अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए ठप करने के लिए एक भयावह 'टू-फेज' (दो चरणों में) सैन्य योजना पर विचार कर रहे हैं.
यह योजना न केवल ईरान को परमाणु समझौते के लिए मजबूर करने के लिए है, बल्कि इसके विफल होने पर तेहरान की सत्ता पलटने (Regime Change) का संकेत भी दे रही है.
पहला चरण सीमित एयर स्ट्राइक का होगा, जिसका उद्देश्य ईरान को परमाणु समझौते (न्यूक्लियर डील) पर झुकने के लिए मजबूर करना है. यदि तेहरान इसके बावजूद अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को बंद नहीं करता तो अमेरिका व्यापक सैन्य अभियान शुरू कर सकता है.
पहला चरण: चेतावनी वाली एयर स्ट्राइक
योजना के पहले चरण के तहत, अमेरिका ईरान के कुछ चुनिंदा सैन्य ठिकानों या सरकारी केंद्रों पर 'सीमित हवाई हमले' (Limited Strike) कर सकता है. इसका मुख्य उद्देश्य ईरान को यह संदेश देना है कि ट्रंप की मांगें केवल मौखिक धमकियां नहीं हैं. सूत्रों के अनुसार, यह हमला अगले कुछ दिनों के भीतर ही हो सकता है.
ट्रंप चाहते हैं कि ईरान अपना सारा संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) देश से बाहर भेजे और लंबी दूरी की मिसाइलों के भंडार को सीमित करे. इसके अलावा ट्रंप चाहते हैं कि ईरान हिज़्बुल्लाह व हूती जैसे समूहों को समर्थन बंद करे.
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दूसरा चरण: व्यापक सैन्य अभियान और सत्ता परिवर्तन
यदि पहले चरण के बाद भी ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और वहां की सरकार नहीं झुकती है, तो ट्रंप दूसरे चरण को हरी झंडी देंगे. यह एक 'ब्रॉड कैंपेन' होगा, जिसमें ईरान की पूरी सैन्य मशीनरी और शासन सुविधाओं को निशाना बनाया जाएगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार ट्रंप का लक्ष्य केवल परमाणु ठिकानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 1979 की क्रांति के बाद से अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहे ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने का होगा.
पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दी है. 100 से अधिक लड़ाकू विमान, दर्जनभर युद्धपोत और दो एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप- यूएसएस गेराल्ड फोर्ड और यूएसएस अब्राहम लिंकन क्षेत्र में तैनात किए गए हैं. इनकी तैनाती के बाद इलाके में अमेरिकी सैनिकों की संख्या करीब 40,000 तक पहुंच सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह सैन्य जमावड़ा कई हफ्तों तक चलने वाले अभियान के लिए पर्याप्त है.
अगले कुछ दिन बेहद अहम
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह शक्ति प्रदर्शन महज एक ‘नेगोशिएशन टैक्टिक’ है या ट्रंप प्रशासन वास्तव में तेहरान शासन को अस्थिर करने की दिशा में बढ़ रहा है. जानकारों का कहना है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान का मौजूदा शासन शायद अपने सबसे कमजोर दौर में है.
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हाल ही में व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में शीर्ष सलाहकारों के साथ बैठक के बाद ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' की बैठक में संकेत दिया कि अगले 10 से 15 दिनों में दुनिया को पता चल जाएगा कि क्या होने वाला है. ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "उन्हें (ईरान को) समझौता करना ही होगा, वरना बहुत बुरा होगा." ईरान की ओर से अभी तक ट्रंप की शर्तों पर सहमति नहीं दी गई है. जिनेवा में हालिया वार्ता के बाद ईरान अगले दो हफ्तों में एक नया लिखित प्रस्ताव देने की तैयारी में है.
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