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जंग, किल्लत और दुश्वारियां... लोकगीत बताते हैं क्या रहा युद्ध का हासिल

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने न केवल भौतिक विनाश किया है बल्कि इसके सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव भी गहरे हैं. युद्ध की पीड़ा और सैनिकों के परिवारों की व्यथा लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त होती है, जो विभिन्न भारतीय भाषाओं और क्षेत्रों में मौखिक परंपरा के रूप में जीवित हैं.

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जंग का एक आम समाज पर क्या असर पड़ता है, लोकगीतों ने इस विषय को बहुत गहराई से छुआ है
जंग का एक आम समाज पर क्या असर पड़ता है, लोकगीतों ने इस विषय को बहुत गहराई से छुआ है

युद्ध... क्या है युद्ध? बरसते अंगारों से दहकते शहर और वीरान होती आबाद बस्तियां. सिसकते अनाथ बच्चे, कराहते घायल और जमींदोज हो चुके सपनों के घर. धुएं और धूल के गुबार और इसके पीछे सिर्फ टार्गेट को हिट कर देने की चिल्लाहट वाली खुशी. आप इस पर न जाइए कि लड़ाई का ऐलान किसने किया और किसकी वजह से ये लड़ाई हुई. हफ्तों-महीनों या सालों तक चलते रहे युद्ध... नतीजे में भले ही किसी को जीत मिल गई हो, लेकिन असल में युद्धों का हासिल क्या है?

हासिल है खून के दलदल, लाशें जिनका कोई पुछइया नहीं और फूट-फूटकर आती रुलाई, जिसे कोई चुप कराने वाला नहीं. ये एक दिन की बात नहीं. किसी की जीत के बाद युद्ध भले ही खत्म हो जाते हैं लेकिन जिनकी जिंदगी बिखर जाती है वो जिंदगी भर नहीं सिमट पाती... इतिहास गवाह है कि इसके बावजूद न युद्ध कभी रुके न रुकी गिरती लाशें. अशोक, सिकंदर, नेपोलियन, हिटलर, चीन-जापान, फ्रांस, जर्मनी, ईराक, ईरान, इंग्लैंड, अमेरिका... नाम लेते जाइए और युद्ध के भयानक अंजाम याद करते जाइए. भीषण लड़ाइयों के इन्हीं अंजामों से निकले शब्द जब टूटे-बिखरे दिल के संगीत से मिले तो बने युद्ध के गीत... वॉर सॉन्ग... 

दुनिया की कोई सभ्यता ऐसी नहीं है जिनमें युद्ध के दुख-दर्द को बयां करने वाले गीत न हों. इनकी संख्या प्रार्थना के गीतों के बराबर ही बैठेगी, बल्कि कई प्रार्थनाएं भी युद्ध में विजय की कामना करती हैं और कई प्रार्थनाएं युद्ध के बाद उठे दर्द को कम करने का मलहम बनती हैं. यानी वहां भी युद्धों की घुसपैठ है. 

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आग में जल रहा मिडिल ईस्ट और तप रही आम जनता
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध को हफ्ते से अधिक समय हो चुका है. मिडिल ईस्ट इस युद्ध की आग में जल रहा है. गैस-तेल, ईंधन जैसी जरूरत की चीजों में किल्लत होने लगी है और कहीं न कहीं पूरी दुनिया ही इससे जूझना शुरू हो चुकी हैं. इसी समय याद आते हैं 'युद्ध के गीत'. ये दो तरह के होते हैं एक तो वो जो युद्धों में सिपाही का हौसला दुश्मन में खौफ बढ़ाते हैं. दूसरे वो, जिनके शब्दों को निचोड़ें तो इनमें से दुख-दर्द, पीड़ा-संवेदना धार मार कर बहेगी.  

इतिहास की किताबों में युद्ध अक्सर हार-जीत की कहानी बनकर दर्ज होता है, लेकिन युद्ध की असली कहानी सूने आंगन और इंतजार में सूखी आंखों में बसती है. इनसे मिलकर जो लोकगीत बने उन्हें पीढ़ियों से लोग गाते-दुहराते आ रहे हैं.  लोकगीतों की परंपरा मौखिक है. लेखक एके रामानुजन दर्ज करते हैं कि जंग के ये गीत लोगों की याद और भावनाओं में जिंदा रहते हैं, इन गीतों में युद्ध की वीरता से अधिक उसके सामाजिक और भावनात्मक असर का ब्यौरा मिलता है. 

गीत जो युद्ध का भयावह हाल बताते हैं
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी बोली वाले इलाके में सैनिक जीवन से जुड़े लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है. ब्रिटिश पीरियड में बड़ी संख्या में इन इलाकों के जवान सेना में भर्ती हुए थे, वह युद्धों में भी झोंके गए, जिसके कारण सैनिक जीवन का असर गांवों के सामाजिक जीवन पर भी पड़ा. एक भोजपुरी लोकगीत में पत्नी अपने पति से कहती है-

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'मत जइहा सैंया परदेस हो,
तोहरे बिना सूना अंगना।
कइसे कटिहें अँधियारी रात,
कौन बुझाई मन के दहना।”

 

यह गीत पीछे छूट गए घर की पीड़ा को सामने लाता है.

लेखक और रिसर्चर बद्रीनारायण लिखते हैं कि भोजपुरी लोकगीत सैनिक की विदाई का जैसा सीन बनाते हैं, बिटिया की विदाई का दुख उसके आगे कम पड़ जाता है. जिसमें सिर्फ परिवार ही नहीं पूरा गांव शामिल हो जाता है. जैसे एक गीत में मां की चिंता देखिए...

