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100 साल की हुई ओलचिकी लिपि, राष्ट्रपति ने बताया संथाली पहचान की प्रतीक

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओल चिकी लिपि को संथाली भाषा और समुदाय की पहचान का एक शक्तिशाली प्रतीक बताया. उन्होंने इस शताब्दी पुरानी लिपि के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया.

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राष्ट्रपति ने किया संस्कृति मंत्रालय की ओर से आयोजित ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन
राष्ट्रपति ने किया संस्कृति मंत्रालय की ओर से आयोजित ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को ओल चिकी लिपि को संथाली पहचान का 'शक्तिशाली प्रतीक' बताते हुए कहा कि इस शताब्दी पुरानी लिपि के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए. ओल चिकी लिपि की शताब्दी वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने खुशी जताई. उन्होंने कहा कि अच्छी बात ये है कि यह लिपि डिजिटल मीडियम में भी तेजी से विस्तार पा रही है.

साल 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का सृजन किया था. तब से यह लिपि संथाली भाषा के लिए प्रयोग में लाई जा रही है और आज यह विश्वभर में संथाल समुदाय की पहचान का एक सशक्त प्रतीक बन चुकी है. साल 2003 में संथाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इस भाषा और इसकी लिपि को संवैधानिक मान्यता मिली.

अपने संबोधन में राष्ट्रपति मुर्मू ने भारत को 'अनेक भाषाओं का एक उद्यान' बताया और कहा कि मातृभाषा में संवाद करना और शिक्षा प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि किसी अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ अपनी मातृभाषा संथाली को ओल चिकी लिपि में सीखना समुदाय के समग्र विकास के लिए जरूरी है.

इस कार्यक्रम का आयोजन नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के भीम हॉल में किया गया. कार्यक्रम स्थल पर सैन्य बैंड ने राष्ट्रपति का स्वागत किया. बैंड ने सबसे पहले राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की प्रस्तुति दी. कार्यक्रम के दौरान लोक कलाकारों के एक समूह ने संथाली भाषा में गीत प्रस्तुत किए. इसके बाद संथाली नृत्य दल ने प्रकृति और भारत की सांस्कृतिक विविधता को समर्पित एक विशेष प्रस्तुति दी. ओल चिकी लिपि की उत्पत्ति और विकास पर आधारित एक लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई.

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इस अवसर पर ओल चिकी लिपि पर आधारित एक विशेष डाक टिकट, 100 रुपये का स्मारक सिक्का और एक स्मारिका भी जारी की गई. राष्ट्रपति मुर्मू ने उन व्यक्तियों को सम्मानित भी किया, जिन्होंने ओल चिकी लिपि के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया है. राष्ट्रपति ने कहा, “1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया. तब से यह संथाली भाषा के लिए उपयोग में लाई जा रही है. आज यह लिपि विश्वभर में संथाल पहचान का एक सशक्त प्रतीक है. यह संथाल समुदाय में एकता को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम भी है.”

बता दें कि 29 दिसंबर पिछले वर्ष राष्ट्रपति मुर्मू ने झारखंड के जमशेदपुर में भी ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह में भाग लिया था. उस अवसर पर उन्होंने कहा था कि अन्य भाषाओं के साथ-साथ मातृभाषा संथाली को ओल चिकी लिपि में सीखना समुदाय के समग्र विकास के लिए बेहद जरूरी है.

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