नोएडा और ग्रेटर नोएडा में घर खरीदने वाले लाखों लोगों के लिए आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम साबित हो सकते हैं. दरअसल, नोएडा अथॉरिटी एक नई वन टाइम सेटलमेंट (OTS) स्कीम लाने की तैयारी कर रही है जिसका मकसद बिल्डरों से हजारों करोड़ रुपये का बकाया वसूलना और लंबे समय से अटकी फ्लैट रजिस्ट्रियों का रास्ता साफ करना है. अधिकारियों का दावा है कि प्रस्ताव लागू होने पर करीब 2.12 लाख यूनिट्स से जुड़े रजिस्ट्री मामलों को राहत मिल सकती है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ OTS स्कीम आ जाने से सभी खरीदारों की समस्या खत्म हो जाएगी? इसका सीधा जवाब है, नहीं क्योंकि पूरी कहानी बिल्डरों की आर्थिक हालत पर टिकी हुई है.
आखिर समस्या क्या है?
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कई बिल्डर्स पर जमीन की कीमत, लीज रेंट, ब्याज और अन्य मदों में भारी बकाया है. अमिताभ कांत समिति की सिफारिशों के बाद राज्य सरकार ने पहले भी रुके हुए प्रोजेक्ट्स को फिर से पटरी पर लाने के लिए राहत पैकेज दिया था. इसके बावजूद बड़ी संख्या में प्रोजेक्ट्स में रजिस्ट्री और मालिकाना हक का मुद्दा पूरी तरह हल नहीं हो पाया. अधिकारियों के मुताबिक 57 डिफॉल्टर प्रोजेक्ट्स पर करीब 26 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है. कई प्रोजेक्ट्स में खरीदार फ्लैट में रह रहे हैं लेकिन आज तक उनके नाम रजिस्ट्री नहीं हो सकी है.
OTS स्कीम क्या है?
वन टाइम सेटलमेंट यानी OTS का मतलब है कि बिल्डर्स को बकाया रकम के निपटारे के लिए अथॉरिटी एक विशेष मौका देगी. संभावना है कि ब्याज या जुर्माने के कुछ हिस्से में राहत देकर बिल्डर्स को एकमुश्त भुगतान के लिए प्रोत्साहित किया जाए. बदले में अथॉरिटी अपना बकाया वसूल सकेगी और जिन प्रोजेक्ट्स की रजिस्ट्री अथॉरिटी की अनुमति के अभाव में अटकी हुई है, वहां प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी. साफ शब्दों में कहें तो सरकार और बिल्डर के बीच फंसा वित्तीय विवाद सुलझेगा, तभी खरीदारों की रजिस्ट्री का रास्ता खुलेगा.
क्या OTS आते ही रजिस्ट्री हो जाएगी?
यहीं सबसे बड़ा भ्रम है क्योंकि OTS कोई जादुई समाधान नहीं है. रजिस्ट्री और कानूनी पजेशन की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ पाएगी जब संबंधित बिल्डर अथॉरिटी का बकाया चुकाने की स्थिति में हो या उसके पास भुगतान जुटाने के पर्याप्त संसाधन हों. यानी जिन बिल्डरों के पास
यही वो हिस्सा है जहां सरकार अब सख्त रुख अपनाती दिखाई दे रही है. हाल ही में औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता 'नंदी' ने नोएडा अथॉरिटी की समीक्षा बैठक में डिफॉल्टर बिल्डरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए. उन्होंने लंबित रजिस्ट्रियों और बिल्डर-खरीदार विवादों को प्राथमिकता पर निपटाने को कहा. अधिकारियों ने बताया कि कई प्रोजेक्ट्स में बिल्डरों ने अभी तक जरूरी भुगतान भी नहीं किया है.
डिफॉल्टर बिल्डर्स पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक अलग-अलग मामलों में अथॉरिटी और सरकार के पास कई विकल्प होते हैं:
1. रिकवरी सर्टिफिकेट (RC) और वसूली कार्रवाई से बकाया रकम वसूली जा सकती है.
2. बिल्डर की जमीन, दफ्तर और अन्य संपत्तियों की कुर्की की जा सकती है.
3. बैंक खाते और संपत्ति अटैच करके राजस्व वसूली की तरह कार्रवाई की जा सकती है.
4. ब्लैकलिस्टिंग के विकल्प के तहत गंभीर मामलों में बिल्डर्स को भविष्य के प्रोजेक्ट्स से बाहर किया जा सकता है.
5. RERA और अन्य कानूनी कार्रवाई के तहत जुर्माना, मुकदमा और अन्य नियामकीय कदम उठाए जा सकते हैं.
6. दिवाला प्रक्रिया (IBC/NCLT) के जरिए अत्यधिक वित्तीय संकट वाले मामलों में प्रोजेक्ट दिवाला प्रक्रिया के तहत जा सकता है, जहां किसी नए डेवलपर या समाधान योजना के जरिए प्रोजेक्ट पूरा कराया जाता है.
फ्लैट खरीदारों के लिए सबसे बड़ा संदेश क्या है?
OTS स्कीम निश्चित रूप से लाखों खरीदारों के लिए उम्मीद लेकर आई है. लेकिन खरीदारों को यह समझना होगा कि केवल योजना की घोषणा से रजिस्ट्री अपने आप शुरू नहीं हो जाएगी. सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित बिल्डर
OTS खोलेगा नया रास्ता!
यानी OTS एक प्रशासनिक रास्ता जरूर खोल सकती है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए बिल्डर्स को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी. फिलहाल लाखों खरीदारों की नजर राज्य सरकार और नोएडा अथॉरिटी के अगले कदम पर टिकी हुई है. अगर यह योजना सफल रही तो बरसों से अटकी रजिस्ट्रियां आगे बढ़ सकती हैं. लेकिन जिन प्रोजेक्ट्स में बिल्डर पूरी तरह आर्थिक संकट में हैं, वहां चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है.