अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. अमेरिका का दावा है कि दोनों देशों के बीच हुए इस समझौते के मसौदे को जानबूझकर बहुत व्यापक और धुंधला रखा गया है.
CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते को क्लियर न रखने का असल मकसद ईरान और अमेरिका के विवादों को तुरंत सुलझाना नहीं, बल्कि भविष्य की बातचीत का रास्ता आसान बनाना है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने इस दस्तावेज को 'अविश्वसनीय रूप से अस्पष्ट' बताया है. उनका कहना है कि इस टेक्स्ट को इस तरह इसलिए तैयार किया गया है ताकि आने वाली तकनीकी वार्ताओं के लिए एक बेहतर और पॉजिटिव माहौल बनाया जा सके.
'बैक-चैनल वादों का जिक्र नहीं'
समझौते की अस्पष्ट भाषा से ईरान को भी फायदा होगा. वो इस समझौते को अपने देश की जनता के सामने बेहतर तरीके से पेश कर सकेगा. मामले से जुड़े एक अधिकारी ने साफ शब्दों में कहा, 'लोगों को इस MoU की भाषा को बहुत ज्यादा गहराई से नहीं समझना चाहिए.'
उन्होंने इसे सिर्फ एक 'राजनीतिक दस्तावेज' करार दिया. अधिकारी का दावा है कि इस दस्तावेज से कहीं ज्यादा अहम वो आपसी समझ है, जो दोनों देशों के बीच बनी है. इस लिखित टेक्स्ट में ईरान की ओर से बैक-चैनल से किए गए उन वादों का जिक्र नहीं है, जो उसने अमेरिका से किए हैं.
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भविष्य की बातचीत पर टिके हैं बड़े फैसले
अमेरिका का कहना है कि प्रतिबंधों में ढील, परमाणु समझौता और फ्रीज किए गए फंड तक पहुंच जैसे बड़े मुद्दे इस MoU के तहत तुरंत लागू नहीं होंगे. ये सभी संवेदनशील मामले भविष्य में होने वाली बातचीत और समझौते के लागू होने की प्रगति से जुड़े हुए हैं. जैसे-जैसे दोनों देश आगे बढ़ेंगे और शर्तों का पालन करेंगे, वैसे-वैसे ही इन मुद्दों पर कोई ठोस फैसला लिया जाएगा.
ये समझौता किसी अंतिम फैसले के बजाय आगे की बातचीत की बस एक शुरुआत है.
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