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पति सैलरी बताने से करता है इंकार, तो क्या पत्नी कर सकती है RTI का इस्तेमाल?

सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) ने आयकर विभाग (Income Tax) को 15 दिन के भीतर महिला को उसके पति की नेट टैक्सेबल इनकम/ग्रॉस इनकम की जानकारी देने का निर्देश दिया. क्या आरटीआई से कोई भी पत्नी अपने पति की सैलरी की जानकारी हासिल कर सकती है.

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पति की सैलरी जानने के लिए पत्नी कर सकती है ये काम.
पति की सैलरी जानने के लिए पत्नी कर सकती है ये काम.

'आप कितना कमाते हैं?' इस सवाल का सामना हम सभी ने कभी ना कभी तो किया ही होगा. अधिकतर लोग अपनी सैलरी के बारे में सार्वजनिक रूप से बात नहीं करना चाहते हैं. सैलरी से जुड़ी जानकारी लोग अपने परिवार को देते हैं या फिर अपने तक ही सीमित रखते हैं. लेकिन जब कोई शख्स शादी के बंधन में बंध जाता है, तो इसके बाद कई चीजें बदल जाती हैं. पति सैलरी के बारे में जानकारी अपनी पत्नी के साथ शेयर कर सकता है. लेकिन पति अगर सैलरी से जुड़ी जानकारी पत्नी को नहीं देना चाहता है, तो क्या पत्नी इसके लिए कानूनी रास्ता अपना सकती है?

आरटीआई दायर कर मिलेगी जानकारी?

हाल ही के एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें महिला ने आरटीआई (सूचना का अधिकार) दायर करके अपने पति की इनकम की जानकारी मांगी. मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार, सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) ने आयकर विभाग (Income Tax) को 15 दिन के भीतर महिला को उसके पति की नेट टैक्सेबल इनकम/ग्रॉस इनकम की जानकारी देने का निर्देश दिया. क्या आरटीआई से कोई भी पत्नी अपने पति की सैलरी की जानकारी हासिल कर सकती है. आइए समझते हैं कि महिला ने क्या-क्या तरीके अपनाए थे.

महिला ने क्या तरीके अपनाए?

महिला ने सबसे पहले नेट टैक्सेबल इनकम/ग्रॉस इनकम की डिटेल्स के लिए आरटीआई दायर की. शुरुआत में स्थानीय इनकम टैक्स ऑफिस के सेंट्रल पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर (CPIO) महिला को जानकारी देने से इंकार कर दिया. क्योंकि उसका पति इसके लिए सहमत नहीं था.

इसके बाद महिला ने प्रथम अपीलीय अथॉरिटी (FAA) के पास अपील दायर की. प्रथम अपीलीय प्राधिकरण, लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी होता है. लेकिन FAA ने CPIO के फैसले को बरकरार रखा. महिला ने दोबारा CIC में अपील दायर की.

कोर्ट के कुछ फैसलों के आधार पर मिली अनुमति

इसके बाद CIC ने अपने पिछले कुछ पूर्व में दिए आदेशों, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों पर गौर किया. दिल्ली उच्च न्यायालय ने विजय प्रकाश बनाम भारतीय यूनियन (2009) के मामले में कहा था कि निजी विवादों में धारा 8 (1) (j) के तहत अधिनियमित छूट के आधार पर दी गई बुनियादी सुरक्षा को नहीं हटाया जा सकता है. 

एक दूसरे मामले में कोर्ट ने अलग फैसला सुनाया

राजेश रामचंद्र किडिले बनाम महाराष्ट्र एसआईसी और अन्य के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर बेंच) ने कहा था-  'जहां मामला पत्नी के गुजारा भत्ता से जुड़ा हो तो पति की सैलरी की जानकारी निजी नहीं हो सकती. ऐसी स्थिति में सैलरी संबंधित जानकारी पर पत्नी का भी आधिकार हो सकता है.

पर्सनल डिटेल्स

CIC ने इस मामले में CPIO को निर्देश दिया कि वह 15 दिन के भीतर पति की नेट टैक्सेबल इनकम/ग्रॉस इनकम की जानकारी पत्नी को उपलब्ध कराए.  प्रॉपर्टी, लायबिलिटीज, इनकम टैक्स रिटर्न, निवेश की जानकारी, उधार आदि पर्सनल डिटेल्स की कैटिगरी में आते हैं. आरटीआई की धारा 8 (1) (j) के तहत ऐसी निजी जानकारियों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए. हालांकि, सुभाष चंद्र अग्रवाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर जनहित की शर्त पूरी होती है तो इसकी अनुमति दी जा सकती है.

 

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