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Inside Story: 21 साल का बदला, 6 महीने की प्लानिंग... ऐसे अमेरिका ने अंजाम दिया 'ऑपरेशन जवाहिरी' को

उस बालकनी में दुनिया के सबसे बडे आतंकी संगठन यानी अल कायदा का चीफ अयमान अल जवाहरी ताजी हवा लेने के इरादे से चहलकदमी कर रहा था. मगर तभी आसमान से एमक्यू-9 ड्रोन ने तेजधार ब्लेड्स से भरे दो आर-9-एक्स हेलफ़ायर मिसाइल फायर किए और इन मिसाइलों ने जवाहरी को निशाना बना डाला.

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जवाहिरी को अमरिकी एमक्यू-9 ड्रोन ने अपना निशाना बनाया जवाहिरी को अमरिकी एमक्यू-9 ड्रोन ने अपना निशाना बनाया

अमेरिका ने आख़िरकार अल कायदा के चीफ अयमान अल जवाहिरी के गुनाहों का भी हिसाब कर ही दिया. जवाहिरी ने ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसकी जगह ली थी. 9/11 हमले के पूरे 21 साल बाद अमेरिका ने काबुल में जवाहिरी को तब निशाना बनाया, जब वो रविवार की सुबह अपने घर की बालकनी में मौजूद था. उस पर करीब 50 हज़ार फीट की ऊंचाई से ड्रोन के ज़रिए हेलफायर मिसाइल दागी गई. जिसके तेजधार ब्लेड्स ने पलक झपकते जवाहरी के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. लेकिन बेहद खुफिया जिंदगी जीने वाले इस आतंकी को आखिर अमेरिका ने इतने सटीक तरीके से कैसे टार्गेट किया? इस ऑपरेशन के पीछे का खुफिया मिशन हैरान करनेवाला है.

अमेरिकन एमक्यू-9 ड्रोन का कमाल 
वो मंजर बिल्कुल किसी फिल्मी सीन की तरह था. वो रविवार की सुबह थी. तारीख थी 31 जुलाई 2022. समय था सुबह के 6 बजकर 18 मिनट. अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के आसमान पर अभी सूरज की किरणें छाने की तैयारी कर रही थी. पूरे काबुल के ज़्यादातर लोग ही उनींदे हालत में थे, लेकिन शहर के आसमान पर सबकी निगाहों से दूर करीब 50 हज़ार फीट की ऊंचाई पर एक अमेरिकन एमक्यू-9 ड्रोन अपने टारगेट के इंतजार में लगातार चक्कर लगा रहा था. ये ड्रोन तो बेशक आसमान में कोई चंद मिनटों से ही उड़ रहा था, लेकिन ये इंतजार पूरे 21 सालों का था.

फायर किए गए हेलफायर मिसाइल
और आख़िरकार वो घडी भी आई, जब टारगेट खुली जगह पर नजर आया. ये जगह थी काबुल के शेरपुर जिले के पॉश इलाके में मौजूद एक इमारत की वो बालकनी, जहां दुनिया के सबसे बडे आतंकी संगठन यानी अल कायदा का चीफ अयमान अल जवाहरी ताजी हवा लेने के इरादे से चहलकदमी कर रहा था. मगर तभी आसमान से एमक्यू-9 ड्रोन ने तेजधार ब्लेड्स से भरे दो आर-9-एक्स हेलफ़ायर मिसाइल फायर किए और इन मिसाइलों ने जवाहरी को निशाना बना डाला और इसी के साथ पलक झपकते आतंक के सबसे बड़ा आका का खात्मा हो चुका था.

