मदुरै दक्षिण भारत की एक प्राचीन पहाड़ी इन दिनों सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि विवाद का नया मैदान बन चुकी है. मदुरै की थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी को भगवान मुरुगन के दक्षिण दिशा के पहले निवास के तौर पर जाना जाता है. भगवान मुरुगन उत्तर भारत में कार्तिकेय नाम से जाने जाते हैं. उनके इस पवित्र स्थल पर बहुत प्राचीन काल से दीपक जलाने की परंपरा चला आ रही है.
कार्तिक मास में पूरे महीने और खास तौर पर कार्तिक पूर्णिमा की रात को दीप जलाए जाते हैं. इस तरह जैसे उत्तर भारत दीपावली की रात में दीयों की रौशनी से जगमगा उठता है, मदुरै शहर में मौजूद ये प्राचीन पौराणिक महत्व की पहाड़ी भी रोशन हो जाती है. इस त्योहार और परंपरा को कार्तिगयी कहा जाता है. कार्तिगयी का अर्थ हुआ कार्तिक में की जाने वाली रोशनी.
यही कार्तिकेय दीपम अब विवाद का कारण बन चुका है. विवाद की शुरुआत इस सवाल से हुई कि दीप कहां जलना चाहिए? और यह सवाल अब धार्मिक, सांस्कृतिक के साथ राजनीतिक भी बन चुका है. सवाल ये है कि इस पहाड़ी का सबसे पुराना इतिहास क्या कहता है? दीपम की परंपरा कैसे शुरू हुई है और मौजूदा विवाद में ऐतिहासिक तथ्य क्या हैं?
तो कहानी यहां से शुरू होती है...
तमिल और तेलुगू साहित्य में कार्तिगयी दीपम की परंपरा का वर्णन है. पौराणिक कथाओं में इसका विस्तार से जिक्र किया गया है. स्कंद पुराण समेत तमिल के आगम शास्त्र में भी एक असुर 'सुरपद्मन' का जिक्र आता है. जब कार्तिकेय नाराज होकर कैलास चले आए तब उन्होंने दक्षिण दिशा में अपना निवास बनाया. मदुरै (तमिलनाडु) में तिरुपरंकुंद्रम मुरुगन मंदिर उसी निवास का प्रतीक है, जिसे सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर भी कहा जाता है. सुब्रमण्य स्वामी कार्तिकेय का ही एक नाम है. याद रहे कि दक्षिण में उनको मुरुगन भी कहते हैं.
रॉक-कट वास्तुकला में बना है मंदिर
भगवान मुरुगन के यहां छह आवास माने जाते हैं, इन्हें 'अरुपदई वीडु' कहा जाता है. तिरुपरंकुंद्रम इनमें से एक है. यहां मुख्य आराध्य भगवान मुरुगन हैं, जिनके साथ उनकी दोनों पत्नियां वल्ली और देवयानी विराजमान हैं. यह मंदिर रॉक-कट वास्तुकला में बना हुआ है. इसका निर्माण छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा कराया गया था.

एक असुर का वध और भगवान मुरुगन के विवाह की कहानी
पौराणिक मान्यता के अनुसार, यही वह स्थान है जहां भगवान मुरुगन ने असुर सुरपद्मन का वध किया और स्वर्ग के राजा इंद्र की बेटी देवयानी से विवाह किया. ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान मुरुगन ने यहां परंगिरीनाथर के रूप में भगवान शिव की उपासना की थी. इस मंदिर में माता पार्वती को ‘आवुदै नायकी’ के नाम से पूजा जाता है. चट्टान को काटकर बनाए गए इस मंदिर में भगवान शिव, भगवान विष्णु, देवी दुर्गा, भगवान विनायक (गणेश) सहित अन्य प्रमुख हिंदू देवताओं के अलग-अलग गर्भगृह हैं.
ऐतिहासिक नजरिये से भी यह मंदिर खास है और इसकी एक पहचान है कि यहां भगवान शिव और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं आमने-सामने हैं, जो किसी हिंदू मंदिर में दुर्लभ मानी जाती हैं. इसके अलावा, इस मंदिर से सूर्य और चंद्रमा का एक साथ दर्शन होना भी श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख आकर्षण है. इसी मंदिर में कार्तिगयी का त्योहार मनाया जाता है. यह त्यौहार कार्तिक के महीने में मनाया जाता है, इसीलिए इसे कार्तिगई दीपम कहा जाता है. यह त्यौहार उस दिन आता है जब चंद्रमा और पूर्णिमा का संयोग कार्तिगई से मेल खाता है और यह संयोग छह नक्षत्रों के रूप में दिखाई देता है.
