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क्या बिना 'सोने के' नहीं हो सकती हैं शादियां? पीएम मोदी की अपील के बाद उठ रहे सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साल के लिए सोने की खरीद टालने की अपील की है, जिससे शादी के परंपरागत रिवाजों पर बहस छिड़ गई है. भारतीय शादियों में सोना परंपरा, प्रेम और सामाजिक पहचान का प्रतीक रहा है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टिकोण से क्या सोना वाकई अनिवार्य है?

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शास्त्रों में हिंदू विवाह पद्धति में गोल्ड अनिवार्यता नहीं, बल्कि कर्मकांड का हिस्सा है
शास्त्रों में हिंदू विवाह पद्धति में गोल्ड अनिवार्यता नहीं, बल्कि कर्मकांड का हिस्सा है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते दो दिनों 'एक साल के लिए सोने की खरीदी टालने' की बात कही. पीएम मोदी की इस अपील के साथ ही एक नई बहस और चर्चा और शुरू हो गई है. शादियों का सीजन चल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिना सोने के शादी हो सकती है?

धूमधाम से शादी का सपना और सोने की अहमियत 

भारतीय शादियां हमेशा से एक भारी-भरकम और लग्जरी आयोजन रही हैं. एक परिवार का सपना होता है कि वह अपने बच्चों की शादी धूमधाम से करे. इस 'धूमधाम' का सीधा मतलब है, महंगी सजावट, अधिक से अधिक लोगों के लिए भोज की व्यवस्था और तीसरा सबसे अहम शादी के बेशकीमती गहने.

हिंदू विवाह में गहनों से जुड़ा रिवाज

जहां तक गहनों का चलन है तो कोई भी सामान्य परिवार लड़की के लिए एक मंगलसूत्र, झुमके, नथ, पायजेब, मांगटीका और सोने के कंगन इतनी व्यवस्था करता है. उत्तर भारतीय मैदानी इलाकों में शादी के इतने गहने सामान्य बात हैं. दूसरा लड़की के लिए ये गहने अनिवार्य रूप से लड़के वालों को भी तैयार कराने होते हैं, जिसे 'डाल' का रिवाज कहा जाता है. इस 'डाल' में पांच-सात या 11 जैसी हैसियत हो उसके अनुसार गहने लेकर आने का रिवाज है. इस डाल की बात शादी के लिए होने वाली बातचीत में ही तय हो जाती है. इसे बहुत जरूरी बताया जाता है.

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विवाह प्रथाएं और विरोधाभास 

अक्सर आदर्श शादियों की स्थिति में आपने 'सिर्फ दो जोड़ी में कन्या को विदा करने वाली बात भी सुनी होगी.' यानी न कोई धन न कोई दहेज और न ही कोई सोना आदि. सामाजिक रीतियों में मान्याताओं का एक लंबा विरोधाभास है. प्रथाएं दो तरह से चलती हैं, शास्त्रीय और सामाजिक. शास्त्रीय प्रथाएं वह हैं जिन्हें शास्त्रों में तौर-तरीके की तरह लिखा गया है. विवाह का होना शास्त्रीय प्रथा है. लेकिन सामाजिक प्रथाओं को समाज का कुलीन वर्ग शुरू करता है और फिर देखा-देखी अन्य लोग भी उसे अपनाने लगते हैं. इस तरह आज का विवाह शास्त्रीय और सामाजिक प्रथा दोनों ही है.

जब किसी का विवाह होता है तो एक तरह से समाज की सबसे छोटी और पहली इकाई तैयार होती है. इस इकाई को फलने-फूलने के लिए लड़का-लड़की का परिवार और आस-पास का समाज सभी मदद करते हैं. सोना देना इस मदद का एक तरीका होता है. इस सोने को परंपरा, प्रेम का प्रतीक, सुहाग का चिह्न, आशीर्वाद, स्त्री धन और दहेज जैसे कई नाम दिए गए हैं, लेकिन सबका मकसद एक ही है. फिर भी शास्त्रों में इसे कभी अनिवार्य तौर पर शामिल नहीं किया गया है. यानी सोना विवाह में सबसे जरूरी माने जाते हुए भी विवाह की परंपरा-पद्धति का सबसे जरूरी हिस्सा नहीं है.

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विवाह में मंगलसूत्र की अहमियत

जैसे हिंदू विवाह में मंगलसूत्र को सबसे अनिवार्य बताया जाता है. इसकी जड़ों में जाएं तो पता चलता है कि 'मंगलसूत्र' शब्द दक्षिण भारत की परंपराओं से आया है. जहां विवाह को मंगलकल्याणम कहते हैं. यानी मांगलिक और कल्याणकारी कार्य. तमिल परंपरा में मंगलसूत्र को 'थाली' या 'थिरुमंगल्यम' (Thirumangalayam) कहा जाता है, जो विवाह का सबसे पवित्र प्रतीक है. यह आमतौर पर एक पीले धागे (मंजा कायिरु) या सोने की चेन में पिरोई गई दो सोने की डिस्क (लटकन) होती है, जो वर-वधू के परिवारों के मिलन का प्रतीक है.

