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यूं ही नहीं हुई ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’, पीछे है 2000 साल पुरानी विरासत

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ समझौता केवल टैरिफ या सप्लाई चेन तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों पुराने भारत-यूरोप व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों की निरंतरता को दर्शाता है. इस ऐतिहासिक डील के पीछे भारत और यूरोप के बीच दो हजार साल पुराना व्यापारिक संबंध भी है.

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भारत और यूरोप के बीच व्यापार का बहुत पुराना इतिहास रहा है
भारत और यूरोप के बीच व्यापार का बहुत पुराना इतिहास रहा है

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच जिस व्यापार समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है, उस पर मुहर लगने के साथ ही दुनिया की करीब 'दो अरब आबादी' से जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रिश्ते और गहरे हो गए हैं. यह डील केवल टैरिफ, मार्केट एक्सेस या सप्लाई चेन तक सीमित नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक संबंध की नई कड़ी है, जिसकी जड़ें दो हजार साल पुराने भारत–यूरोप व्यापार में छिपी हैं. मसालों से शुरू हुई यह यात्रा रेशम, वस्त्र, कांच, शिल्प और स्थापत्य तक पहुंची और इसी व्यापार ने दोनों सभ्यताओं की कला और संस्कृति को स्थायी रूप से प्रभावित किया.

भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध
भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंधों की शुरुआत ईसा की शुरुआती सदियों में ही हो गई थी. 30 ईसा पूर्व में मिस्र पर रोमन साम्राज्य के अधिकार के बाद भारतीय तटों और रोमन भूमध्यसागर के बीच समुद्री व्यापार तेज हुआ. केरल का मुजिरिस, तमिलनाडु का अरिकामेडु और गुजरात का भरूच उस दौर के बड़े अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह थे. भारत से मसाले, सूती वस्त्र, रेशम और कीमती पत्थर यूरोप जाते थे, जबकि बदले में सोना, चांदी और कांच भारत पहुंचता था. अरिकामेडु की खुदाइयों में मिले रोमन कांच के बर्तन इस व्यापारिक संपर्क के ठोस प्रमाण हैं.

Vasco Da Gama

मसालों से रेशम तक
यूरोप से सीधे-सीधे तौर पर कनेक्शन जुड़ने से पहले पहले भारत और यूरोप अरब और फारसी व्यापारियों के जरिये जुड़े रहे. मध्य एशिया और अरब सागर से गुजरने वाले रास्तों से सिर्फ वस्तुओं का व्यापार नहीं हुआ, बल्कि विचारों और कला की शेयरिंग भी हुई. इसी दौर में भारतीय रेशम और रंगाई तकनीक यूरोपीय दरबारों तक पहुंची. बनारसी, कांचीपुरम और कश्मीरी रेशम फारसी मार्गों से इटली और फ्रांस पहुंचे, जिसने बाद में फ्लोरेंस, वेनिस और ल्योन जैसे यूरोपीय सिल्क सेंटर्स के विकास पर असर डाला.

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यूरोपियन आर्किटेक्ट और ईसाई कला का भारत आना
भारत–यूरोप संबंधों में निर्णायक मोड़ साल 1498 को आया, जब पुर्तगाली नाविक वास्को-डि-गामा कालीकट पहुंचा. इसके साथ ही यूरोप से सीधे तौर पर समुद्री व्यापार शुरू हुआ. पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव में अपने सेंटर्स बनाए. व्यापार के साथ-साथ यूरोपीय आर्किटेक्चर और ईसाई कला भारत में आई. गोवा की बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस (1605) इसका उदाहरण है, जहां बारोक शैली, विशाल मेहराब और रंगीन कांच दिखाई देता है.

17वीं सदी में व्यापार ऑर्गनाइजेशन जैसे तौर-तरीकों में ढल चुका था. 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, 1602 में डच VOC (Verenigde Oostindische Compagnie) और 1664 में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई. इतिहासकार और लेखक कीर्ति एन चौधरी अपनी किताब Trade and Civilisation in the Indian Ocean में दर्ज करते हैं कि सूरत, मद्रास और बॉम्बे (मुंबई) जैसे शहर ग्लोबल ट्रेड के सेंटर बने. इस दौर में भारतीय सूती वस्त्र खासतौर पर चिंट्स और कैलिको यूरोप में इतने लोकप्रिय हुए कि ब्रिटेन को 1700 और 1721 में ‘कैलिको एक्ट’ लागू कर इनके आयात पर रोक लगानी पड़ी. इन कपड़ों ने यूरोपीय फैशन, इंटीरियर डिज़ाइन और सजावटी कला की दिशा बदल दी.

19वीं सदी में भारत की औपनिवेशिक वास्तुकला में यूरोपीय सामग्री और तकनीकों का प्रभाव और गहरा हुआ. इसी दौर में 'बेल्जियम कांच' भारत पहुंचा. बेल्जियम के Val Saint-Lambert और Charleroi के रंगीन कांच का इस्तेमाल रेलवे स्टेशनों, महलों और शैक्षणिक संस्थानों में हुआ. मुंबई का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, मैसूर पैलेस और लखनऊ का ला मार्टिनियर कॉलेज इसके प्रमुख उदाहरण हैं. इस कांच ने भारतीय इमारतों में प्रकाश और रंग की नई सौंदर्य भाषा गढ़ी. हिस्टोरियन फिलिप डेविस की बुक Splendours of the Raj: British Architecture in India में इसका जिक्र मिलता है. 

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यही वो समय था जब इंडो-सारसेनिक वास्तुकला उभरी, जिसमें यूरोपीय गोथिक और नियो क्लासिक एलिमेंट का मेल भारतीय-इस्लामिक शैली से हुआ. एफडब्ल्यू स्टीवेंस और रॉबर्ट चिशोल्म जैसे आर्किटेक्ट्स ने ऐसी इमारतें डिज़ाइन कीं, जो व्यापार, सत्ता और सांस्कृतिक संवाद तीनों की साझा अभिव्यक्ति बन गईं.

India EU Deal

यूरोपीय कनेक्शन का असर भारतीय शिल्प और चित्रकला पर भी पड़ा. कंपनी स्कूल ऑफ पेंटिंग में सेवक राम और गुलाम अली ख़ान जैसे कलाकारों ने भारतीय विषयों को यूरोपीय यथार्थवाद के साथ पेंट किया. फर्नीचर और मेटल शिल्प में इंडो-पुर्तगाली शैली विकसित हुई, जहां यूरोपीय डिज़ाइन और भारतीय नक्काशी का मेल दिखाई देता है.

भारत-EU डील की 2000 साल पुरानी विरासत
आज जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच नई व्यापार डील को ऐतिहासिक बताया जा रहा है, तो उसके पीछे यही लंबी विरासत खड़ी है. 1962 में भारत और यूरोपीय आर्थिक समुदाय के बीच औपचारिक संबंध बने, 2007 में FTA वार्ता शुरू हुई और अब इस समझौते पर सहमति बनी है. यह डील सिर्फ अर्थव्यवस्था को नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक रिश्ते को भी आगे बढ़ाती है, जिसने सदियों से दोनों सभ्यताओं को जोड़े रखा है.

इस तरह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ केवल भविष्य का आर्थिक रोडमैप नहीं है, बल्कि अतीत से वर्तमान तक फैले भारत–यूरोप संबंधों की निरंतरता का प्रतीक है, जहां व्यापार ने हमेशा संस्कृति, कला और विचारों की शेयरिंग के लिए एक गलियारा बनाया है और नए रास्ते खोले हैं.

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