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जब प्रेम गाए मिलन के गीत फिर भी सुनाई दे छिपी हुई पीर तो समझिए सज रही है राग भैरवी

राग भैरवी भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसे न सिर्फ शास्त्रीय गायकों ने अपनाया, बल्कि उपशास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत के फनकारों ने भी इसे अपनी फनकारी में जगह दी है. इस राग की मधुरता और भावनात्मक गहराई ने कई गायकों को आकर्षित किया, जिन्होंने इसे अपनी प्रस्तुतियों से अनमोल बना दिया. 

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राग भैरवी को भक्ति-शक्ति, शृंगार के साथ अध्यात्म का संगम भी कहा गया है (Photo- AI)
राग भैरवी को भक्ति-शक्ति, शृंगार के साथ अध्यात्म का संगम भी कहा गया है (Photo- AI)

साल 1963 में फिल्म आई थी, 'दिल ही तो है' फिल्म में एक बेहद प्रसिद्ध गीत है, 'लागा चुनरी में दाग' जिसे असल में मन्ना डे ने गाया था. फिल्म में भले ही ये गाना मजाकिया लहजे में थे, लेकिन ये पूरा गायन गंभीर था. इसकी गंभीरता की तीन वजहें थीं, एक तो ये कि ये गाना  बाबा कबीर की साखी से प्रेरित था, दूसरा कि इसे गा रहे थे मन्ना डे और तीसरा और सबसे बड़ा कारण इस गीत की आत्मा, इसका राग और यह राग था सिंधु भैरवी, मूल रूप से राग भैरवी ही, जो खुद अपने ही नाम के थाट भैरवी से उत्पन्न हुई है. राग भैरवी, आत्मा का गीत है. परमात्मा से जोड़ने वाला संगीत है और विशुद्ध रूप से आस्था और अध्यात्म का जरिया है.

राग भैरवी का स्थायी भाव कबीर की उलटबासी जैसा ही है. यह राग सिर्फ उस दृश्य की प्रसन्नता का विषय वस्तु नहीं है, जो दिखाई दे रहा है, बल्कि यह बड़े ही दार्शनिक भाव में आगे की बात करने वाला राग है. लागा चुनरी में दाग को ही लीजिए, यहां सरल सी बात नहीं हो रही है कि चुनरी में दाग लग गया है. बात ये है कि उसे छिपाया कैसे जाए. यह भी बड़ी समस्या नहीं है, समस्या यह है कि क्या इस दाग को उससे (ईश्वर से) छिपाया जा सकता है? 

यही बात बड़े ही शृंगार वाले ढंग से कहनी है, दुख भी जाहिर करना है, लेकिन दुख जताना नहीं है. प्रेम है, लेकिन प्रेम दिखाना नहीं है. ये सब कैसे हो? इसका सरल जवाब है राग भैरवी. जब प्रेम मिलन के गीत गाए और फिर भी किसी छिपे दुख की आहट आए तो समझिए की राग भैरवी सज रही है.

इसीलिए हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में राग भैरवी को भक्ति-शक्ति और शृंगार के साथ विशुद्ध अध्यात्म का संगम भी माना गया है.

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Raga Bhairavi

राग भैरवी और इसके आध्यात्मिक पहलू
यही वजह है कि राग भैरवी का एक गहरा आध्यात्मिक पहलू भी है. इसे सुबह के समय गाने की परंपरा इसलिए है, क्योंकि यह दिन की शुरुआत में मन को शुद्ध और शांत करने की शक्ति रखता है. इस राग के स्वरों में एक ऐसी शक्ति है जो सुनने वाले को ईश्वर के करीब ले जाती है. यह केवल संगीत नहीं, बल्कि एक प्रार्थना है, जो आत्मा को ऊंचा उठाती है.

कोमल स्वरों से सजता है राग भैरवी
राग भैरवी में कोमल स्वरों का सटीक प्रयोग और भावनात्मक गहराई की ज़रूरत होती है. एक छोटी सी चूक भी इसके सौंदर्य को प्रभावित कर सकती है. लेकिन जब इसे सही ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, तो यह सुनने वाले के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है. इस राग में स्वरों की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता अनुशासन के साथ आती है. यही इसकी सुंदरता है.

