रिसर्च के लिए फंड कौन दे रहा था? किसकी सिफारिश से ये फंड पास हुआ? तो चौंकने के लिए तैयार हो जाइए. वो कोई और नहीं बल्कि अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीसेज यानी NIAID के यही डायरेक्टर डॉक्टर एंथनी फाउची हैं.
डॉक्टर एंथनी फाउची ने 2017 में ही इस महामारी की भविष्यवाणी कर दी थी. इन्हीं की सिफारिश पर 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वुहान वायरोलजी लैब को 3.7 मिलियन डॉलर यानी करीब 28 करोड़ करोड़ रुपए का फंड दिया था. यह फंड कोरोना वायरस पर रिसर्च के लिए था और ये फंड ट्रंप के कार्यकाल में भी जारी रहा.
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आपको बता दें कि चीन की वुहान लैब को अमेरिका के जिस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ यानी NIH से फंडिंग मिल रही है, वो बॉयोमेडिकल और पब्लिक हेल्थ रिसर्च को करने वाला अमेरिका का सरकारी संस्थान है. वुहान के लैब की वेबसाइट पर NIH का नाम बाकायदा पार्टनर कंपनी के तौर पर दर्ज है. हालांकि अब ये खुलासा होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस ग्रांट पर रोक लगा दी है