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कोरोना वैक्सीन: एक व्यक्ति के लिए 5-5 डोज खरीद रहे अमीर देश, जानें भारत की स्थिति

धनी देश पूरी दुनिया की सिर्फ 13 फीसदी नुमाइंदगी करते हैं. और वो अभी से ही विकास के विभिन्न चरणों वाली कोरोना वैक्सीन्स की प्रस्तावित आपूर्ति का आधे से अधिक हिस्सा अपने लिए सुनिश्चित कर चुके हैं. उन देशों में से कुछ ने प्रत्येक नागरिक के लिए पांच खुराकें बुक की हैं, जबकि आवश्यकता केवल दो खुराक की होती है.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मॉडर्ना और फाइजर ने 95 फीसदी असरदार होने का दावा किया
  • फाइजर वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए -70 डिग्री चाहिए तापमान
  • विकासशील देशों में वैक्सीन का भंडारण चुनौती

अमेरिका की दो प्रमुख फार्मा कंपनियों की ओर से कोविड-19 वैक्सीन्स के ट्रायल टेस्टिंग के उत्साहजनक नतीजे जारी किए जाने के साथ विकासशील दुनिया के सामने चुनौती है कि अपनी घनी आबादी के लिए टीकाकरण कार्यक्रम की रूपरेखा बनाए. दबाव इसलिए भी है क्योंकि अमीर देशों की ओर से शीर्ष वैक्सीन का बड़ी मात्रा में स्टोरेज किया जा सकता है. 

मॉडर्ना ने घोषणा की कि उसका वैक्सीन कैंडिडेट लगभग 95 प्रतिशत असरदार है, वहीं फाइजर ने बायोएनटेक के साथ विकसित अपने कैंडीडेट के ट्रायल्स में 90 फीसदी प्रभावी रहने का ऐलान किया है. 

ये रिपोर्ट लिखे जाने तक कोविड-19 महामारी दुनिया में  5.3 करोड़ लोगों को संक्रमित कर चुकी है, दस लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. 

दोनों फार्मा कंपनियों ने अपने नतीजे  Peer-Reviewed Journals (समकक्ष समीक्षा वाले जर्नल्स) में नहीं बल्कि प्रेस बयानों के जरिए जारी किए. हालांकि इन घोषणाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने हाथों-हाथ लिया है. 

अमेरिका के वायरस एक्सपर्ट डॉ एंथोनी फॉसी ने कहा, "अब हमारे पास दो वैक्सीन्स हैं जो वास्तव में काफी प्रभावी हैं. इसलिए मुझे लगता है कि यह असल में उस दिशा में एक मजबूत कदम है जहां हम इस प्रकोप पर नियंत्रण पाना चाहते हैं.”  

इनोवेटिव टेक्नोलॉजी 

मॉडर्ना और फाइजर दोनों ने अपनी वैक्सीन्स को डिजाइन करने में इनोवेटिव टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. 

लंदन के इंपीरियल कॉलेज में एक शोध सहयोगी ज़ोल्टन किस ने बताया, "तो इस तकनीक में RNA बनाना शामिल है, जो ऐसा मॉलीक्यूल है जो शरीर की कोशिकाओं को एंटीजन के निर्माण की जानकारी प्रदान करता है." 

आम आदमी की भाषा में, इस कंसेप्ट का अर्थ है शरीर में कोरोनोवायरस के जेनेटिक कोड के हिस्से को इंजेक्ट करना है, जो कि इम्युन सिस्टम को हमला करने के लिए प्रशिक्षित करता है, जिससे असल वायरस बचने की कोशिश करता है. 

स्टोरेज, उपलब्धता, बाधाएं 

लेकिन एक फैक्टर है जो मॉडर्ना और फाइजर की वैक्सीन्स के भविष्य में बंटवारे को जटिल बना सकता है, और वो है उनका स्टोरेज और व्यापक उपलब्धता. खास तौर पर गर्म जलवायु वाले कम आमदनी वाले क्षेत्रों में. दोनों वैक्सीन्स को कम तापमान की आवश्यकता होती है - मॉडर्ना के लिए माइनस 20 सेल्सियस और फाइज़र के लिए माइनस 75 सेल्सियस तक का अल्ट्रा-कोल्ड स्टोरेज. 

भारत में स्वास्थ्य विशेषज्ञ विशेष तौर पर फाइजर की वैक्सीन की व्यावहारिकता को मुश्किल बताते हैं. 

एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कहा, "फाइजर वैक्सीन को -70 डिग्री सेल्सियस पर रखना पड़ता है, जो भारत जैसे विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है, जहां हमें विशेषकर ग्रामीण मिशनों में कोल्ड चेन बनाए रखने में मुश्किलें आएंगी."  

हांलाकि डॉ गुलेरिया ने हालांकि इसे वैक्सीन अनुसंधान के लिए उत्साहजनक घटनाक्रम बताया.  

बता दें कि धनी देश पूरी दुनिया की सिर्फ 13 फीसदी नुमाइंदगी करते हैं. और वो अभी से ही विकास के विभिन्न चरणों वाली वैक्सीन्स की प्रस्तावित आपूर्ति का आधे से अधिक हिस्सा अपने लिए सुनिश्चित कर चुके हैं.  

उन देशों में से कुछ ने प्रत्येक नागरिक के लिए पांच खुराकें बुक की हैं, जबकि आवश्यकता केवल दो खुराक की होती है. यह एक ऐसा कदम है जो विकासशील दुनिया के लिए आपूर्ति संकट पैदा करने का खतरा दिखाता है.  


मॉर्डना के सीईओ स्टीफेन बांसेल ने कहा, "अमेरिकी सरकार के साथ जो पहला समझौता हुआ था, वह 100 मिलियन खुराक के ऑर्डर के लिए था. इसलिए, हम अनुमान लगाते हैं कि साल खत्म होने से पहले उन 100 मिलियन में से 20 मिलियन तक की हम शिपिंग कर सकेंगे.” 

भारत की क्या है स्थिति? 

भारत का वैक्सीन समुदाय विभिन्न नई तकनीकों के साथ कोविड-19 वैक्सीन विकसित करने के लिए कई स्वदेशी और अंतर्राष्ट्रीय स्टेकहोल्डर्स के साथ भागीदारी पहले ही कर चुका है. 

वैक्सीन पर एक्सपर्ट ग्रुप के प्रमुख वी के पॉल ने आजतक/इंडिया टुडे को बताया, "भारत बहुत भाग्यशाली है कि हमारे पास वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक बहुत व्यापक औद्योगिक आधार है और वैक्सीन के विकास के लिए हमारे पास रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेटअप भी है. इसके अलावा एक नियामक व्यवस्था भी है जो बहुत मजबूत है.” 

 भारत में वैक्सीन कार्यक्रम 

देश में, भारत बायोटेक का वैक्सीन कैंडीडेट ICMR के सहयोग से तीसरे चरण के ट्रायल में है. यही स्थिति भारत के सीरम इंस्टीट्यूट के सहयोग से विकसित हो रही ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की है. 

एस्ट्राजेनेका का लक्ष्य दिसंबर तक 100 मिलियन खुराक तैयार करना है. 

डॉ पॉल ने इंगित किया कि रूस के कैंडिडेट स्पुतनिक के भी अगले सप्ताह भारत में मानव ट्रायल्स से गुजरने की संभावना है. Zydus Cadila के कैंडीडेट के दिसंबर तक अहम तीसरे चरण में प्रवेश करने और अगले साल मार्च तक तैयार होने की उम्मीद है. इसके 100 मिलियन खुराक तैयार करने की इन-हाउस क्षमता है. 

डॉ पॉल ने कहा, "मुझे लगता है कि अगर हम एक आशावादी दृष्टिकोण ले रहे हैं तो यह संभव है कि 2021 के शुरुआती हिस्से में यह वास्तविकता होगी. हालांकि, यह सावधानी के साथ मेल खाना चाहिए.”  

डॉ पाल ने आगे कहा, “तो हम आशान्वित हैं, हम वक्र के आगे हैं और हम तैयारी कर रहे हैं." 

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के महानिदेशक डॉ शेखर सी  मांडे ने डॉ पाल जैसे ही विचार व्यक्त किए. उन्होंने आजतक/इंडिया टुडे को बताया, "भारतीय वैक्सीन निर्माता अच्छा कर रहे हैं, हमें अगले साल की शुरुआत तक कुछ उम्मीद करनी चाहिए. जब भी दुनिया में वे वैक्सीन विकसित करते हैं, भारतीय कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने में सक्षम होंगी क्योंकि उनके पास ऐसा करने की क्षमता है." 

वैक्सीन के दाम  

मॉडर्ना ने अपने वैक्सीन को 2,800 रुपये प्रति डोज और फाइजर ने लगभग 3,000 रुपये में आंका है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने संकेत दिया है कि उनके टीके की भारत में कीमत 1,000 रुपये से कम होगी. 

 निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन 225 रुपये में उपलब्ध हो सकती है. 

सावधानी के साथ आशावाद 

इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने लोगों से आग्रह किया है कि वे संभावित कोविड वैक्सीन्स की उम्मीद भरी खबरों के बीच महामारी को लेकर अपनी सावधानियों में कोई कमी न लाएं. 

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडहोम  घेब्येयियस  ने सोमवार को न्यूज ब्रीफिंग में कहा, "यह ढिलाई का समय नहीं है. जबकि कोविड टीकों के बारे में उत्साहजनक समाचार प्राप्त करना जारी हैं और आने वाले महीनों में नए उपकरणों के आने की संभावना के बारे में सतर्क रूप से आशावादी बने रहते हैं. अभी, हम के एक प्रमुख कुछ देशों में केसों की बढ़ोतरी से बहुत चिंतित हैं.” 

WHO में चीफ साइंटिस्ट सौम्या स्वामीनाथन के मुताबिक एक पूर्ण डेटा विश्लेषण ही ट्रायल्स वाले वैक्सीन्स की फाइनल प्रभाविता को तय कर सकता है.   

स्वामीनाथन ने कहा, " कई सवाल अभी भी हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है, जैसे कि संरक्षण की अवधि, गंभीर बीमारी पर प्रभाव, विभिन्न आयु वर्ग पर प्रभाव, विशेष रूप से बुजुर्गों पर असर. इसके अलावा एक निश्चित अवधि से बाहर प्रतिकूल घटनाएं भी. इसलिए हमें आशा करनी चाहिए कि  क्लिनिकल ट्रायल्स डेटा एकत्र करना जारी रखेंगे, क्योंकि हमें दीर्घकालिक रूप से इनके नतीजे जानना जरूरी है.

 

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