“का लिखि भेजलें बेटा चिट्ठी में,
सरहद पर लागल बा आग।
रउरा बिना सूना लागे घरवा,
कइसे बिताई ई फाग।”

सैनिकों की विदाई और उससे उपजी बिछड़न सिर्फ भोजपुरी ही नहीं बल्कि देश के हर गांव की उसकी अपनी व्यथा-कथा है. राजस्थान की धरती जिसे धरती धोरां री कहा जाता है, वह सिर्फ अपनी शौर्यगाथा के लिए नहीं फेमस है, बल्कि यहां से विरह और विदा के ऐसे गीत निकले हैं जो आंखों को झील बनाने के लिए काफी हैं. 
एक राजस्थानी लोकगीत में नायिका अपने पति-प्रेमी के इंतजार में गाती है- 

'घोड़ो आयो रण से पर,
सांवरियो साथ न आयो।
आंगण सूना, नैणा रोवे,
भाग्य रो खेल समझायो'

ये उसका कितना गहरा दुख है कि घोड़ा तो लड़ाई के मैदान से लौट आया पर इसपे सवार होकर गया उसका सांवरिया वहीं कहीं रह गया. अब सब सूना है. इसी तरह पंजाब के इतिहास से निकले युद्ध और इससे जुड़े गीत भी अपना दर्द बयां करते हैं. 

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'साडा चन्न वे सरहद चाला,
रातां रो-रो लंघियां,
असां वेखदे राहां सारी,
कद घर मोड़ मुड़ आया.

इन गीतों में युद्ध का जिक्र कम और उससे पैदा हुआ अकेलेपन का डर अधिक है. रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम युद्ध में गए अपने पतियों का इंतजार करती औरतों के इंतजार को समय का सबसे लंबा इंतजार कहा है, क्योंकि पता नहीं इस इंतजार का कुछ हल या फल है भी कि नहीं. ---

इस मामले में पहाड़ भी कम नहीं हैं. कान लगाकर ध्यान से सुनेंगे तो इन ऊंचे पर्वतों में भावनाएं इतनी गहरी हैं कि आपके भीतर नदियां बह सकती हैं. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों से बड़ी संख्या में लोग सेना में जाते हैं. इसलिए यहां के लोकगीतों में सैनिक जीवन का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है. शिक्षाविद देवेश जोशी अपनी किताब के एक लेख में जिक्र करते हैं कि पहाड़ को प्रथम विश्व युद्ध ने बहुत गीत दिए हैं. 

इस गीत की बानगी देखिए....
सात समोदर पार च जाण ब्वे जाज मा जौंलू कि ना
जिकुड़ी उदास ब्वे जिकुड़ी उदास

लाम मा जाण जरमन फ्रांस
कनुकैकि जौंलू मि जरमन फ्रांस ब्वे जाज मा जौंलू कि ना.
सात समोदर पार….

इसका भाव कुछ ऐसा है कि सात समंदर पार जाना है, पता नहीं जहाज़ से जा पाऊंगा या नहीं. दिलं बहुत उदास है. लड़ाई के लिए जर्मनी और फ्रांस जाना है. लेकिन दिल नहीं है. मन नहीं है. सात समंदर पार कैसे जाऊंगा.

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एक कुमाऊंनी लोकगीत कहता है—
“ओ भिना तू मत जा सरहद,
बर्फीली रात डरारे।
मां की आंखन रोवैं दिन-रैन,
बहना द्वार सजारे”

उत्तराखंड में शिक्षाविद देवेश जोशी इस गीत के बारे में अपने एक आर्टिकल में बताते हैं कि ये गीत प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उपजा था. तब बड़े पैमाने पर गढ़वाली नौजवानों की सेना में भर्ती हुई थी. गीत किसने लिखा इसका अता-पता नहीं है, लेकिन ये 110 साल पहले के उन डरावने चार सालों का ऐसा ब्योरा है जो आज भी आंखों में पानी ला देता है. 

ये गीत कहता है कि 'सात समोदर पार च जाण ब्वे, जाज मा जौंलू कि ना.' यानी न जहाज में जाने की खुशी है और न विदेश की धरती देखने का कौतूहल. है तो बस अपने घर-परिवार-गांव से बिछुड़ने का गम और दुख और दोबारा लौट आने य न आ पाने की अनिश्चितता. 

भारतीय लोकभाषाओं में रचे गए युद्ध से जुड़े लोकगीत हमें यह समझने का मौका  देते हैं कि युद्ध केवल राजनीतिक या सैन्य घटना नहीं है. वह समाज के भीतर गहरी भावनात्मक हलचल पैदा करता है. इन गीतों में मां की आंखों के आंसू हैं, पत्नी की अंतहीन प्रतीक्षा है, बहन की प्रार्थना है और पूरे गांव का सामूहिक दुख है. यही कारण है कि लोकगीतों में युद्ध की चर्चा अक्सर वीरता से अधिक मानवीय पीड़ा के रूप में सामने आती है.

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युद्ध में किसने क्या हारा, ये बताते हैं लोकगीत
लोकगीत हमें यह भी सिखाते हैं कि इतिहास केवल राजाओं और सेनाओं की कहानी नहीं है। वह उन साधारण लोगों की भी कहानी है जो युद्ध की असली कीमत चुकाते हैं. और शायद इसी कारण जब भी कोई युद्ध होता है, उसके बाद कहीं न कहीं कोई नया लोकगीत जन्म लेता है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह बताता है कि युद्ध में जीता भले ही कोई था, लेकिन असल में हारा कौन था?  आज मिडिल ईस्ट में जारी जंग ने इस दुख-दर्द को फिर से हरा कर दिया है.

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