प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजधानी दिल्ली में शनिवार को पवित्र पिपराहवा अवशेष से जुड़ी एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने जा रहे हैं. पीएम मोदी ने इसे लेकर X पर एक पोस्ट में जानकारी दी है. Lotus Light: Relics of the Awakened One' नाम से आयोजित होने वाली यह प्रदर्शनी पवित्र पिपराहवा अवशेषों के साथ इससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण प्राचीन वस्तुओं को भी सामने रखेगी. यह प्रदर्शनी राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स में आयोजित हो रही है.
प्रदर्शनी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के साथ भारत में बौद्ध परंपरा और इसकी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने और सामने लाने की प्रक्रिया है. यह प्रदर्शनी सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर महत्वपूर्ण है ही, इसके अलावा यह समय की अनमोल विरासत भी है. बता दें कि पिपरहवा के पवित्र बौद्ध अवशेष बीते साल 30 जुलाई, 2025 को 127 वर्षों के बाद वापस भारत लौटे हैं. इससे पहले ये ब्रिटेन के पास थे.

1898 में उत्तर प्रदेश में पिपरहवा स्तूप के पास मिले थे अवशेष
पिपराहवा अवशेष पवित्र कलाकृतियों का एक संग्रह है, जो 1898 में उत्तर प्रदेश में पिपरहवा स्तूप के पास से मिली थीं. ऐसा माना जाता है कि यह स्थल भगवान गौतम बुद्ध की जन्मभूमि कपिलवस्तु से जुड़ा है. इन पवित्र अवशेषों को ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने खोजा था, जिनमें अस्थियों के टुकड़े भी शामिल हैं. माना जाता है कि ये पवित्र अस्थियां भगवान बुद्ध की हैं. इनके अलावा यहां मिलने वाले वस्तुओं में क्रिस्टल की पेटियां, सोने के आभूषण,रत्न और बलुआ पत्थर का एक खूबसूरत बॉक्स भी शामिल है.
इस बॉक्स पर ब्राह्मी लिपि में संदेश दर्ज है, जो इन अवशेषों को प्राचीन शाक्य वंश से जोड़ता है. शाक्य वही वंश है, जिससे महात्मा बुद्ध का जुड़ाव माना जाता है. इससे यह पता चलता है कि ये अवशेष उनके अनुयायियों ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आसपास संजोए गए थे. इस तरह ये अवशेष ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और पुरातात्विक संदर्भ में भारत को बौद्ध धर्म की जन्मभूमि के रूप में इसके महत्त्व को दर्शाते हैं.
हॉगकांग में नीलामी के लिए रखे गए थे अवशेष, संस्कृति मंत्रालय ने बचाया
बता दें कि पवित्र पिपरहवा अवशेष के कुछ हिस्से ब्रिटिश अधिकारी पेप्पे के परिवार के पास निजी रूप से थे. वर्षों तक ये निजी संग्रह में रहे और 2025 में ये अवशेष अचानक हांगकांग में Sotheby’s नीलामी में सामने आए, जिसे देख कर भारत सरकार सतर्क हुई. चूंकि ये अवशेष भारत के कानून के अनुसार ‘AA’ श्रेणी की प्राचीन धरोहर हैं, इन्हें बेचना या भारत से बाहर ले जाना गैरकानूनी है ऐसे में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए तुरंत हस्तक्षेप किया. कूटनीतिक और कानूनी प्रयासों से भारत ने नीलामी को रुकवाया और अवशेषों को सुरक्षित वापस लाया गया.
पिपरहवा का महत्व क्यों अधिक है?
पिपरहवा को प्राचीन कपिलवस्तु, शाक्य गणराज्य की राजधानी, से जोड़ा जाता है जहां सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) ने अपने जीवन के पहले 29 वर्ष बिताए थे. एक रेलिक्वेरी पर ब्राह्मी लिपि में लेख इसकी पुष्टि करता है कि ये अवशेष शाक्य कबीले द्वारा बुद्ध के सम्मान में भूमि विसर्जित हुए थे. बौद्ध धर्म में ये रत्न एवं अवशेष भगवान बुद्ध के शारीरिक अवशेषों के समान पवित्र हैं. इन्हें स्तूपों में रखा गया था ताकि बौद्ध अनुयायी इनकी पूजा कर सकें.
विश्व के 50 करोड़ से अधिक बौद्धों के लिए ये रत्न शांति, करुणा एवं बुद्ध की शिक्षाओं का प्रतीक हैं. इनका फिर से भारत में आना भारत को बौद्ध धर्म के जन्मस्थान के रूप में फिर से स्थापित करता है. पिपरहवा की खोज को पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक माना जाता है क्योंकि यह बुद्ध के जीवन और शाक्य कबीले के इतिहास से सीधा संबंध रखता है. इन रत्नों का भारत वापस आना भारत की बौद्ध विरासत को बढ़ावा देने और चीन जैसे देशों के साथ सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति को मजबूत करने का एक कदम है.