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माता को चढ़ता है नॉनवेज प्रसाद... क्या है ठनठनिया कालीबाड़ी का इतिहास, जहां पीएम मोदी ने की पूजा

पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान ठनठनिया काली पीठ अपनी अनूठी पूजा परंपरा और सांस्कृतिक महत्व के कारण चर्चा में है. कोलकाता के इस 300 साल पुराने मंदिर में मां काली की पूजा सिद्धेश्वरी रूप में की जाती है, जहां आमिष भोग चढ़ाने की परंपरा आज भी जीवित है.

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 पीएम मोदी ने कोलकाता में ठनठनिया काली मंदिर में की पूजा की थी
पीएम मोदी ने कोलकाता में ठनठनिया काली मंदिर में की पूजा की थी

पश्चिम बंगाल में मंगलवार को दूसरे चरण की वोटिंग है. राज्य में चुनावी माहौल बना हुआ है और इसी के साथ सामने आ रही है भारत के इस पूर्वी राज्य की संस्कृति, कला, खान-पान और शाक्त परंपरा में रची-बसी इसकी पूजा पद्धति. बंगाल में देवी काली की खास मान्यता है. यहां के लोगों की आस्था के केंद्र हैं दक्षिणेश्वर काली मंदिर, काली घाट मंदिर और तारापीठ काली मंदिर हैं. लेकिन इन सबके बीच चर्चा में है एक और प्रसिद्ध काली पीठ, जिसे स्थानीय लोगों में ठनठनिया काली पीठ के नाम से जाना जाता है.

असल में चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक ठनठनिया काली मंदिर में पूजा-अर्चना की. करीब 300 साल पुराने इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां मां काली को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद पूरी तरह आमिष (नॉन-वेज) होता है.

ठनठनिया कालीबाड़ी की खास परंपरा
कोलकाता के इस प्राचीन मंदिर में मां काली की पूजा ‘सिद्धेश्वरी’ रूप में की जाती है और यहां आज भी आमिष भोग चढ़ाने की परंपरा है. मान्यता है कि रामकृ्ष्ण परमहंस ने केशब चंद्र सेन के स्वास्थ्य लाभ के लिए मां को ‘डाब-चिंगड़ी’ (नारियल और झींगा) का भोग अर्पित किया था. इसके बाद से यहां आमिष भोग की परंपरा शुरू हुई. यह मंदिर वर्ष 1703 में स्थापित हुआ था और इसे ‘जागृत’ मंदिर माना जाता है, जहां से भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते. कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान में इस मंदिर की अहम भूमिका मानी जाती है.

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ठनठनिया काली बाड़ी उत्तर कोलकाता में कॉलेज स्ट्रीट मोड़ के पास, विधान सरणी पर स्थित है. कहा जाता है कि कभी यहां घने जंगल के बीच काली मंदिर की घंटियों की आवाज गूंजती थी. उसी “ठन-ठन” ध्वनि से इस इलाके का नाम ठनठनिया पड़ा. यहां मां काली की पूजा सिद्धेश्वरी रूप में की जाती है. इस काली बाड़ी से कई रोचक कथाएं जुड़ी हुई हैं.

Kali Bari Kolkata

मंदिर से जुड़ीं हैं कई मान्यताएं
जनश्रुति के अनुसार, कभी सुतानुटी गांव के पास बहने वाली भागीरथी नदी के किनारे घने जंगलों से घिरे एक श्मशान में उदनारायण ब्रह्मचारी नामक एक तांत्रिक ने लगभग 1703 ईस्वी में मिट्टी से मां काली की सिद्धेश्वरी रूप की मूर्ति बनाई थी. बाद में 1860 में शंकर घोष नाम के व्यक्ति ने वर्तमान काली मंदिर और पुष्पेश्वर शिव का आठचाला मंदिर बनवाया. तभी से यहां नियमित पूजा की परंपरा शुरू हुई. शंकर घोष ने खुद पूजा की जिम्मेदारी संभाली और उनके वंशज आज भी इस मंदिर के सेवायत हैं.

ठनठनिया काली बाड़ी में मां की मूर्ति मिट्टी की है और हर साल इसका पुनः संस्कार किया जाता है. यहां देवी की पूजा पूर्ण तांत्रिक विधि से होती है. सिद्धेश्वरी देवी चतुर्भुजा और गहरे काले वर्ण की हैं. उनके बाएं हाथों में खड़्ग और नरकपाल सुशोभित हैं, जबकि दाहिने हाथों में अभय और वरद मुद्रा होती है. देवी को सोने के आभूषणों के साथ-साथ मुख्य रूप से चांदी के गहनों से सजाया जाता है.

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ज्येष्ठ महीने में फलहारिणी पूजा, कार्तिक अमावस्या को आदिकाली पूजा और माघ महीने में रटंती काली पूजा होती है. खासतौर पर कार्तिक अमावस्या यानी काली पूजा के दिन देवी सिद्धेश्वरी की भव्य पूजा होती है. हर अमावस्या को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, हालांकि पूरे साल ही श्रद्धालु मंदिर में आते रहते हैं. माना जाता है कि यहां मां के दरबार में हर मनोकामना पूरी होती है, इसलिए उनका नाम सिद्धेश्वरी पड़ा.

Kali Puja

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने सुनाए थे माता को भजन
कहा जाता है कि कामारपुकुर से आकर गदाधर चट्टोपाध्याय (रामकृष्ण देव) कुछ समय के लिए पास के झामापुकुर में रहते थे. किशोर गदाधर के कंठ से मां ने भजन सुने थे. दक्षिणेश्वर जाकर गदाधर जब श्रीरामकृष्ण परमहंस बने, तब भी वे कई बार ठनठनिया काली के दर्शन करने आए थे. साधक कवि रामप्रसाद सेन ने भी यहां सिद्धेश्वरी काली को अपने गीत सुनाए थे.

रामकृष्ण देव अपने भक्तों से कहा करते थे कि ठनठनिया की काली बहुत जागृत हैं. उन्होंने ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन के स्वास्थ्य लाभ के लिए यहां नारियल-चीनी और झींगा का नैवेद्य चढ़ाकर पूजा भी की थी. जब परमहंस देव श्यामपुकुर में बीमार थे, तब उनके भक्तों ने उनके स्वास्थ्य की कामना से इस मंदिर में पूजा की थी.

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ठनठनिया काली बाड़ी सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है. श्रद्धालु किसी भी दिन सुबह 6 बजे से 11 बजे तक और दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक मंदिर में दर्शन कर सकते हैं.

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