ऐसे हुआ आतंक के आका का ख़ात्मा
वो आका जिसने ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद आज से ठीक 11 साल पहले अल कायदा की कमान संभाली थी और जो लगातार सालों-साल पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों में छुप-छुपा कर अब भी पूरी दुनिया में आतंक एक्सपोर्ट करने में लगा था. लेकिन रविवार की सुबह बेगुनाहों की जान लेनेवाले इस आतंकी सरगना की जिंदगी की आखिरी सुबह साबित हुई. हेलफायर मिसाइलों से निकले ब्लेड्स ने 71 साल के इस आतंकी के जिस्म को छलनी कर दिया था. और इसी के साथ अमेरिका पर हुए अब तक के सबसे बड़े और सबसे खौफनाक आतंकी हमले यानी 9-11 के करीब 3000 पीड़ितों को इंसाफ मिल गया. क्योंकि ये जवाहरी ही था, जिसने ओसामा बिन लादेन के साथ मिलकर ट्विन टावर और पेंटागन पर हवाई जहाज से हमले की ख़ौफनाक साजिश रची थी. 

वैसे जवाहरी सिर्फ 9-11 का गुनहगार ही नहीं था, बल्कि उसने तंजानिया, केन्या जैसे देशों में अमेरिकी दूतावासों पर हुए हमलों समेत और भी कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया था. ऐसे में जवाहिरी की मौत के साथ अब ये कहा जा सकता है कि 21 साल बाद ही सही अमेरिका का इंतकाम पूरा हुआ. यही वजह है कि इस ऑपरेशन के पूरा होने के एक दिन बाद यानी सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा 'इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसमें कितना वक्त लगता है, अगर आप हमारे लोगों के लिए खतरा हैं, तो अमेरिका आपको हर हाल में ढूंढ निकालेगा और आपको आपके अंजाम तक पहुंचाएगा, फिर चाहे आप जहां कहीं भी छुपे हों.'

21 साल से पीछा कर रहा था अमेरिका
वैसे तो जवाहरी जैसों को मारने का ये मिशन उसी दिन से शुरू हो गया था, जिस दिन इन आतंकियों ने अमेरिका पर हमला किया था, लेकिन इस ऑपरेशन के आखिरी चरण की शुरुआत अब से कोई छह महीने पहले तब शुरू हुई, जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने जवाहिरी के मूवमेंट को सही मायने में ट्रैक करना शुरू कर दिया था. अब अमेरिका के पास उसके सेफ हाउस यानी छुपने की जगह, उसके डेली रूटीन, उसके परिवार के एक-एक सदस्य का ब्यौरा आदि सबकुछ था. अपैल महीने में अमेरिकी एजेंसियों को अल जवाहिरी और उसके परिवार के बारे में और भी सटीक खुफिया जानकारी मिलने लगी. सीआईए को पता चला कि जवाहरी अब अपनी पत्नी और बेटियों के साथ काबुल के नए सेफ हाउस में शिफ्ट हो चुका है, जो कभी काबुल में रहे अमेरिकी दूतावास के बेहद करीब मौजूद है. 

सीआईए की रिपोर्ट के मुताबिक जवाहिरी और उसके परिवार के सुरक्षा की जिम्मेदारी दुनिया के एक और बदनाम आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क के ज़िम्मे थी, जिसके अल कायदा और तालिबान जैसों के साथ बेहद अच्छे ताल्लुकात हैं. वहीं हक्कानी नेटवर्क जिसके आका सिराजुद्दीन हक्कानी के पास इन दिनों अफगानिस्तान के गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है. ये समझा जाता है कि जवाहिरी इन दिनों जिस मकान में रह रहा था, वो मकान भी किसी और का नहीं बल्कि इसी सिराजुद्दीन हक्कानी के किसी बेहद करीबी गुर्गे का है.

छह महीने से मिल रही थी खुफिया रिपोर्ट
पूरे छह महीने तक सीआईए और दूसरी अमेरिकी एजेंसियां लगातार इस इमारत में अल जवाहिरी की मौजूदगी को कनफर्म करती रहीं. गुप्तचर लगातार जवाहिरी को इस मकान की बालकनी में महीनों तक घूमते-बैठते चहलकदमी करते देखते रहे और सीआईए उसके एक-एक दिन के मूवमेंट का पूरा हिसाब किताब दर्ज करती रही. अलग-अलग इंटेलिजेंस सूत्रों से मिल रही जानकारी के आधार पर अमेरिकी जासूसों ने उस मकान का एक छोटा मॉडल भी तैयार किया, जिसमें इन दिनों जवाहरी रह रहा था. ताकि उस मॉडल के जरिए उस मकान में उसकी मौजूदगी और मूवमेंट को अच्छी तरह से समझा जा सके और उसी के मुताबिक हमले की प्लानिंग की जा सके.

