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मामूली रकम में हर बड़े अस्पताल में लग सकता है PSA ऑक्सीजन प्लांट, फिर भी खरीद पर निर्भरता क्यों?

बहुत कम रकम में हर बड़े अस्पताल में कैप्टिव PSA ऑक्सीजन प्लांट लगाया जा सकता है. इसके बारे में न तो निजी अस्पतालों ने सोचा और न सरकार ने. 

प्लांट लगाने से ऑक्सीजन खरीद की जरूरत नहीं रह जाएगी (फाइल फोटो) प्लांट लगाने से ऑक्सीजन खरीद की जरूरत नहीं रह जाएगी (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ऑक्सीजन पर अस्पताल हर साल बड़ी रकम खर्च करते हैं
  • इतनी रकम में वे आसानी से पीएसए प्लांट लगा सकते हैं

देश में कोरोना की नई लहर में कितने मरीजों ने ऑक्सीजन की कमी की वजह से दम तोड़ दिया. लोग ऑक्सीजन के एक-एक सिलेंडर के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि सच यह है कि बहुत कम रकम में हर बड़े अस्पताल में कैप्टिव PSA ऑक्सीजन प्लांट लगाया जा सकता है. इसके बारे में पहले न तो निजी अस्पतालों ने सोचा और न सरकार ने. 

ऐसे एक प्लांट लगाने में जितनी लागत आती है, करीब उतनी रकम कई अस्पताल हर साल ऑक्सीजन खरीदने में खर्च कर देते हैं. जानकारों के मुताबिक ऐसे प्लांट लगाने का खर्च 40 लाख से लेकर 1.25 करोड़ रुपये तक हो सकता है यानी इसे हर जिला अस्पताल या किसी भी बड़े निजी अस्पताल में आसानी से लगाया जा सकता है. लेकिन अस्पतालों ने इसके बारे में नहीं सोचा और वे कारखानों से आने वाले ऑक्सीजन की आपूर्ति पर निर्भर रहे. 

हवा से ऑक्सीजन

इस तरह के प्लांट में प्रेशर स्विंग एड्जॉर्ब्शन (PSA) टेक्नोलाॅजी का इस्तेमाल किया जाता है. यह इस सिद्धांत पर काम करता है कि उच्च दबाव में गैस साॅलिड सरफेस की तरफ आकर्षित होते हैं और एडजाॅर्ब हो जाते हैं. 

पीएसए प्लांट में हवा से ही ऑक्सीजन बनाने की अनूठी टेक्नोलाॅजी होती है. इसमें एक चैम्बर में कुछ एडजाॅर्बेंट डालकर उसमें हवा को गुजारा जाता है, जिसके बाद हवा का नाइट्रोजन एडजाॅर्बेंट से चिपककर अलग हो जाता है और ऑक्सीजन बाहर निकल जाती है. इस कॉन्सेंट्रेट ऑक्सीजन की ही अस्पताल को आपूर्ति की जाती है. 

इसके लिए दबाव काफी उच्च रखना होता है. एडजाॅर्बेंट मैटीरियल के रूप में जियोलाइट, एक्टीवेटेड कार्बन, माॅलीक्यूलर सीव्स आदि का इस्तेमाल किया जाता है. 

तो जब किसी चैम्बर या वेसल से हवा को उच्च दबाव से गुजारा जाता है और उसमें जियोलाइट जैसे कुछ एडजाॅर्बेंट डाल दिए जाते हैं तो वे ऑक्सीजन की जगह नाइट्रोजन को ज्यादा आकर्षित करते हैं. इस तरह नाइट्रोजन वेसल के बेड में चिपका रह जाता है और हवा में ऑक्सीजन बचा रहता है. इस तरह की प्रक्रिया कई बार करके ऑक्सीजन से भरी हवा को बाहर निकाल दिया जाता है. 