भगवान कार्तिकेय के जन्म की कहानी से जुड़ाव
छह नक्षत्रों के बारे में कई कहानियां और कविताएं संगम साहित्य में दर्ज हैं. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह छह नक्षत्र असल में छह आकाशीय देवियां हैं, जिन्होंने छह शिशुओं को पाला था. यही छह शिशु एक में मिलकर कार्तिकेय बने. इसलिए पौराणिक ग्रंथों और संस्कृत साहित्य में कार्तिकेय को षडानन कहा जाता है, क्योंकि उनके छह मुख माने जाते हैं. यह षडानन भगवान शिव के प्रथम पुत्र कार्तिकेय के रूप में जाने जाते हैं.
तमिल में मान्यता है कि भगवान शिव ने मुरुगन को अपनी तीसरी आंख से बनाया था. इसलिए वह रुद्रांश हैं. शिव के जिन छह तत्वों और नक्षत्रों से उनका जन्म हुआ, उनके नाम हैं, तत्पुरूष, अघोरम्, सद्योजातम, वामदेव, ईशान और अधोमुखम. भगवान मुरुगन को इन छह नामों से भी जाना जाता है. इसलिए, इन छः नक्षत्रों की पूजा करने की परंपरा तमिल और तेलुगू दोनों लोगों में हैं. कार्तिक के महीने में भगवान मुरुगन् कार्तिकेय का जन्म हुआ था और इस महीने का नाम उनके ही नाम पर पड़ा है. कृत्तिका नक्षत्र के साथ संयोग होने पर छह-छह की सीरीज में दीप जलाकर सजाए जाते हैं.
इस पूजा के दिन, भक्त घर के आंगन में एक दीपक जलाते हैं, इसी दिन को ही कार्तिगई दीपम और भगवान मुरुगन जयंती के रूप में भी जाना जाता है. थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी इस खास पर्व और उत्सव का केंद्र बन जाती है.
2300 साल से भी अधिक पुराना इतिहास
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार तिरुपरंकुंद्रम कोई मध्यकालीन स्थल नहीं है, बल्कि उससे भी प्राचीन है. यहां मिले तमिल-ब्रह्मी अभिलेख, जैन शय्या (Jain beds)और चट्टानों पर खुदे लेख इस पहाड़ी स्थल को प्राचीनता के पैमाने पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक ले जाते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार केए नीलकंठ शास्त्री अपनी पुस्तक 'A History of South India' में बताते हैं कि मदुरै और उसके आसपास की पहाड़ियां संगम काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रही हैं. तिरुपरंकुंद्रम भी इसी परंपरा का हिस्सा रहा है.
संगम साहित्य में तिरुपरंकुंद्रम
तमिल संगम साहित्य में भगवान मुरुगन को तमिल भूमि का मूल देवता माना गया है. ग्रंथ 'तिरुमुरुगात्रुप्पड़ै (Tirumurugatrupadai)' जिसे संगम साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है में तिरुपरंकुंद्रम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. इस ग्रंथ में मुरुगन के जिन छह पवित्र स्थलों का वर्णन है, उनमें 'तिरुपरंकुंद्रम को पहला और प्रमुख स्थान' प्राप्त है. यही वजह है कि इसे 'अरुपदई वीडु' (मुरुगन के छह निवास) में पहला माना जाता है.

हिंदू पौराणिक परंपरा के अनुसार, 'सुरपद्मन' नाम के असुर के वध के बाद भगवान मुरुगन ने 'देवेंद्र की पुत्री देइवनाई' (हिंदी में देवयानी) से विवाह किया था. यह विवाह तिरुपरंकुंद्रम में संपन्न हुआ, ऐसा स्कंद पुराण और तमिल धार्मिक परंपराएं बताती हैं. यही कारण है कि यह स्थल केवल युद्ध-विजय का नहीं, बल्कि 'गृहस्थ जीवन के आरंभ' का भी प्रतीक माना जाता है. आज भी यहां मुरुगन को 'कल्याण सुब्रमण्य' के रूप में पूजा जाता है. तमिल में कल्याण शब्द विवाह से जुड़ा हुआ है.
