scorecardresearch
 

EMI की गिरफ्त में मिडिल क्लास, अमीर दिखने की चाह में कर्ज के जाल में फंसे

तेजी से बिकती प्रॉपर्टी और आसमान छूती कीमतों को देखकर जो खरीदार खुद को पिछड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं, उनके लिए कौशिक का संदेश सतर्क करने वाला है. अपनी नकद बचत की तुलना किसी और की कर्ज में डूबी हुई संपत्ति से न करें.

Advertisement
X
बेंगलुरू में प्रीमियम घर खरीदने की मची होड़ (Photo-ITG)
बेंगलुरू में प्रीमियम घर खरीदने की मची होड़ (Photo-ITG)

बेंगलुरु की स्काईलाइन पर आजकल हर तरफ 'सोल्ड आउट' के बोर्ड, चमकदार होर्डिंग्स और ₹2-3 करोड़ की कीमत वाले प्रीमियम हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की भरमार दिख रही है. किसी बाहरी व्यक्ति को देखने पर ऐसा लग सकता है कि शहर में अचानक अमीरी की बाढ़ आ गई है. लेकिन चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक के अनुसार, इसका संबंध बढ़ती संपन्नता से कम और बढ़ते कर्ज के बोझ से ज्यादा है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कौशिक ने इसे बेंगलुरु का "₹3-करोड़ का जाल" बताया है. उनके मुताबिक, यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें मोटी सैलरी पाने वाले प्रोफेशनल्स महंगे घर खरीदने के लिए अपनी वित्तीय सीमा से बाहर जा रहे हैं. अक्सर वे अपनी मासिक आय का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ होम लोन की किस्तों को चुकाने में लगा रहे हैं.

कौशिक ने लिखा, "अगर आपको लग रहा है कि हर कोई अमीर है, तो शायद आप प्रॉपर्टी की कीमतें देख रहे हैं, उनकी बैलेंस शीट नहीं." उन्होंने आगे कहा कि उनका यह नजरिया होर्डिंग्स देखकर नहीं, बल्कि लोगों के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) देखकर बना है.

यह भी पढ़ें: साइज बराबर फिर भी अमेरिकी घर लगते हैं बड़े, भारत में हम कहां करते हैं गलती

जब EMI पूरे महीने पर कब्जा कर ले

Advertisement

कौशिक का तर्क है कि प्रीमियम हाउसिंग सेगमेंट में ज्यादातर खरीदार अपनी जमा पूंजी से घर नहीं खरीद रहे हैं, बल्कि अपनी जीवनशैली का पूरा खर्च बैंकों के भरोसे चला रहे हैं. होम लोन, कार लोन और कुछ मामलों में पर्सनल लोन की परतें एक के ऊपर एक चढ़ती जा रही हैं, जिससे हर महीने जाने वाली किस्तें अब उस स्तर पर पहुंच गई हैं, जिन्हें लंबे समय तक संभाल पाना मुश्किल है.

उनका मानना है कि आजकल वेतनभोगी ग्राहकों के लिए यह देखना आम बात हो गई है कि उनकी कुल इनहैंड सैलरी का 60-70% हिस्सा सिर्फ EMI भरने में चला जाता है. कागजों या स्प्रेडशीट पर लोन का यह ढांचा भले ही ठीक लगे, लेकिन हकीकत बहुत कमजोर है. उन्होंने आगाह करते हुए कहा, "असल जिंदगी में महीने के पहले हफ्ते में ही सैलरी खत्म हो जाती है." उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि नौकरी में आने वाली थोड़ी सी भी रुकावट पूरे वित्तीय संतुलन को बिगाड़ सकती है.

यह भी पढ़ें: आजादी से पहले के वो 5 ऐतिहासिक होटल, जो आपको ले जाएंगे 'राजसी दौर' की सैर पर

होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली टैक्स छूट (सेक्शन 24b के तहत), जो कभी घर खरीदारों के लिए एक बड़ा आकर्षण हुआ करती थी, अब कई उच्च आय वाले लोगों के लिए अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है. कौशिक बताते हैं कि होम लोन अब फायदे का सौदा होने के बजाय इंसान के जीवन का सबसे बड़ा खर्च बन गया है और वह भी उस घर के लिए जिसे पूरी तरह अपना होने में अभी सालों का वक्त लगेगा. 

Advertisement

कौशिक का कहना है कि घर खरीदने का यह दबाव सामर्थ्य से नहीं, बल्कि पीछे छूट जाने के डर से पैदा हो रहा है. साल 2025 में बेंगलुरु में प्रॉपर्टी की कीमतें सालाना करीब 10-12% बढ़ी हैं, जबकि नए प्रोजेक्ट्स में अब ज्यादातर महंगे घर ही बन रहे हैं. 'अफोर्डेबल हाउसिंग' यानी किफायती घर, जो कभी बाजार को संतुलित रखते थे, अब नए लॉन्च होने वाले प्रोजेक्ट्स में नाममात्र ही रह गए हैं.

इसका नतीजा यह है कि खरीदार इसलिए नहीं दौड़ रहे कि घर उनके बजट में फिट बैठ रहे हैं, बल्कि इस चिंता में हैं कि कहीं कीमतें और न बढ़ जाएं. "क्या होगा अगर अगले साल यह मेरी पहुंच से बाहर हो गया?" यह सवाल आज खरीदारों को ज्यादा उकसा रहा है, बजाय इस सवाल के कि "क्या मैं वाकई आज इसे खरीदने की हैसियत रखता हूं?"

यह भी पढ़ें: बजट के बाहर हुए घर तो ग्राहकों ने मोड़ा मुंह, ठंडा पड़ा रियल एस्टेट मार्केट

₹2 करोड़ के लोन की असली लागत

मौजूदा होम लोन की ब्याज दरों (करीब 8.5-9%) के हिसाब से ₹2 करोड़ के लोन की मासिक EMI लगभग ₹1.6 से ₹1.8 लाख बैठती है. इसे आराम से चुकाने और बैंक को पैसा देने के बाद एक सामान्य जीवन जीने के लिए, परिवार की कुल कमाई (टैक्स कटने के बाद) कम से कम ₹3.2 से ₹3.6 लाख महीना होनी चाहिए. कौशिक लिखते हैं, "यह लग्जरी नहीं है, यह सिर्फ सर्वाइवल  का गणित है."

Advertisement

पैसे के अलावा, वे उन 'छिपी हुई लागतों' की ओर भी इशारा करते हैं जिन्हें मापना मुश्किल है जैसे बढ़ता तनाव, रिस्क लेने की कम होती क्षमता और करियर में बदलाव न कर पाने की मजबूरी, क्योंकि कर्जदार भारी-भरकम किस्तों के बोझ तले दब जाता है. 

क्रेडिट साइकिल की चेतावनी

कौशिक ने व्यापक आर्थिक जोखिमों की ओर भी इशारा किया है. साल 2026 में भारत का घरेलू कर्ज जीडीपी के 40% के स्तर को पार कर गया है. यह आंकड़ा बताता है कि लोग अब अपनी जमा-पूंजी के बजाय कर्ज के भरोसे ज्यादा जी रहे हैं. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "यह अमीरी की लहर नहीं दिख रही है, बल्कि यह एक तपता हुआ 'क्रेडिट साइकिल' है.'

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement