ढाका यूनिवर्सिटी के हॉल का नजारा इन दिनों बदला बदला दिखा रहा है. जिस हॉल के म्यूजियम में बांग्लादेश की आज़ादी के नेता शेख मुजीबुर रहमान की बड़ी बड़ी तस्वीरें टंगी थीं अब वहां पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरें लगा दी गईं. ये कहानी ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट यूनियन के म्यूजियम की है. इन बदलावों के पीछे इस्लामी छात्र शिविर का हाथ है.
दरअसल ढाका यूनिवर्सिटी का नेतृत्व एक ऐसा संगठन करता है जिसे 'इस्लामी छात्र शिविर' का समर्थन हासिल है, जो बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का छात्र विंग है. कट्टर विचारधारा के लिए चर्चा में रहने वाले 'इस्लामी छात्र शिविर' ने बांग्लादेश से शेख हसीना की सत्ता खत्म होने के बाद वहां कई बदलाव के किए हैं.
बांग्लादेश के समाचार पत्र 'प्रथम आलो' और 'बीडीन्यूज24' की रिपोर्ट के अनुसार, DUCSU म्यूज़ियम की मरम्मत का काम चल रहा था. रविवार को DUCSU की 'लिबरेशन वॉर एंड मास मूवमेंट्स' मामलों की सेक्रेटरी फ़ातिमा तसनीम जुमा ने इसे जनता के लिए खोला. म्यूज़ियम के फिर से खुलने के मौके पर वाइस-प्रेसिडेंट शादिक कायम, जनरल सेक्रेटरी एसएम फरहाद और DUCSU के अन्य प्रतिनिधि भी मौजूद थे.
बता दें कि DUCSU का नेतृत्व अभी 'यूनाइटेड स्टूडेंट्स अलायंस' कर रहा है. यह छात्रों का एक ऐसा संगठन है जिसे जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 'बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर' का समर्थन हासिल है.
बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान अक्सर उन लोगों के निशाने पर रहे हैं जो शेख हसीना की अगुवाई वाली अवामी लीग सरकार के विरोधी थे. जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान हसीना के सत्ता से हटने के बाद, पूरे बांग्लादेश में मुजीबुर रहमान की कई मूर्तियों को तोड़ा-फोड़ा या नष्ट कर दिया गया.
मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपति कार्यालय से मुजीबुर रहमान की तस्वीर भी हटा दी और देश के करेंसी नोटों से उनकी तस्वीर हटाने के लिए कदम उठाए.
हालांकि मुजीब की तस्वीरों की जगह जिन्ना की तस्वीरें लगाना यह दिखाता है कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है.
DUCSU के नए बने म्यूज़ियम में अब शेख मुजीब की वे खास तस्वीरें नहीं दिखाई जा रही हैं, जिनमें बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में उनकी भूमिका को दिखाया गया था.
'प्रथम आलो' की रिपोर्ट के अनुसार इनमें 1952 के भाषा आंदोलन, 1954 के यूनाइटेड फ्रंट चुनाव, 1966 के छह-सूत्रीय आंदोलन, 1968 के अगरतला षड्यंत्र मामले, 1969 के जन-विद्रोह, 1970 के आम चुनाव और शेख मुजीब के 7 मार्च, 1971 के ऐतिहासिक भाषण से जुड़ी तस्वीरें शामिल थीं, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश की वास्तविक आज़ादी की घोषणा की थी.
वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की कम से कम तीन तस्वीरें लगाई गई थीं. इनमें उन्हें 21 मार्च, 1948 को उर्दू को पाकिस्तान की एकमात्र राजकीय भाषा घोषित करने का भाषण देते हुए, 1940 में लाहौर में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग सम्मेलन में और 1970 के चुनाव पर 'डॉन' अखबार की रिपोर्ट में दिखाया गया था.
'प्रोथोम आलो' की रिपोर्ट के मुताबिक, DUCSU की अधिकारी फातिमा तस्नीम जुमा ने कहा कि 5 अगस्त, 2024 के बाद, "फासीवाद के प्रतीक" माने जाने वाले लोगों की तस्वीरें हटा दी गईं.
जुमा ने आगे कहा कि जिन्ना की तस्वीरें ऐतिहासिक घटनाओं को दर्ज करने के लिए शामिल की गई थीं, न कि उन्हें महिमामंडित करने के लिए. हालांकि, DUCSU के एक कर्मचारी ने बीडीन्यूज24 को बताया कि 2025 के DUCSU चुनाव से पहले शेख मुजीब की कई तस्वीरें मौजूद थीं, लेकिन यूनाइटेड स्टूडेंट्स अलायंस और इस्लामी छात्र शिबिर के यूनियन पर कब्ज़ा करने के बाद उन्हें हटा दिया गया.
जिन्ना की तस्वीरों का विरोध
ढाका यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों को शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीरों की जगह मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरें लगाना पसंद नहीं आया. सोमवार दोपहर अबू तैयब हबिलदार नाम के एक छात्र ने म्यूज़ियम में घुसकर जिन्ना की तीन तस्वीरें फाड़ दीं.
पत्रकारों से बात करते हुए तैयब ने कहा कि जिन्ना ने बंगाली भाषा का विरोध किया था और 1948 में ढाका यूनिवर्सिटी के कर्ज़न हॉल में छात्रों की गिरफ्तारी का आदेश दिया था, उसके लिए DUCSU म्यूज़ियम में कोई जगह नहीं है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या जिन्ना का महिमामंडन करना DUCSU चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा था और बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर पर विवादित हस्तियों को बढ़ावा देने की कोशिश करने का आरोप लगाया. सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की छात्र शाखा, बांग्लादेश जातीयतावादी छात्र दल ने भी जिन्ना की तस्वीरें लगाए जाने की निंदा की.
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