राग भैरवी भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसे न सिर्फ शास्त्रीय गायकों ने अपनाया, बल्कि उपशास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत के फनकारों ने भी इसे अपनी फनकारी में जगह दी है. इस राग की मधुरता और भावनात्मक गहराई ने कई गायकों को आकर्षित किया, जिन्होंने इसे अपनी प्रस्तुतियों से अनमोल बना दिया. 

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1. उस्ताद अब्दुल करीम खां साहब
किराना घराने के इस महान उस्ताद को ठुमरी और खयाल गायन में महारत हासिल थी. राग भैरवी में उनकी प्रस्तुति "जमुना के तीर" एक ऐसा जादू है, जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसा हुआ है. उस्ताद अब्दुल करीम खां ने राग भैरवी को एक नई भावनात्मक ऊंचाई दी. उनकी आवाज़ में कोमल स्वरों का ऐसा जादू था कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था. उनकी गायकी में भक्ति और शृंगार रस का अनूठा संगम देखने को मिलता है. उनके शिष्य, जैसे पंडित भीमसेन जोशी और सवाई गंधर्व, ने भी इस राग को आगे बढ़ाया.

2. पंडित भीमसेन जोशी
किराना घराने के इस दिग्गज गायक की गहरी और भावपूर्ण आवाज़ ने राग भैरवी को एक नया आयाम दिया. पंडित जी की प्रस्तुतियों में राग भैरवी का भक्ति रस ऐसा उभरता था कि श्रोता ईश्वर के करीब महसूस करने लगते थे. उनकी लंबी आलाप और तानों ने इस राग की गहराई को और बढ़ाया.उनकी गायकी ने नई पीढ़ी के गायकों को प्रेरित किया, और आज भी उनकी रिकॉर्डिंग्स संगीत सीखने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं.

3. उस्ताद फैयाज़ खां
आगरा घराने के इस उस्ताद की ठुमरी "बाजूबंद खुल-खुल जाए" राग भैरवी की एक अनमोल निधि है. उनकी गायकी में शक्ति और कोमलता का अद्भुत मेल था. फैयाज़ खां ने राग भैरवी को ठुमरी और दादरा के माध्यम से लोकप्रिय बनाया. उनकी आवाज़ में एक रौब था, जो इस राग के करुण रस को और गहरा करता था. उनकी शैली ने उपशास्त्रीय संगीत को नई दिशा दी, और उनके शिष्यों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया.

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बेगम परवीन सुल्ताना
पटियाला घराने की इस महान गायिका की ऊंची और मधुर आवाज ने राग भैरवी को एक अलग रंग दिया. उनकी प्रस्तुति में तानों की रफ्तार और भावों की गहराई लाजवाब थी. बेगम परवीन सुल्ताना ने राग भैरवी में कई भजनों और ठुमरियों को गाया, जो आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं. उनकी गायकी में स्त्रीत्व की कोमलता और शक्ति दोनों झलकती थी. उनकी प्रस्तुतियां महिलाओं को शास्त्रीय संगीत में आगे आने के लिए प्रेरित करती हैं.

कुंदनलाल सहगल
सहगल साहब भले ही शास्त्रीय गायक न रहे हों, लेकिन उनकी आवाज़ में राग भैरवी का जादू साफ़ झलकता था. उनका गीत "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए" इस राग का एक लोकप्रिय उदाहरण है. सहगल ने राग भैरवी को फिल्मी संगीत के जरिए आम जनता तक पहुंचाया. उनकी सादगी भरी गायकी ने इस राग को घर-घर में मशहूर कर दिया. उनकी शैली ने बॉलीवुड के कई गायकों को प्रभावित किया, और आज भी उनकी आवाज में राग भैरवी की मिठास लोग सुनते हैं.

