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ऑटो का बार-बार कट रहा था चालान, परेशान ड्राइवर ने पेट्रोल डालकर लगाई आग... गंभीर

बिहार के आरा से एक अजीब मामला सामने आया है. जहां बार-बार चालान कटने से परेशान एक ई-रिक्शा चालक ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा लिया. जिससे वह गंभीर रूप से झुलस गया. उसे इलाज के लिए एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

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अस्पताल के बाहर जुटी ऑटो चालक के परिजनों-रिश्तेदारों की भीड़. (Photo: Screengrab)
अस्पताल के बाहर जुटी ऑटो चालक के परिजनों-रिश्तेदारों की भीड़. (Photo: Screengrab)

बिहार के आरा से एक बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है. यहां के टाउन थाना क्षेत्र अंतर्गत पुराना पुलिस लाइन मोड़ पर शनिवार की शाम उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब ऑनलाइन चालान से नाराज एक ऑटो चालक ने आत्मदाह करने की कोशिश कर डाली. बताया जा रहा है कि ऑटो चालक ने गुस्से और हताशा में अपने ही ऑटो से पेट्रोल निकालकर खुद पर छिड़क लिया और आग लगा ली.

हालांकि मौके पर मौजूद अन्य ऑटो चालकों की सूझबूझ से बड़ी अनहोनी टल गई. साथी चालकों ने किसी तरह आग बुझाई और झुलसे चालक को आनन-फानन में इलाज के लिए आरा सदर अस्पताल पहुंचाया. घायल ऑटो चालक की पहचान टाउन थाना क्षेत्र के नाला मोड़ निवासी स्वर्गीय दीनदयाल के पुत्र राजा कुमार के रूप में हुई है. राजा कुमार स्टेशन सिंडिकेट से ऑटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता है.

यह भी पढ़ें: 'प्यार में धोखा मिलने पर मार डाला...', झांसी में महिला ऑटो चालक केस में मुख्य आरोपी का हाफ एनकाउंटर

परिजनों के अनुसार कुछ महीने पहले भी राजा कुमार पर करीब 9 हजार रुपये का ऑनलाइन चालान कटा था. जिसका भुगतान उसने किसी तरह कर दिया था. लेकिन शनिवार को दोबारा 7 हजार रुपये का चालान कटने से वह पूरी तरह टूट गया. आर्थिक तंगी और बढ़ते बोझ से परेशान होकर उसने यह खौफनाक कदम उठा लिया. परिजनों ने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे लोग बेहद गरीब हैं. ऑटो किश्त पर लिया जाता है, कर्ज लेकर परिवार चलाना पड़ता है. 

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ऐसे में बार-बार भारी-भरकम चालान कटना उनके लिए मानसिक और आर्थिक यातना बन गया है. उन्होंने कहा कि अगर इसी तरह चालान काटे जाते रहे, तो गरीब चालकों के सामने आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा. फिलहाल ऑटो चालक का इलाज सदर अस्पताल में जारी है और उसकी हालत पर डॉक्टरों की निगरानी बनी हुई है. यह घटना प्रशासन और सिस्टम के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. क्या नियमों के साथ मानवीय संवेदना भी जरूरी नहीं ?
 

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