ऐसे की गई हमले की पूरी तैयारी
वैसे तो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को जवाहिरी को लेकर मिल रही इन जानकारियों के बारे में पूरे मई और जून महीने तक समय-समय पर लगातार ब्रीफ किया जाता रहा लेकिन ये पहली जुलाई की तारीख थी, जब बाइडेन ने अपने कैबिनेट मेंबर्स के साथ मिलकर सिचुएशन रूम में जवाहिरी की मौत के परवाने पर दस्तखत किए यानी उसे मार गिराने का फाइनल हुक्म दिया. सूत्रों की मानें तो बाइडेन ने सीआईए के इस प्लान की बारीकियों को ना सिर्फ बडे गौर से समझा, बल्कि उन्होंने अमेरिकी अफसरों से इस प्लान को लेकर कई सवाल भी पूछे. असल में बाइडेन दो बातें तय करना चाहते थे. पहला तो ये कि अमेरिका का ये वार किसी भी कीमत पर खाली ना जाए और दूसरा ये कि जवाहिरी के अलावा इस हमले में उसके परिवार का दूसरा कोई भी मेंबर न मारा जाए. 25 जुलाई को अफसरों ने अमेरिकी कैबिनेट को हमले की पूरी प्लानिंग का ब्लूपिंट सौंपा.

कहते हैं कि बाइडेन ने इस दौरान एजेंसियों से जवाहिरी को निशाना बनाने के दूसरे तौर तरीकों के बारे में भी पूछा और आखिरकार सर्वसम्मति से यानी सबकी राय से ड्रोन हमले का वो प्लान चुना गया, जो आस-पास के इलाके में कम से कम जानी नुकसान करे और अपने टारगेट को इस तरह पिन प्वाइंट तरीके से हिट करे कि उसके पास बचने की कोई गुंजाइश ही ना हो.

मौत बन कर बरसी हेलफायर मिसाइल
इस लंबी चौड़ी प्लानिंग के बाद 1 अगस्त की सुबह ठीक 6 बजकर 18 मिनट पर अमेरिकी ड्रोन से दागे गए हेलफायर मिसाइल ने अपने घर की बालकोनी में टहल रहे जवाहरी को छलनी कर दिया. खास बात ये रही इतने खौफनाक हमले के दौरान जवाहिरी का पूरा परिवार उसके साथ उसी मकान में मौजूद था, लेकिन ये हमला इतना सटीक और नपातुला था कि उन्हें कोई नुकसान ही नहीं हुआ. वैसे तो हक्कानी नेटवर्क ने इस हमले से नाखुशी जताई, लेकिन उसने कहा कि इसके फौरन बाद उन्होंने जवाहिरी के पूरे परिवार को दूसरे सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचा दिया है.

वैसे तो अमेरिकी अफ़सर ड्रोन स्ट्राइक में इस आतंकी सरगना के मारे जाने को लेकर पूरी तरह कनफर्म थे, लेकिन इस कार्रवाई पर अधिकारिक मुहर लगाने से पहले से अमेरिका ने इसे लेकर और सटीक जानकारियों के सामने आने का इंतजार किया और तब जाकर सोमवार की रात को राष्ट्रपति बाइडेन अपने देश के लोगों से मुखातिब हुए और जवाहिरी के मारे जाने की खबर दी.

जवाहिरी पर था 25 मिलियन डालर का इनाम 
अपने जीते जी एफबीआई की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में ऊपर जगह बनानेवाले अल जवाहरी के बारे में कोई भी जानकारी देनेवाले को अमेरिका ने 25 मिलियन डालर के इनाम का ऐलान किया था. जवाहिरी का जन्म मिस्र के कायरो के एक अमीर परिवार में हुआ था. वो 90 के दशक में तब लोगों की निगाहों में आया, जब उसने ओसामा बिन लादेन के साथ मिलकर अल कायदा के बैनर तले दुनिया को दहलाने की शुरुआत की थी.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान में छुपा था जवाहिरी
वैसे तो अमेरिका तभी से अल जवाहिरी के पीछे पड़ा था, जबसे 9-11 की वारदात हुई थी. लेकिन उसे निशाना बनाने का मौका अमेरिका को पूरे 21 साल बाद मिला. ओसामा के मारे जाने के बाद अल कायदा की कमान संभालनेवाला जवाहिरी कभी पाकिस्तान में छुपता रहा, तो कभी अफगानिस्तान में पनाह लेता रहा. लेकिन इस दौरान वो सार्वजनिक जीवन से दूर लगातार पर्दे के पीछे ही रहा. ऐसे में उसकी पहचान कर उसे निशाना बनाना कोई हंसी खेल नहीं था, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने उसकी जिंदगी से जुडी बारीक से बारीक जानकारी जुटाई और आखिरकार उसकी रूटीन लाइफ ही उसकी मौत की वजह बन गई.

21 साल की कड़ी मेहनत का नतीजा
दुनिया के सबसे बड़े आतंकियों में से एक अयमान अल जवाहरी को अमेरिका ने यूं ही नहीं मार गिराया. बल्कि इसके पीछे 21 सालों की वो मेहनत थी, जिसके लिए कहा जा सकता है कि जब तक तोडेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं. जी हां, अमेरिका ने कुछ इसी तर्ज पर जवाहिरी का पीछा किया और उसे उसके अंजाम तक पहुंचा दिया. लेकिन इस ऑपरेशन को कामयाब बनाने के लिए अमेरिकी अफसरों ने जो पापड बेले, उसके बारे में जानना भी बेहद जरूरी है.

जवाहिरी के बारे में जुटाई गई थी हर जानकारी
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और उसके अफसरों को क़रीब छह महीने पहले जवाहिरी के इस नए ठिकाने का पता चल चुका था. इसके बाद अमेरिकी जासूसों ने पहले उसके घर का एक छोटा मॉडल तैयार किया और फिर जवाहिरी की जीवन शैली यानी पैटर्न ऑफ लाइफ के बारे में बारीक से बारीक जानकारी जुटानी शुरू की. मसलन वो कितने बजे उठता है, किससे मिलता है, किससे बातें करता है, कब खाता है, कब सोता है वगैरह और उसकी जीवनशैली को लेकर जुटाई गई इन बारीक से बारीक जानकारियों की बदौलत ही उसे जवाहिरी को इतने सटीक तरीके से टार्गेट करने में कामयाबी मिली.

बालकनी में टहलना बना मौत का सबब
अमेरिकी इंटेलिजेंस एक्सपर्ट्स को ये पता चल चुका था कि उस मकान में जवाहिरी हर रोज़ सुबह बालकनी में कुछ देर के लिए जरूर टहलता और बैठता है यानी वो हर रोज सुबह बालकनी में नजर आता है और बस इसी सटीक जानकारी की बदौलत जवाहिरी पर मिसाइल अटैक मुमकिन हुआ. जवाहिरी के परिवार ने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद पिछले साल इस मकान में रहने की शुरुआत की थी. लेकिन उन दिनों जवाहिरी के यहां होने के बारे में खुफिया एजेंसियों के पास बिल्कुल शुरुआती जानकारी थी यानी उन्हें पहले ये कनफर्म करना था कि ये जवाहिरी ही है या नहीं. ऊपर से शहर की एक घनी आबादी वाले इलाके में किसी को निशाना बनाने में हुई मामूली सी चूक या लापरवाही भी सैकडों बेगुनाहों की जान ले सकती थी. ऐसे में अमेरिका ने अपने ऑपरेशन को सटीक और कामयाब बनाने के लिए हर वो जतन किए, जो करने चाहिेए थे.

