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अफगानिस्तान में तालिबान की दहशतगर्द सरकार, प्रधानमंत्री समेत ये मंत्री हैं मोस्ट वॉन्टेड आतंकी

दुनिया में ऐसी सरकार की शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो. ग़ज़ब की सरकार है और कमाल की कैबिनेट. अब चूंकि अभी कैबिनेट की पहली मीटिंग नहीं हुई है या हुई भी हो, तो कोई तस्वीर सामने नहीं आई. वरना ये देखना दिलचस्प होता कि कैबिनेट की मीटिंग में टेबल पर सिर्फ़ फ़ाइलें ही रखी थीं या एके-47 भी? क्योंकि उसी के दम पर तो ये सरकार तक पहुंचे हैं. पर सरकार की बात करें तो उससे पहले इस सरकार से आपका तार्रुफ़ कराते हैं.

तालिबान की सरकार में कई कुख्यात आतंकियों को मंत्री बनाया गया है तालिबान की सरकार में कई कुख्यात आतंकियों को मंत्री बनाया गया है

तालिबान ने अफगानिस्तान में गजब धमाकेदार सरकार बनाई है. देश के प्रधानमंत्री वो हैं, जिनकी हौबी बम फोड़ना है. संयुक्त राष्ट्र ने उनका नाम बाकायदा आतंकवादियों की लिस्ट में शामिल कर रखा है. देश के दो उप-प्रधानमंत्री में से एक आतंकवादी है. संयुक्त राष्ट्र की लिस्ट में उनका भी नाम शामिल है. देश के रक्षामंत्री वो हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान की रक्षा के साथ हमेशा खिलवाड़ किया है. देश के गृहमंत्री वो बनाए गए हैं, जिन्होंने देश का कोई भी ऐसा कोना नहीं छोड़ा, जहां उन्होंने कोई बरबादी का काम न किया हो. विदेश मंत्री ऐसे बनाए गए, जो किसी दूसरे देश गए तो क्या पता पकड़ लिए जाएं. और शिक्षा मंत्री कह रहे हैं कि पढ़ने लिखने की जरूरत नहीं है, डिग्रियों से कुछ नहीं होता. 

बस, दुनिया में एक इसी की कमी थी. अमेरिका ने अब ये कमी भी दूर कर दी. आतंक-आंतक चीख़कर न जाने कितने देशों पर अपनी दादागीरी दिखाई. पर अब तो एक देश में आतंकियों की सरकार ही बनवा दी. अब तक अमेरिका ये इल्ज़ाम लगाता रहा कि फलाना देश आतंक को बढ़ावा दे रहा है. पर अब तो एक देश की पूरी सरकार ही आतंकियों के हाथों में चली गई. सरकार का मुखिया भी आतंकवादी, सरकार का गृह मंत्री भी आतंकवादी, सरकार का विदेश मंत्री भी आतंकवादी, बल्कि ये कहना गलत नहीं होगा कि पूरी सरकार ही आतंकवादी है.

दुनिया में ऐसी सरकार की शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो. ग़ज़ब की सरकार है और कमाल की कैबिनेट. अब चूंकि अभी कैबिनेट की पहली मीटिंग नहीं हुई है या हुई भी हो, तो कोई तस्वीर सामने नहीं आई. वरना ये देखना दिलचस्प होता कि कैबिनेट की मीटिंग में टेबल पर सिर्फ़ फ़ाइलें ही रखी थीं या एके-47 भी? क्योंकि उसी के दम पर तो ये सरकार तक पहुंचे हैं. पर सरकार की बात करें तो उससे पहले इस सरकार से आपका तार्रुफ़ कराते हैं.

मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद, प्रधानमंत्री 
ये साबह अफ़ग़ानिस्तान के नए वज़ीर-ए-आज़म यानी प्रधानमंत्री यानी प्राइम मिनिस्टर होंगे. ये सरकार के सर्वेसर्वा होंगे. अब चूंकि ये वज़ीर-ए-आज़म हैं तो अफ़ग़ान के बाहर भी आना-जाना होगा. दूसरे देशों के राष्ट्र अध्यक्षों से भी मिलना-जुलना होगा. कई बार टेबल पर बैठ कर शांति और ख़ुशहाली की बातचीत भी होगी. पर जब ये सबकुछ होगा तो उस होने से पहले ये जानकर सामनेवाले पर क्या बीतेगी कि अफ़ग़ान के वज़ीर-ए-आज़म होने के साथ-साथ ये संयुक्त राष्ट्र की तरफ से घोषित एक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी भी हैं. अब मसला ये है कि अमेरिका पूरी दुनिया में ये ढिंढोरा पीटता है कि वो आतंकवादियों से कभी कोई समझौता या बातचीत नहीं करेगा. पर अगर हालात अफ़ग़ान के इन नए वज़ीर-ए-आज़म को यूएन या व्हाइट हाउस तक पहुंचा देती है, तो ऐसी सूरत में क्या होगा? बाइडेन साहब.. व्हाइट हाउस के उस ख़ास जगह पर अफ़ग़ान के इन वज़ीर-ए-आज़म से जो घोषित आतंकवादी भी है, कैमरे के सामने हाथ मिलाएंगे या पर्दे के पीछे छुप के मिलेंगे? 