पंडित ओंकारनाथ ठाकुर
ग्वालियर घराने के इस महान गायक की गायकी में राग भैरवी का भजन "जोगी मत जा, मत जा" बेहद प्रसिद्ध है. उनकी आवाज़ में एक आध्यात्मिक शक्ति थी. पंडित ओंकारनाथ ने राग भैरवी को भक्ति और करुण रस से जोड़ा. उनकी प्रस्तुति में स्वरों की गहराई और भावनाओं का तूफान होता था. उनकी गायकी ने शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई.

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भजन, ठुमरी, लोकगीत सभी में बस गई राग भैरवी
राग भैरवी की खूबी यह है कि यह हर गायक को अपनी शैली के अनुसार ढालने की छूट देता है. उस्ताद अब्दुल करीम खां और पंडित भीमसेन जोशी ने इसे भक्ति से जोड़ा, तो उस्ताद फैयाज़ खां और बेगम परवीन सुल्ताना ने इसमें ठुमरी की मिठास भरी. कुंदनलाल सहगल और ग़ुलाम अली जैसे गायकों ने इसे लोकप्रिय संगीत में ढालकर नई पीढ़ी तक पहुंचाया. हर गायक ने अपने घराने और व्यक्तित्व के अनुसार इस राग को नया रंग दिया, लेकिन इसकी मूल आत्मा—भक्ति, प्रेम और करुणा—हमेशा बरकरार रही.

राग भैरवी भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा राग है, जो केवल स्वरों का समूह नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और भावनात्मक यात्रा है. यह सुबह की पहली किरण की तरह शांत और प्रेम की अनंत गहराइयों की तरह गहन है. इसका नाम माँ भैरवी से जुड़ा है, जो शक्ति और संरक्षण की प्रतीक हैं. इस राग की उत्पत्ति, पौराणिक कथाएँ, और स्वरों की बारीकियाँ इसे एक अनूठा स्थान देती हैं. 

क्या देवी भैरवी से जुड़ी है पहचान?
राग भैरवी का नाम देवी भैरवी से लिया गया है, जो हिंदू धर्म में माँ दुर्गा के दस महाविद्याओं में से एक हैं. "भैरवी" शब्द "भय को हरने वाली" से आता है, और यह राग भी सुनने वाले के मन से भय और अशांति को हरकर शांति प्रदान करता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवी पार्वती ने अपने क्रोध और शक्ति के रूप में भैरवी का अवतार लिया, तो उन्होंने दुष्टों का संहार किया और भक्तों को अभयदान दिया. इस संदर्भ में राग भैरवी को शक्ति और करुणा का प्रतीक माना जाता है. संगीतज्ञों का मानना है कि यह राग उस समय की ऊर्जा को प्रतिबिंबित करता है, जब 

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एक नई शुरुआत का राग
एक अन्य कथा में कहा जाता है कि भगवान शिव ने जब तांडव नृत्य किया, तो उनकी शक्ति से उत्पन्न ध्वनियों ने कई रागों को जन्म दिया. इनमें राग भैरवी को भैरवी देवी की संगीतमय अभिव्यक्ति माना गया. संगीत शास्त्र के ग्रंथ "संगीत रत्नाकर" (13वीं शताब्दी, शारंगदेव द्वारा) में भी राग भैरवी का उल्लेख मिलता है, जहां इसे भक्ति और शांति का राग कहा गया है. यह प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है, जो आज भी जीवित है.

राग भैरवी का स्वरूप और बारीक संरचना
राग भैरवी भैरवी थाट का आधार राग है, जो संपूर्ण जाति का है, यानी इसमें सातों स्वर प्रयोग होते हैं. लेकिन इसकी खासियत इसके कोमल स्वरों में छुपी है. इसका आरोह और अवरोह इस प्रकार है:
आरोह: सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां

अवरोह: सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, मा, ग॒ (कोमल), रे॒ (कोमल), सा

वादी स्वर: मध्यम (मा)  

संवादी स्वर: षड्ज (सा)  

समय: प्रभात (सुबह), हालांकि इसे कभी भी गाया जा सकता है.  

प्रकृति: भक्ति, करुण, और श्रृंगार रस से युक्त.


कोमल स्वरों का जादू: राग भैरवी में चार कोमल स्वर (रे, ग, ध, नि) हैं, जो इसे करुण और कोमल बनाते हैं. इन स्वरों को "रीझ" के साथ गाया जाता है, यानी हल्का कंपन (मींड) देकर, जो भावनाओं को गहराई में ले जाता है. मध्यम स्वर इस राग की आत्मा है. राग का गायन करते समय यह वह जगह होती है, जहां लंबे समय तक ठहराकर गाया जा सकता है. जैसे "मं.... प ध म", यही वह खूबसूरती है, जिससे भैरवी में चार चांद लगते हैं और यह राग निखर कर आता है.  राग भैरवी में स्वरों को थोड़ा "वक्र" (टेढ़ा) करके गाने की छूट है, जो इसे ठुमरी और भजनों के लिए बहुत सरल और अलंकारिक बना देता है. 

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न्यास स्वर: इस राग में षड्ज और मध्यम पर ठहराव (न्यास) लिया जाता है, जो इसे स्थिरता और शांति देता है.

संगीत शास्त्र के ग्रंथ "नाद विनोद" में पंडित भातखंडे ने राग भैरवी को "सर्वस्वर संनादति" कहा है, यानी यह सभी स्वरों को समेटे हुए है, फिर भी अपनी पहचान नहीं खोता.
संगीत रत्नाकर (शारंगदेव) ग्रंथ में राग भैरवी को "शक्ति संनाद" के रूप में वर्णित किया गया है, जो भैरवी देवी की ऊर्जा को दर्शाता है. यहां इसे सुबह की ऊर्जा को जागृत करने के लिए बहुत उपयुक्त बताया गया है.

मूलाधार चक्र को जगाता है राग भैरवी
राग भैरवी का प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं है. इसके स्वरों में एक ऐसी शक्ति है जो मन को शांत और आत्मा को प्रफुल्लित करती है. सुबह के समय इसे गाने की परंपरा इसलिए है, क्योंकि यह दिन की शुरुआत में सकारात्मकता लाता है. तंत्र और योग में इसे "मूलाधार चक्र" को जागृत करने वाला माना जाता है, जो स्थिरता और ऊर्जा का केंद्र है.

राग भैरवी एक ऐसा राग है, जो पौराणिकता, संगीत, और भावनाओं का त्रिवेणी संगम है. इसकी उत्पत्ति माँ भैरवी की शक्ति से, इसका स्वरूप कोमल स्वरों की मिठास से, और इसका प्रभाव आत्मा की गहराइयों से जुड़ा है. चाहे मीराबाई का भजन हो या उस्तादों की ठुमरी, यह राग हर रूप में अमर है. इसे सुनते वक्त अपने मन को खुला रखें, और इसके स्वरों में डूब जाएँ—यह केवल संगीत नहीं, बल्कि एक अनुभूति है.

Rajkapoor

राजकपूर, लता मंगेशकर और राग भैरवी
राज कपूर, जिन्हें बॉलीवुड का "शोमैन" कहा जाता है, वह संगीत के दीवाने थे. वो सिर्फ़ एक फिल्ममेकर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे कलाकार थे जिनके लिए संगीत उनकी फिल्मों की आत्मा था. और लता मंगेशकर, जिनकी आवाज़ को "स्वरों की मल्लिका" कहा जाता है, उनकी गायकी में राग भैरवी की छाप अक्सर देखने को मिलती थी. इन दोनों का राग भैरवी से लगाव कोई संयोग नहीं था, ये एक ऐसा राग है जो भक्ति, प्रेम, और करुणा को एक साथ समेट लेता है, और राज कपूर की फिल्मों की भावनात्मक गहराई के साथ पूरी तरह मेल खाता था.

राज कपूर ने अपने संगीतकारों खासकर शंकर-जयकिशन के साथ मिलकर राग भैरवी को अपनी फिल्मों में बार-बार इस्तेमाल किया. ऐसा कहा जाता है कि वो गीतों की धुन सुनते वक्त अगर उसमें भैरवी की झलक मिलती, तो उसे तुरंत पसंद कर लेते थे. लता जी भी इस राग को गाने में माहिर थीं, और उनकी आवाज़ में भैरवी के कोमल स्वर ऐसे खिलते थे जैसे सुबह की ओस में फूल.

राग भैरवी की खासियत ये है कि इस राग के जरिए हर भाव को आसानी से व्यक्त किया जा सकता है. चाहे वो प्रेम हो, दर्द हो, या भक्ति. राज कपूर की फिल्मों में ये सारे रंग दिखते हैं. उनकी फिल्मों के गीतों में भैरवी का इस्तेमाल इसलिए खास था, क्योंकि वो आम आदमी की भावनाओं को बड़े पर्दे पर उतारना चाहते थे, और भैरवी उसमें उनकी मदद करती थी. लता जी के लिए भी ये राग खास था, क्योंकि उनकी शास्त्रीय ट्रेनिंग और भावनात्मक गायकी इस राग में पूरी तरह खिलती थी.

राजकपूर के कई फिल्मी गीतों में राग भैरवी की झलक
जैसे 1955 में आई फिल्म श्री 420 को देखिए, इसका गीत "प्यार हुआ इकरार हुआ" कितनी खूबसूरती से दिल में उतरता जाता है. इस गाने में राग भैरवी की ही छाया का अनुभव होता है. संगीतकार शंकर-जयकिशन के सुरों से सजे इस गीत को लता मंगेशकर और मन्ना डे ने आवाज दी थी. इस गीत में राग भैरवी की मधुरता और प्रेम का रस साफ सुनाई देता है. "सा रे_ ग॒ म" की शुरुआत और लता जी की कोमल आवाज़ इसे यादगार बनाती है. राज कपूर ने इस गाने को बारिश के दृश्य के साथ फिल्माया, जो इसके भाव को और गहरा करता है.

इसी तरह इससे पहले आई आवारा, 1951 का गीत सुनिए, "घर आया मेरा परदेसी" इसे भी लता मंगेशकर ने आवाज दी थी और यह गीत भी भैरवी में अपने भाव सामने रखता है. ये गीत भैरवी में निभाए गए शृंगार के सबसे सुंदर रूप मिलन का बेहतरीन नमूना है. लता मंगेशकर की आवाज़ में नायिका के इंतजार पूरा होने की सच्ची खुशी है और गीत में आए कोमल स्वरों का खेल इस गीत को अमर बना देता है.

Lata Mangeshkar

वापस लौट चलिए 1964 के दौर में, जब आई थी संगम. इसका एक गीत "दोस्त दोस्त न रहा" तो कभी नहीं भुलाया जा सकता है. हालांकि मुख्य रूप से तो यह गीत राग शिवरंजिनी में है, लेकिन इसमें राग भैरवी की झलक भी है, जो अंतरों में बेहद भावुक दौर में प्रयोग की गई है. समझिए कि गीत सुनते हुए जिस पंक्ति पर दिल में टीस से उठे, वहां पर भैरवी है. इस गीत में भैरवी का दर्द भरा अंदाज़ है. दोस्ती और प्यार में धोखे की भावना को भैरवी के स्वरों में ऐसा पिरोया गया है कि सुनने वाला रो पड़े. राज कपूर ने भी इस गीत को फिल्म में एक टर्निंग पॉइंट बताया था.

संगीत की धरोहर है राग भैरवी
राग भैरवी भारतीय संगीत की एक ऐसी धरोहर है, जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है. यह सुबह की पहली किरण की तरह शुद्ध, प्रेम की पहली नज़र की तरह कोमल, और भक्ति की पहली प्रार्थना की तरह पवित्र है. इसके स्वरों में जीवन की हर भावना समाई हुई है खुशी, दर्द, प्रेम, और शांति. जब भी आप इसे सुनें, अपने मन को खुला रखें, और इसकी मधुरता को अपनी आत्मा में उतरने दें. राग भैरवी केवल संगीत नहीं, बल्कि एक अनुभव है, एक ऐसी सैर जो आपको अपने भीतर की गहराइयों तक ले जाती है.

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