पूरी जानकारी के बाद हमले की तैयारी
इस कोशिश में अलग-अलग एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट से मकान में जवाहिरी की मौजूदगी को लेकर राय ली गई और जब तकरीबन सभी की राय एक जैसी सामने आई, तो फिर अगले चरण के लिए आगे बढ़ने का फैसला हुआ. जवाहिरी जिस इमारत में रह रहा था, उससे जुड़ी छोटी से छोटी इंजीनियरिंग की डिटेल जुटाई गई, ताकि ये पता चल सके कि यहां किस तरह के हमले से टारगेट को हिट किया जा सकता है और कैसा हमला इस इमारत और इसके आस-पास रहनेवाले दूसरे लोगों को नुकसान पहुंचा सकता है. इस काम में अमेरिकी एजेंसियों को कई महीनों का वक्त लगा. अमेरिकी एजेंसियों को कोई एक या दो बार नहीं बल्कि जवाहरी के अपने इस मकान के बालकनी में वक्त गुजारने की लगातार जानकारी मिलती रही और जब ये पूरी तरह से वहां जवाहिरी की मौजूदगी कनफर्म हो गई, तभी अमेरिका ने उसे निशाना बनाने का फैसला किया.

अमेरिकी आर-9 एक्स हेलफायर मिसाइल
अब आइए जान लेते हैं उस अमेरिकी आर-9 एक्स हेलफायर मिसाइल के बारे में जिससे अल जवाहरी को टार्गेट किया गया. R9X हेलफायर मिसाइल को ड्रोन और हेलिकॉप्टर के अलावा फाइटर जेट से भी दागी जा सकती है. इसकी चोंच पर कैमरे और सेंसर्स लगे होते हैं, जो विस्फोट के पहले तक हर मूवमेंट को रिकॉर्ड करते रहते हैं. साथ ही विस्फोट से पहले टारगेट को सेंस करते हैं. इसमें बारूद की मात्रा बेहद कम होती है और तेज धार वाले धातु के ब्लेड्स लगे होते हैं. जो अलग-अलग कई लेयर में लगाए जाते हैं. मिसाइल दागे जाने पर छह ब्लेड्स का एक सेट निकलता है. जो अपने टार्गेट को टुकड़ों में काट डालता है. ये सिर्फ उसी टारगेट को नुकसान पहुंचता है, जिसे निशाना बनाया जाता है. इससे आसपास नुकसान कम होता है. इस मिसाइल का R9X वैरिएंट 45 किलोग्राम का होता है और बड़ी खामोशी से अपने हमले को अंजाम देता है. इसीलिए इसे निंजा बॉम्ब और फ्लाइंग गिंसू भी कहते हैं. निंजा इसलिए क्योंकि निंजा मार्शल आर्टिस्ट ज्यादातर तेजधार हथियारों का उपयोग करते हैं और फ्लाइंग गिंसू यानी उड़ने वाला चाकू.

2019 में दुनिया के सामने आई थी हेलफायर मिसाइल 
पिछले दो सालों में अमेरिका ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल ज्यादा शुरू कर दिया है. पिछले साल काबुल एयरपोर्ट के धमाके का बदला लेने के लिए अमेरिका ने इन मिसाइलों का उपयोग किया था. अमेरिका पहले R9X हेलफायर मिसाइल का इस्तेमाल रहस्यमयी तरीके से कर रहा था. लेकिन 2019 में दुनिया को इसके बारे में पता चल गया. अमेरिका ने इसी मिसाइल का इस्तेमाल करके साल 2000 में यूएसएस कोले बमबारी में मुख्य आरोपी जमाल अहम मोहम्मद अल बदावी और अलकायदा के प्रमुख आतंकी अबु खार अल-मसरी को मारा था. इस मिसाइल का इस्तेमाल सीरिया और अफगानिस्तान में भी तालिबान के खिलाफ किया जा चुका है. R9X हेलफायर मिसाइल दागो और भूल जाओ तकनीक पर काम करती है. इसे ड्रोन में भी सेट करके दागते हैं. जैसा पिछले रविवार को अफगानिस्तान में हुआ. इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत ये हैं कि मजबूत से मजबूत बंकर, बख्तरबंद गाड़ियों, टैंक और काफी मोटी कॉन्क्रीट की दीवार को फोड़कर विस्फोट करने में सक्षम होती है. आमतौर पर इसके वैरिएंट्स का वजन 45 से 49 किलोग्राम होता है.

