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डरे हुए हैं बिजनेसमैन, भारत में चीन जैसा सख्त अनुशासन क्यों- चिदंबरम

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 'आजतक' से बात करते हुए, केंद्र सरकार के कई फैसलों पर सवाल खड़े किए हैं.

पी चिदंबरम ने आजतक से की खास बातचीत (फोटा- विक्रम शर्मा) पी चिदंबरम ने आजतक से की खास बातचीत (फोटा- विक्रम शर्मा)

  • सरकार प्राइवेट इंवेस्टमेंट और घरेलू खपत से कैसे डील कर रही है?
  • जीएसटी लागू करने में भी केंद्र सरकार ने काफी जल्दबाजी दिखाई

देश की गिरती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसे मुद्दे पर सरकार बोलने को तैयार नहीं है. वहीं विपक्ष लगातार केंद्र सरकार से सवाल कर रही है कि देश की हालत कब तक सुधरेगी? पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 'आजतक' से बात करते हुए केंद्र सरकार के कई फैसलों पर सवाल खड़े किए हैं.

पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि बाजार में मांग कम हो रही है लेकिन सरकार इन गंभीर विषयों की जांच तक के लिए तैयार नहीं है. मनमोहन सरकार से तुलना करते हुए चिदंबरम ने कहा कि हमारी सरकार में कोई एनपीए (गैर-निष्पादित संपत्ति- Non Performing Assets) नहीं था लेकिन अब 9 लाख करोड़ का एनपीए है.

उन्होंने कहा कि मैं मानता हूं कि कई अन्य देशों की हालत भी खराब है और उनकी जीडीपी भी 8 फीसदी तक नहीं पहुंच पा रही है. देश की अर्थव्यवस्था चार इंजन पर चल रही है जिनमें से तीन सरकार चला रही है. सरकार प्राइवेट इंवेस्टमेंट और घरेलू खपत से कैसे डील कर रही है?

इन सबका इलाज क्या है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सरकार को सबसे पहले अपनी गलती माननी चाहिए. नोटबंदी मोदी सरकार की सबसे बड़ी गलती थी. वहीं जीएसटी लागू करने में भी केंद्र सरकार ने काफी जल्दबाजी दिखाई. लोग और बिजनेसमैन काफी डरे हुए हैं.

उन्होंने कहा कि बीजेपी कह रही है कि यूपीए सरकार में आर्थिक अनुशासनहीनता रही और अब सबकुछ कानूनी तरीके से हो रहा है. यह मामला अनुशासनहीनता का नहीं है. क्या भारत में चीन जैसा सख़्त अनुशासन होना चाहिए?

साल 2008 और वर्तमान अर्थव्यवस्था की तुलना पर चिदंबरम ने कहा कि साल दर साल तुलना करना ठीक नहीं है. आपको तब के हालात और अब के हालात पर ध्यान देना होगा. 2008 में विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा था.

वर्तमान हालात पर उन्होंने कहा कि सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि सिर्फ मार्केट को बूस्ट करना सॉल्यूशन नहीं है क्योंकि बाजार में डिमांड घटी है. इसलिए सरकार को लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने पर विचार करना चाहिए.

उनसे जब पूछा गया कि अगर वो निर्मला सीतारमण होते तो क्या करते? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि सबसे पहले इस्तीफा देता. क्योंकि सरकार में रहने के नाते अगर मेरी नीतियों का फायदा नहीं हो रहा है तो फिर जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देना चाहिए.

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