हिंदी साहित्य में कहानियों की बात होती है तो मूर्धन्य साहित्यकार प्रेमचंद की लिखी कहानियां सबसे ऊपर नजर आती हैं. इन कहानियों में मानवीय आचरण जिस सरलता और सहजता से शामिल है, वह इसे आज के टेक्नोएरा में भी प्रासंगिक बनाए रखता है. उनकी तमाम कहानियां किताबों के पन्नों से निकलकर नाटकों में बदलीं और मंच पर नजर आ चुकी हैं. इन नाटकों का दर्शक वर्ग भी इसीलिए बड़ा है क्योंकि प्रेमचंद की कहानियों ने लोगों के अंतस को छुआ है और वह उन्हें हर दौर में ही गांव, खेत, खलिहान, घर और गली की याद दिलाते हैं.
प्रेमचंद की कफन, गोदान, नमक का दरोगा, गबन जैसी कहानियों के नाट्य रूपांतरण अमर हैं और इसी कड़ी में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की थिएटर-इन-एजुकेशन कंपनी (संस्कार रंग टोली) ने प्रेमचंद की कहानियों को एक नए कलेवर में सामने रखा है. उन्होंने प्रेमचंद की चार कहानियों को मिलाकर एक साथ लाते हुए उसे नया नाम दिया ‘प्रेमचंद की लड़कियां’ और मंच को उन अमर कथाओं के किरदारों से सजा दिया.
संडे क्लब थिएटर फेस्टिवल (पार्ट-III) के तहत मंचित यह प्रस्तुति NSD के अभिमंच थियेटर में इस गुरुवार-शुक्रवार को प्रदर्शित की गई. 15–19 वर्ष के कलाकारों द्वारा तैयार यह नाटक साहित्य, समाज और रंगमंच के बीच एक सशक्त संवाद रचता है. मुंशी प्रेमचंद की चर्चित कहानियों ‘बड़े घर की बेटी’, ‘कफ़न’, ‘दूध का दाम’ और ‘कायर’ पर आधारित इस नाट्य रूपांतरण में स्त्री जीवन की चुप्पी, पीड़ाएं, सामाजिक असमानता, पितृसत्ता और नैतिक पाखंड को केंद्र में रखा गया है.
नाटक यह सवाल उठाता है कि किस तरह समाज खुद अन्याय का सहभागी बन जाता है और परंपरा, गरीबी व सत्ता संरचनाएं उत्पीड़न को लगातार जन्म देती हैं.

युवा कलाकारों के जरिए प्रेमचंद की दुनिया
प्रस्तुति का निर्देशन जयंत राभा ने किया है, जो 2018 से एनएसडी की संस्कार रंग टोली से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि किशोर कलाकारों के साथ काम करना चुनौतीपूर्ण जरूर रहा, लेकिन उतना ही संतोषजनक भी. निर्देशक के अनुसार, नाटक का उद्देश्य युवा कलाकारों को प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि से जोड़ना था, ताकि वे साहित्य के जरिए आज की सामाजिक सच्चाइयों को समझ सकें, खासकर स्त्रियों की स्थिति को.
चार कहानियां, एक भावनात्मक सूत्र
नाटक के रूपांतरण और सह-निर्देशन की जिम्मेदारी अमित के. कुशवाहा ने संभाली है. उनका कहना है कि चार अलग-अलग कहानियों को एक मंचीय अनुभव में पिरोना आसान नहीं था. कोशिश यह रही कि हर कहानी की आत्मा, उसका सामाजिक संदर्भ और वैचारिक पक्ष सुरक्षित रहे, लेकिन मंच पर वे अलग-अलग खंडों की तरह न दिखें. इसके लिए स्त्री पीड़ा, गरीबी, नैतिक संघर्ष और सामाजिक अन्याय को एक साझा भावनात्मक सूत्र के रूप में विकसित किया गया.
संगीत, मंच और अभिनय का सामूहिक प्रयास
नाटक का संगीत देवेंद्र अहिरवार ने तैयार किया है, जो मंच के साथ-साथ सिनेमा में भी सक्रिय हैं. अभिनय प्रशिक्षण और सेट डिजाइन परमानंद ने संभाला है. कोरियोग्राफी राकेश कुमार और प्रकाश परिकल्पना सरस कुमार की है. मंच पर बुधिया, प्रेमा, आनंदी, गंगी जैसी प्रेमचंद की स्त्री पात्रों को युवा कलाकारों ने जीवंत किया है. नाटक में अभिनय के साथ-साथ समूह नृत्य और गायन का भी प्रभावी प्रयोग किया गया है, जो प्रस्तुति को समकालीन संवेदना से जोड़ता है.

आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचंद
‘प्रेमचंद की लड़कियां’ यह रेखांकित करता है कि प्रेमचंद की कहानियां सिर्फ अतीत की तस्वीर नहीं हैं. जिन सवालों को उन्होंने दशकों पहले उठाया था, वे आज भी कई इलाकों और समाजों में मौजूद हैं. नाटक में स्त्रियों की चुप्पी को सामूहिक आवाज़ में बदलने की कोशिश दिखाई देती है, जहां गरिमा ही प्रतिरोध बन जाती है.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की यह प्रस्तुति न सिर्फ साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है, बल्कि यह भी दिखाती है कि रंगमंच आज भी सामाजिक बदलाव का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है.