तेलुगू की पारंपरिक विवाह व्यवस्था में सात डोरों के एक समूह को एक साथ मिलाकर हल्दी में डुबोकर रखा जाता है, फिर इसमें सोने की दो लटकन (पेंडेंट) जोड़ी जाती है. अब इससे बनी माला को शादी के समय सप्तपदी से पहले पति, अपनी पत्नी के गले में तीन गांठें बांधकर पहनाता है. इन तीन गांठों को प्रेम, विश्वास और समर्पण की गांठें कहा जाता है. इसका संबंध शिव-पार्वती के विवाह से जुड़ी एक लोककथा से जुड़ता है.

कहते हैं कि शिवजी ने जब पार्वती से विवाह किया तो उन्हें पार्वती के पूर्व जन्म की याद आ गई. तब शिव को दुख हुआ कि काश सती अपने पिता के दक्ष यज्ञ में न जातीं तो उन्हें भस्म नहीं होना पड़ता और दूसरा कि अगर वहां मैं साथ होता तो शायद ये अनिष्ट नहीं होता, तब शिव ने हल्दी-चंदन के धागे में खुद की शक्ति बांधकर पार्वतीजी के गले में पहनाईं थीं और इस तरह तेलुगू विवाह परंपरा में इसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण हो गया. तो पहले-पहले मंगलसूत्र हल्दी की दो गांठों से बनता था. बाद में यही मंगलसूत्र सोने से बनने लगा.

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पहले जो इसका पीला डोरा होता था वह अब सोने का है. सोना शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है. धन की देवी लक्ष्मी का ही एक रूप है, आरोग्य का वरदान है, इसके साथ ही काले दाने नकारात्मक शक्तियों को दूर करने वाले हैं और शिव स्वरूप हैं, लिहाजा मंगलसूत्र की भारतीय विवाह परंपरा में बड़ी मान्यता है.

वैदिक वैवाहिक पद्धति और सोने की मौजूदगी?

अब भारतीय विवाह परंपराओं की बात करें तो शास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं. किसी ने स्वेच्छा से प्रेम विवाह किया तो उसे गंधर्व विवाह कहा गया, लड़के ने किसी लड़की को जबरन किडनैप करके उससे विवाह कर लिया तो उसे राक्षस विवाह कहा गया. माता-पिता ने वर का पूजन कर कन्यादान करते हुए उसका विवाह किया और वर-वधू दोनों को ही एक सूत्र में बांधा तो उसे प्रजापत्य विवाह कहा जाता है. आम तौर पर आजकल हम जितने हिंदू विवाहों में शामिल होते हैं, वे इसी तरह के प्रजापत्य विवाह के ही प्रकार हैं.

वेदों में ब्रह्म विवाह का जिक्र है जिससे सबसे श्रेष्ठ बताया गया है. इसमें योग्य वर को बुलाकर कन्या का उसे दान किया जाता है. फिर यज्ञ कराने वाले किसी पुरोहित से कन्या का विवाह कराया जाए तो उसे दैव विवाह कहते हैं. पुराणों में राजा दशरथ की बेटी शांता और ऋषि शृंगी का विवाह दैव विवाह ही था.

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इन सभी शास्त्रीय विवाह पद्धतियों में कहीं भी सोने के चलन का जिक्र नहीं है. गंधर्व विवाह में लड़का और लड़की खुद एक-दूसरे का चुनाव करके सिर्फ वरमाला पहनाकर एक-दूसरे के हो जाते थे. राजा दुष्यंत और शकुंतला का विवाह गंधर्व विवाह ही हुआ था. जहां राजा ने शकुंतला से प्रेम प्रस्ताव रखा और कण्व ऋषि के गैरमौजूदगी में दोनों ने विवाह कर लिया.

इसी दौरान शकुंतला का गर्भवती भी हो गई थी. इस विवाह में न तो कण्व ऋषि ने ही और न ही राजा दुष्यंत ने उन्हें कोई सोना दिया था. मूल महाभारत ग्रंथ में अंगूठी खोने की भी कोई कहानी नहीं है. इसलिए विवाह में सोने देने के चलन का कोई पौराणिक आधार नहीं है.समुद्र मंथन से निकलने के बाद देवी लक्ष्मी ने सिर्फ माला पहनाकर भगवान विष्णु को अपना लिया था.

शिव और राम विवाह से चला सोने के उपहारों का चलन

विवाह में सोना-चांदी, आभूषण और उपहार देने का सबसे प्रचलित उदाहरण राम-सीता के विवाह से लिया जाता है. जहां जनकजी ने सीताजी की विदाई में उन्हें बहुत से गहने दिए साथ ही अयोध्या के लिए भी बहुत से उपहार भिजवाए थे. ये जनकजी का सामर्थ्य था, कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं.