हिंदु-मुस्लिम के साथ जैन परंपरा का भी आश्रय स्थल
तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित 'रॉक-कट केव मंदिर' 6वीं से 13वीं शताब्दी के बीच विकसित हुआ. यहां पांड्य राजाओं के काल के कई शिलालेख मिले हैं, जिनमें मंदिर निर्माण, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख है. पुरातत्व सर्वेक्षणों के अनुसार, पहाड़ी के कुछ हिस्सों में 'जैन परंपरा के संकेत' भी मिलते हैं. इससे साफ पता चलता है कि मदुरै से 10 किमी दूर का यह स्थान कई परंपराओं और संस्कृतियों का आश्रय स्थल बनकर रहा है.
क्यों जलाया जाता है कार्तिकेय (कार्तिगयी) दीपम
तमिल परंपरा में 'कार्तिगई दीपम' प्रकाश, ज्ञान और शिव-तत्व का प्रतीक है. यह पर्व उस पौराणिक कथा से भी जुड़ा है, जब शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे. आमतौर पर तिरुपरंकुंद्रम में दीप 'उचिपिल्लैयार मंडपम' के पास जलाया जाता रहा है, जिसे मंदिर प्रशासन और स्थानीय परंपरा मान्यता देती है.
दीपथून विवाद कहां से आया?
जिस पत्थर स्तंभ पर दीप जलाने की मांग हो रही है, उसे लेकर इतिहासकारों में एक राय नहीं है. कुछ पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तंभ 'परंपरागत हिंदू दीप स्तंभ नहीं' है. संभव है कि यह जैन परंपरा से जुड़ा रहा हो या फिर पुराने समय में किसी संरचना के बचे हिस्से के तौर पर सुरक्षित रहा हो.
दरगाह विवाद की एंट्री कहां से हुई?
तिरुपरंकुंद्रम हिल को लेकर पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि यह स्थल सनातन परंपराओं का केंद्र रहा है. पहाड़ी के नीचे स्थित मंदिर में वार्षिक कार्तिगई दीपम उत्सव मनाया जाता है, जो तमिल हिंदू संस्कृति का अभिन्न अंग है. पहाड़ी के शिखर पर एक प्राचीन स्तंभ (पिलर) है, जिसे हिंदू कोडिमरम (ध्वजस्तंभ) मानते हैं. यह स्तंभ 16 फीट ऊंचा है और पुरातत्वविदों के अनुसार, यह 10वीं शताब्दी का चोल कालीन अवशेष है.

हिंदू दावे के मुताबिक, यह स्तंभ मुरुगन मंदिर का हिस्सा था, जहां प्राचीन काल में दीपक जलाया जाता था. 13वीं सदी के दौरान इस पहाड़ी पर दरगाह का इतिहास शुरू होता है. असल में साल 1335 में दिल्ली सल्तनत से अलग होकर जलालुद्दीन अहसान खान ने मदुरै सल्तनत की स्थापना की थी, जिसे माबार सल्तनत कहा गया. इस सल्तनता का दौर बेहद कम रहा और लगभग 45 साल 8 शाह इस सल्तनत पर काबिज रहे. अला-उद-दीन सिकंदर शाह इस सल्तनत का आठवां और अंतिम सुल्तान था. 1378 में, विजयनगर साम्राज्य के कुमार कप्पना ने मदुरै पर आक्रमण किया जिसमें सिकंदर शाह युद्ध में मारे गए, जिसके बाद मदुरै सल्तनत का पतन हो गया और विजयनगर साम्राज्य का विस्तार हुआ.
किसकी दरगाह है यहां?
इसके बाद इसी पहाड़ी पर राज की इजाजत से ही, पहाड़ी पर दरगाह बनाई गई और तब से 'सिकंदर बादुशा दरगाह' मदुरै की एक पहचान बन गयी. इस पहाड़ी को बीते कुछ दशकों पहले तक हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के तौर पर देखा जाता था. क्योंकि, कई हिंदू भी दरगाह पर जाकर धागा बांधते थे और कई मॉडरेट मुस्लिम पहाड़ी के नीचे स्थित मंदिर के दर्शन करते रहे हैं, लेकिन, अब दावा इस दरगाह के पास स्थित स्तंभ को लेकर है कि वह कभी किसी दौर में उच्चैपिल्लैयार मंदिर का हिस्सा रहा है उसका ही दीपथून (दीप स्तंभ) था, जहां कार्तिगयी के दौरान दीप जलाए जाते थे.