WLTP emissions testing: गाड़ी चलाते वक्त जो धुआं निकलता है, वो असल जिंदगी में कितना ज़हरीला है, इसका हिसाब अब और सटीक होने वाला है. सरकार ने तय कर लिया है कि कागज़ों में नहीं, रियल वर्ल्ड में सड़क पर दौड़ती गाड़ियों का इम्तिहान लिया जाएगा. अप्रैल 2027 से देश में गाड़ियों के प्रदूषण नियम बदलने जा रहे हैं और इसका सीधा असर कार कंपनियों से लेकर आम ड्राइवर तक सभी पर पड़ेगा.
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने साफ कर दिया है कि अप्रैल 2027 से M1 और M2 कैटेगरी की गाड़ियों के लिए नया एमिशन टेस्ट लागू होगा. इसके लिए सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स 1989 में बदलाव किया गया है. अब गाड़ियों की जांच WLTP यानी वर्ल्डवाइड हार्मोनाइज्ड लाइट व्हीकल टेस्ट प्रोसीजर के तहत होगी. यही सिस्टम यूरोप में 2018 से चल रहा है.
समझने के लिए बता दें कि, M1 कैटेगरी में वो पैसेंजर वाहन आते हैं जिनमें ड्राइवर सीट के अलावा अधिकतम सीटों की संख्या 8 होती है. वहीं M2 कैटेगरी में वो पैसेंजर व्हीकल आते हैं जिनमें ड्राइवर सीट के अलावा सीटों की संख्या 9 या उससे अधिक हो सकती है. लेकिन इनका वजन 5 टन से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इसमें M2G कैटेगरी भी है, इनके सीटों की संख्या भी 9 से ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन इनमें ऑफ-रोड (क्रॉस-कंट्री) कैपेबिलिटी भी होती है.
अभी तक भारत में गाड़ियों का माइलेज और प्रदूषण मॉडिफाइड इंडियन ड्राइविंग साइकिल यानी MIDC से मापा जाता था. इस सिस्टम पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि ये असली ट्रैफिक और ड्राइविंग कंडिशन के अनुसार सटीक आंकड़े नहीं दिखाता. WLTP को इसलिए लाया जा रहा है, ताकि लैब टेस्ट और रियल वर्ल्ड रोड कंडिशन के बीच का फर्क कम हो सके. यानी आम लोगों को कार की सटीक माइलेज और उससे होने वाले प्रदूषण के बारे में सही जानकारी मिले.
WLTP टेस्ट में कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और पार्टिकल नंबर जैसे प्रदूषकों को ज्यादा रियल तरीके से मापा जाएगा. यानी अब गाड़ी कितना धुआं छोड़ती है, इससे कितना प्रदूषण होता है. इसका आंकड़ा सिर्फ मशीनों तक सीमित न रहकर ज्यादा स्पष्ट होगा.
नए नियमों के तहत सभी BS-VI गाड़ियों को WLTP बेस्ड टेस्टिंग से गुजरना होगा. इसके लिए AIS-175 स्टैंडर्ड लागू किया जाएगा, जिसमें टाइप अप्रूवल, प्रोडक्शन की जांच और एमिशन की उम्र तक का हिसाब शामिल है. ये सारे टेस्ट चेसिस डायनामोमीटर पर होंगे और समय के साथ इनके नियम अपडेट होते रहेंगे.
अप्रैल 2020 में लागू हुए BS-VI नियम दुनिया के सबसे सख्त एमिशन नियमों में गिने जाते हैं. सरकार अब BS-VI की लिमिट्स को बनाए रखते हुए टेस्टिंग सिस्टम बदल रही है. इससे कार कंपनियों को और तगड़ी तैयारी करनी पड़ेगी और उन्हें नए स्टैंडर्ड के मुताबिक वाहनों में बदलाव भी करना पड़ेगा. मकसद साफ है, नियम सख्त रहें, लेकिन आंकड़े रियल वर्ल्ड ड्राइविंग के अनुसार ही हों.
इस बदलाव का असर गाड़ियों के माइलेज नियमों पर भी पड़ेगा. अभी CAFE यानी कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी नियम MIDC पर बेस्ड होते हैं. ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी ने सुझाव दिया है कि, 31 मार्च 2027 से WLTP को अपनाया जाए. यही वक्त CAFE-III की शुरुआत का भी होगा. WLTP अपनाने से भारत का एमिशन और माइलेज टेस्ट सिस्टम दुनिया के बड़े ऑटो बाजारों के बराबर आ जाएगा. इससे न केवल नियमों में एकरूपता आएगी बल्कि गाड़ियों की असली परफॉर्मेंस सामने आएगी.
CAFE स्टैंडर्ड पहली बार सरकार द्वारा ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत 2017 में जारी किए गए थें. ये एक सरकारी नियम है जो किसी भी वाहन के लिए एक मिनिमम या औसत फ्यूल एफिशिएंसी तय करता है. जिसे कार निर्माता द्वारा भारत में बेचे जाने वाले सभी वाहनों को पूरा करना होता है. यह कार के माइलेज को तय करने का एक मानक है. यह नियम कंपनियों को सभी मॉडलों की फ्यूल इकोनॉमी का औसत निकालकर हाई इफिसिएंसी वाली कारें बनाने में मदद करता है. कुल मिलाकर, सड़क पर गाड़ी वही चलेगी, लेकिन उसका हिसाब-किताब अब पहले से ज्यादा स्पष्ट होगा.