शिव-पार्वती के विवाह में राजा हिमालय ने पार्वती को बहुत से आभूषण देकर विदा किया था. शिव-पार्वती विवाह ही आदर्श विवाह माना जाता है और इसी कहानी के आधार पर विवाह में सोना देने का चलन बढ़ा.

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पतियों की ओर से उपहार देने का चलन

पुराण कथाओं में पतियों की ओर से पत्नियों को आभूषण दिए जाने का जिक्र है, जो आज के दौर में उदाहरण बनते हुए सुहाग की निशानी बन गए हैं. जैसे श्रीराम ने सीता जी को मुंहदिखाई में चूड़ामणि दिया था. ये जूड़े के ऊपर मुकुट की तरह खोंसा जाने वाला एक आभूषण होता था, जो अब प्रचलित नहीं है, लेकिन अब भी लड़कों का अपनी पत्नी को शादी में कोई न कोई आभूषण जैसे अंगूठी, हार आदि देने का 'अनिवार्य' सा चलन है.

महाभारत में जिक्र मिलता है कि पांचों पांडवों ने द्रौपदी से विवाह करते हुए उसे अलग-अलग आभूषण दिए थे. जिनमें कर्ण फूल, कंठहार, कड़े, मणिबंध (कमर में बांधने वाली लड़ी) और मुंदरी (अंगूठी) शामिल थी.

श्रीकृष्ण के विवाह में भी नहीं है सोने-चांदी का जिक्र
जब श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी से उनका हरण करके विवाह किया था, तब उन्हें वनफूल की माला पहनाकर स्वीकार किया था. वहां किसी तरह के सोने-चांदी के लेन-देन का जिक्र नहीं है. जांबवंती से श्रीकृष्ण ने जंगल में ही विवाह किया था. वहां भी किसी सोने-चांदी के लेन-देन का जिक्र नहीं है.

हालांकि जब श्रीकृष्ण का विवाह सत्यभामा से हुआ तब उनके पिता   सत्राजित जो एक धनी सेठ थे, उन्होंने श्रीकृष्ण को बहुत सारा सोना उपहार में दिया था. फिर वह पौराणिक स्यमंतक मणि भी श्रीकृष्ण को ही दे दी थी, जिसकी मान्यता है कि वह रोज 100 तोला सोना बनाती थी.

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ये सब कहानियां बाद में हिंदू विवाह परंपराओं का आधार बनीं. लेकिन असल में विवाह के लिए जरूरी है सिर्फ प्रेम, विश्वास और समर्पण. ये तीनों हो तो कोई भी सोना, कोई भी गहना, कोई भी उपहार जरूरी नहीं है. सिर्फ मन का मिलना जरूरी है.

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आज युवा फॉलो कर रहे हैं 'नो गोल्ड वेडिंग' ट्रेंड

एक सर्वे की मानें तो आज के युवा भी 'नो गोल्ड वेडिंग ट्रेंड' को फॉलो कर रहे हैं. वे अपनी शादी में या तो बहुत कम सोना पहन रहे हैं या फिर पूरी तरह इसे नकार रहे हैं. यह बदलाव सिर्फ फैशन या मिनिमलिस्ट ट्रेंड भर नहीं है. इसके पीछे आर्थिक दबाव, सामाजिक सोच में बदलाव, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और शादी को दिखावे से अलग देखने की नई मानसिकता काम कर रही है.

एक्सपर्ट का कहना है कि भारतीय शादी में सोना सिर्फ गहना नहीं था. यह सुरक्षा, प्रतिष्ठा, बचत और सामाजिक पहचान का प्रतीक था. पहले के समय में शादी में दिया गया सोना महिलाओं के लिए एक आर्थिक सुरक्षा कवच माना जाता था. यह ऐसा निवेश था जिसे जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सकता था.

लेकिन अब स्थिति बदल रही है. बड़ी संख्या में महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. वे शादी को आर्थिक सुरक्षा का माध्यम नहीं मानतीं. ऐसे में सोने का पुराना प्रतीकात्मक महत्व कमजोर पड़ने लगा है. उनके मुताबिक, आज के युवा शादी को “परफॉर्मेंस” यानी सामाजिक प्रदर्शन की बजाय निजी और अर्थपूर्ण अनुभव के रूप में देखना चाहते हैं. यही वजह है कि थोड़ा-थोड़ा और धीरे-धीरे ही सही, सोने से उनका मोहभंग हो रहा है.

सोने का नहीं है विवाह में इस्तेमाल का शास्त्रीय आधार
शास्त्रीय आधार पर भी सोना विवाह का जरूरी हिस्सा नहीं है, यह कर्मकांड का हिस्सा है और बिना इसके भी शादियां हो सकती हैं. इसलिए अगर एक साल तक सोने की खरीदी को टालने की बात कही जा रही है तो इससे विवाह व्यवस्था पर असल में कोई असर नहीं पड़ेगा, जबतक कि आपकी निजी इच्छा और छिपी हुई मानसिकता आड़े न आए.

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