पाकिस्तानी पत्रकार का चौंकाने वाला खुलासा
अब सवाल ये कि आखिर अफगानिस्तान से करीब करीब अपना बोरिया बिस्तर समेट चुके अमेरिका को जवाहिरी की सटीक जानकारी कहां से मिली. आखिर अमेरिका को कैसे पता चला कि जवाहिरी इस मकान की बालकनी में रोज टहलने आता है. ऐसे तमाम सवालों के बीच पाकिस्तान के एक पत्रकार ने जवाहिरी के मारे जाने पर चौंकाने वाला खुलासा किया है, पाकिस्तानी पत्रकार कामरान यूसुफ का दावा है कि पाकिस्तान इस ऑपरेशन का हिस्सा हो सकता है. कामरान यूसुफ ने ट्वीट कर लिखा- अलकायदा चीफ अयमान जवाहिरी काबुल में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान इस ऑपरेशन का हिस्सा है क्योंकि ड्रोन स्ट्राइक से 48 घंटे पहले अमेरिका के टॉप जनरल ने पाकिस्तानी सेना के चीफ से बात की थी. 

हालांकि, पाकिस्तानी पत्रकार ने इस ड्रोन स्ट्राइक को आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की लड़ाई बताया है, मगर हकीकत सब जानते हैं कि जिस तरह हक्कानी नेटवर्क ने काबुल में जवाहिरी को छिपा रखा था उसी तरह पाकिस्तान ने एबटाबाद में ओसामा को पनाह दे रखी थी। तो फिर जवाहिरी को मरवाने में पाकिस्तान का क्या फायदा हो सकता है.

पैसे के बदले दी जवाहिरी की इत्तिला
सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान ने पैसे लेकर जवाहिरी से जुड़ी सारी जानकारी अमेरिका को सौंप दी थी. जवाहिरी एक महीने पहले ही पाकिस्तान से अफगानिस्तान गया था. इससे पहले वो पाकिस्तान में ही था. अगर आतंकवाद निरोधी अभियान के तहत जवाहिरी को मरवाना होता तो पाकिस्तान उसे बहुत पहले ही मार चुका होता. मगर इस बार उसके पास अमेरिका से पैसे ऐंठने और अफगानिस्तान में जवाहिरी के मारे जाने से कट्टरपंथियों की नाराजगी से भी बचने का मौका था.

पाक सेना को थी जवाहिरी की जानकारी!
जहां तक अमेरिका के सटीक ऑपरेशन की बात है तो पाकिस्तान में रहने के दौरान पाकिस्तानी सेना को अल-जवाहिरी के हर मूवमेंट की खबर थी. तालिबान के संपर्क में रहने की वजह से भी पाकिस्तानी सेना जानती थी कि अल जवाहिरी कहां रह रहा है. ऐसे में पाकिस्तान एक बार फिर अंजान बनने की कोशिश कर सकता है. कुछ ऐसी ही कोशिश उसने ओसामा बिन लादेन की मौत के वक्त भी की थी. क्योंकि पाकिस्तान के लिए पैसा भी जरूरी है तो वहीं वो अपनी जमीन पर पल रहे आतंकियों को नाराज भी नहीं करना चाहता. बहरहाल अल जवाहिरी की मौत अमेरिका की लिए एक बड़ी जीत है. जिसने 21 सालों से चल रहे बदले को पूरा कर दिया है. 

(आज तक ब्यूरो)

 

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