इनसे जो ऑक्सीजन तैयार होती है, वह कारखानों में तैयार मेडिकल ऑक्सीजन की तुलना में थोड़ी कम शुद्धता वाली होती है. लेकिन इनकी ढुलाई करके लाने का समय बचता है, तत्काल तैयार ऑक्सीजन मिलती है. इसलिए अस्पतालों में किसी तरह के संकट से नहीं गुजरना पड़ता. ये पीएसए प्लांट अस्पताल परिसरों में ही तैयार होते हैं. इससे सिलेंडर की जरूरत भी नहीं रह जाती.

सरकार का प्लान 

मोदी सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में 150 पीएसए प्लांट के लिए बिड आमंत्रित किया था. इसे जनवरी 2021 में बढ़ाकर 161 प्लांट के लिए कर दिया गया. अभी इसमें से महज 33 तैयार हुए हैं. 

इस साल जनवरी में सरकार ने कहा था कि 162 पीएसए प्लांट के लिए 201.58 करोड़ रुपये आवंटित किए जा रहे हैं. यानी एक प्लांट पर औसतन 1.25 करोड़ रुपये का बजट है. हालांकि इन प्लांट की क्षमता 100 लीटर से लेकर 1,000 लीटर तक की है. जानकारों का कहना है कि कम क्षमता का प्लांट 40 लाख रुपये तक में भी स्थापित हो सकता है. 

साल भर में हो जाता है इतना खर्च 

पीएसए के 1,000 लीटर के एक प्लांट से हर दिन 100 से 150 मरीज की जरूरतों की पूर्ति हो सकती है. ऐसा माना जाता है कि आम दिनों में 40 आईसीयू और कुल 240 बेड वाले एक अस्पताल को हर महीने ऑक्सीजन पर 5 लाख रुपये खर्च करने होते हैं. यानी एक से डेढ़ साल के खर्च में ही कोई अस्पताल चाहे तो अपना कैप्टिव प्लांट लगा सकता है. 

लेकिन अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई करने की एक लाॅबी होती है, जो इस बात को कभी भी प्रोत्साहित नहीं करती कि अस्पताल अपना खुद का ऑक्सीजन प्लांट लगाएं. इसके अलावा छोटे अस्पतालों के पास ऐसे प्लांट के लिए जगह की कमी एक समस्या होती है. 

एक महीने में लग सकता है प्लांट

इस तरह ये प्लांट काफी किफायती भी माने जाते हैं, ऐसे प्लांट हर सरकारी अस्पताल या बड़े निजी अस्पतालों में आसानी से लगाए जा सकते हैं. जानकारों का कहना है कि सारे इक्विपमेंट उपलब्ध हो जाएं तो पीएसए के प्लांट को स्थापित करने में महज एक महीना ही लगता है. यह अलग बात है कि सरकारी विभाग टेंडर की मंजूरी और इक्विपमेंट उपलब्ध कराने की पूरी प्रक्रिया में महीनों लगा देते हैं. 

गौरतलब है कि अगर किसी गंभीर मरीज को 20 मिनट तक ऑक्सीजन न मिले तो उसकी मौत हो सकती है. इसलिए पीएसए जैसे कैप्टिव प्लांट अस्पताल में रहने बहुत जरूरी हैं. लेकिन मोदी सरकार द्वारा काॅन्ट्रैक्ट देने के चार महीने बाद भी सिर्फ 33 प्लांट लग पाए हैं. 

भारत की हर दिन की मेडिकल ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता अभी करीब 7,200 मीट्रिक टन है, जबकि कोरोना संकट के इन दिनों में जरूरत करीब 8,000 टन की है. यानी उत्पादन और जरूरत में ज्यादा अंतर नहीं है. लेकिन कुल 162 प्लांट जो लगने वाले हैं उनसे करीब 154 मीट्रिक टन का ही उत्पादन होगा. यानी अगर वो प्लांट लग भी गए होते तो भी ऑक्सीजन की कमी रहती. 

देर से ही सही लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने यह अच्छा ऐलान किया है कि पूरे देश के सरकारी अस्पतालों में अब 551 पीएसए ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की जाएगी. वास्तव में इस तरह का कदम काफी पहले ही उठाने की जरूरत थी.

 

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