अफ़ग़ानिस्तान के कांधार से आनेवाले मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद तालिबान को पैदा करनेवालों में से एक है. शरिया क़ानून के सबसे कट्टर समर्थक, बम धमाकों के ज़रिए जेहाद फैलाने के लिए ट्रेनिंग देनेवाला सबसे बड़ा तालिबानी, औरतों की आज़ादी का सबसे बड़ा दुश्मन और बामियान का गुनहगार यही मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद है. 2001 में बामियान गौतम बुद्ध की मूर्ति तोड़ने का हुक्म इन्हीं वज़ीर-ए-आज़म ने दिया था. अखुंद को तालिबान के दो विंग, मिलिट्री और धार्मिक में से धार्मिक विंग का सबसे बड़ा नेता माना जाता है. अखुंद तालिबान गुट का सबसे कट्टर धार्मिक और रूढीवादी नेता कहा जाता है. 96 में भी जब अफ़ग़ान में पहली बार तालिबान की सरकार आई थी, तब अखुंद अफ़ग़ान के विदेश मंत्री थे. कहते हैं कि अफ़ग़ान में ज़्यादातर बम धमाकों के लिए यही वज़ीर-ए-आज़म ज़िम्मेदार हैं. दरअसल, कहते तो ये हैं कि अखुंद की हॉबी ही बम धमाके करना है. इनकी इसी ख़ूनी सोच और कट्टरता के चलते इन्हें इनाम में मिली है वज़ीर-ए-आज़म की कुर्सी. अब तो कुर्सी भी है, पावर भी. तो बस धमाकों का इंतज़ार कीजिए.

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर, उप-प्रधानमंत्री
अब आइए नायब वज़ीर-ए-आज़म यानी उप प्रधानमंत्री. यानी डिप्टी प्राइम मिनिस्टर से मिलते हैं. इनका सर्टिफिकेट भी ख़ास है. संयुक्त राष्ट्र की किताब में इनका नाम बाक़ायदा आतंकवादियों के कॉलम में छपा हुआ है. यानी ये भी आतंकवादी है. ये अफ़गानिस्तान के उर्जुगान प्रांत में पैदा हुए. सोवियत संघ के खिलाफ़ जंग में शामिल हुए. कट्टरता की हदें पार की. पर तालिबान के बड़े नेता बनने की एक और वजह थी. तालिबान के सबसे बड़े नेता मुल्ला उमर की बहन से शादी करना. 96 में जब मुल्ला उमर तालिबान सरकार का मुखिया था, तब ये उसकी कैबिनेट में उप रक्षा मंत्री था. 9-11 के बाद से ही अमेरिका इसे ढूंढ रहा था. पर ये 2010 में गिरफ्तार हुआ पाकिस्तान में. आठ साल क़ैद में रहने के बाद 2018 में बरादर रिहा हो गया. कहने को ये अमेरिका का दुश्मन था, लेकिन उसी अमेरिका ने दोहा में इससे बातचीत भी की. नए उप प्रधानमंत्री के सर भी अनगिनत बम धमाके और सैकड़ों बेगुनाहों के क़त्ल का ताज सजा है. 

मुल्ला अब्दुल सलाम हनफी, उप-प्रधानमंत्री
एक वज़ीर-ए-आज़म और एक नायब वजीर-ए-आज़म तालिबान को कम पड़ रहे थे. तो एक और नायब वजीर-ए-आज़म यानी उप-प्रधानमंत्री अफ़ग़ान की जनता पर लाद दिए गए. ये अफ़गान के दूसरे उप प्रधानमंत्री हैं मुल्ला अब्दुल सलाम हनफी. जेहाद के नाम पर इनके भी हाथ ख़ून से सने हैं. पर इन पर तो एक और भी इल्ज़ाम है. इल्ज़ाम तस्करी का. यानी ये नशे का कारोबार करते हैं. इसीलिए बाक़ायदा संयुक्त राष्ट्र की लिस्ट में इनका भी नाम एक आतंकवादी के तौर पर दर्ज है. हालांकि एक दौर था, जब हनाफ़ी काबुल यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर धर्म की शिक्षा दिया करता दोहा में शांति वार्ता में हनफ़ी भी शामिल था.

सिराजुद्दीन हक्कानी, गृह मंत्री
इनके बारे में क्या ही कहूं? अफ़गान के अंदर की सुरक्षा अब इनके हाथों में है. मगर साथ ही सर पर 37 करोड़ का इनाम भी है. कमाल की बात तो ये है कि ख़ुद अमेरिका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी एफबीआई ने इन्हें आतंकवादी करार देते हुए ये इनाम रखा है. ये अफग़ानिस्तान के नए वजीर-ए-दाखला, यानी गृह मंत्री यानी होम मिनिस्टर हैं. इनका और इनके पिता का रिश्ता तो सीधे से अल कायदा चीफ़ ओसामा बिन लादेन से था. अमेरिकी सैनिकों की हत्या हो या काबुल में अमेरिकी दूतावास के बाहर फिदायीन हमला, सब इल्जाम इनके सिर पर सजे हैं. ड्रग्स के धंधे में तो दूर-दूर तक इन्हें टक्कर देनेवाला कोई है ही नहीं. ये तालिबान की सरकार में तो हैं, पर तालिबान से नहीं जुड़े हैं. ये ओसामा के भी साथ थे, पर अल कायदा से नहीं जुड़े थे. इनकी आतंक की अपनी दुकान है. जिसका नाम है हक्कानी नेटवर्क और ये उसके मुखिया हैं. तालिबान चाहते हुए भी इन्हें सरकार से दूर नहीं रख सकता. इसीलिए पूरा अफ़ग़ान का अंदरुनी इलाक़ा इनके हाथों में सौंप दिया. अपनी ही सरज़मीन पर बम और गोली बरसाने वाला अब उसी सरज़मीन की हिफ़ाज़त करने जा रहा है. लिहाज़ा, इंतज़ार कीजिए.

आमिर खान मुत्ताकी, विदेश मंत्री
तालिबान की सरकार में फिलहाल इकलौते यही वो शख़्स हैं, जिनकी उम्मीद व्हाइट हाउस में दिखने की सबसे ज़्यादा है. ये अफ़ग़ान के नए विदेश मंत्री हैं. यानी वजीर-ए-खारजा यानी फॉरेन मिनिस्टर. पर इनके साथ एक पेंच भी फंसा है. संयुक्त राष्ट्र ने इन्हें आतंकवादियों की सूची में डाल रखा है. यानी ये रजिस्टर्ड आतंकवादी हैं. अब क़ानून ये कहता है कि जिस देश में भी ये नज़र आए, इन्हें फौरन पकड़ लो. तो क्या इस डर से विदेश मंत्री अफ़ग़ान से बाहर ही नहीं निकलेंगे? और अगर निकलेंगे, तो दुनिया के सभ्य देश किस मुंह से इनसे हाथ मिलाएंगे?  

मुल्ला याकूब, रक्षा मंत्री
तालिबान कैबिनेट के तमाम हाई प्रोफ़ाइल और तर्जुबेकार लोगों से तो आपका तार्रुफ़ हो गया. अब बात करते हैं तालिबान कैबिनेट के सबसे नौजवान मंत्री की. वो मंत्री जिन पर अब बाहरी ताक़तों से अफ़ग़ानिस्तान की हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी है. ये अफ़ग़ान के नए रक्षा मंत्री हैं यानी वज़ीर-ए-दफ़ा यानी डिफेंस मिनिस्टर. इनकी उम्र महज़ 31 साल है. अब आप पूछेंगे कि मुल्ला याकूब में भला ऐसी कौन सी ख़ूबी है, जिसके सदके उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है? तो जवाब है मुल्ला याकूब की खूबी के लिए उसका उस शख्स का बेटा होना ही काफ़ी है, जिसने तालीबान की नींव रखी थी. जी हां, मुल्ला याकूब दरअसल तालिबान के संस्थापक और इस दुनिया के सबसे बड़े आतंकियों में से एक मुल्ला उमर का बेटा है और होश संभालने से लेकर अब तक मुजाहिदीन कमांडर के तौर पर अलग-अलग मोर्चों पर लड़ता रहा है. मुल्ला याकूब 2016 से ही तालिबन के मिलिट्री चीफ का पद संभालता रहा है.

अब्दुल बाकी हक्कानी, शिक्षा मंत्री
ये जनाब अफ़ग़ानिस्तान के नए शिक्षा मंत्री हैं. यानी वजीर-ए-तालीम यानी एडुकेशन मिनिस्टर. लेकिन ये खुद ही कह रहे हैं कि छात्रों को पीएचडी करने, मास्टर्स डिग्री लेने या उच्च शिक्षा हासिल करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है. बल्कि अगर कुछ सीखने समझने की ज़रूरत है, तो वो है दीनी तालीम यानी धर्म की शिक्षा लेने की. और देश के नए शिक्षा मंत्री जनाब अब्दुल बाकी हक्कानी ये बातें यूं ही नहीं कह रहे, बल्कि अपनी बातों के हक में उनके पास दलील भी मौजूद है. वो कहते हैं कि आप खुद देख लीजिए इस वक़्त अफ़गान में जो तालिबान की सरकार बनी है, उनमें से ज़्यादातर के पास पीएचडी की या उच्च शिक्षा की ऐसी कोई डिग्री नहीं है.

कुल मिलाकर, पहली खेप में तालिबान सरकार में 33 मंत्री हैं. लेकिन जैसी कि उम्मीद थी तालिबान ने बिल्कुल नहीं चौंकाया. उसे चौंकाना भी नहीं था. इसीलिए औरतों की आज़ादी के दुश्मन तालिबान ने अपनी सरकार में एक भी महिला को जगह नहीं दी.

 

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