अब 'आंसुओं का दरवाजा' भी बंद, ईरान के 'दोस्त' का ये कदम कैसे देगा ट्रंप को नया सिरदर्द

होर्मुज के बाद अब बाब-अल-मंदेब भी संकट के घेरे में है. हूतियों के दावों और तेल टैंकरों के रास्ता बदलने से मिडिल ईस्ट युद्ध का दूसरा मोर्चा लगभग खुल चुका है. इसका असर सिर्फ तेल सप्लाई पर नहीं, बल्कि अमेरिकी सैन्य रणनीति पर भी पड़ सकता है, क्योंकि अब वॉशिंगटन को एक साथ ईरान और हूतियों दोनों से निपटना पड़ सकता है.

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बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो ग्लोबल तेल सप्लाई का अतिरिक्त 7% हिस्सा बाधित होगा (फाइल फोटो) बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो ग्लोबल तेल सप्लाई का अतिरिक्त 7% हिस्सा बाधित होगा (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:31 PM IST

ईरान के सहयोगी हूतियों ने यमन के पास बाब अल-मंदेब जिसे 'आंसुओं का दरवाजा'' भी कहा जाता है, उसे बंद करने का दावा किया है. दावे में दम इसलिए है क्योंकि सऊदी अरब से तेल ला रहे दो टैंकर ने इस वजह से अपना रास्ता बदल लिया. आगे भी अगर ऐसा होता रहा तो ग्लोबल तेल सप्लाई का अतिरिक्त 7% हिस्सा बाधित हो सकता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की वजह से तेल-गैस सप्लाई पहले से ही प्रभावित है.

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यमन में मौजूद ईरान-समर्थक हूतियों के इस कदम से डोनाल्ड ट्रंप और उनकी सेना की चुनौतियां बढ़ने वाली हैं. अब ईरान युद्ध का दायरा काफी बढ़ेगा, जिसका सीधा दवाब अमेरिकी सेना पर भी पड़ेगा. क्योंकि मिडिल ईस्ट में उसे अब ईरान के साथ-साथ हूतियों से भी निपटना होगा.

नीचे दिए मैप से इसे समझें- इसमें लाल रंग का प्वाइंट यानबू पोर्ट है. पहले टैंकर्स को यहां से रेड सी के रास्ते होते हुए भारत आना था. लेकिन यमन में बैठे हूतियों की धमकियों की वजह से अब जहाजों ने यू-टर्न लिया. अब वे काहिरा (Cairo) के रास्ते से आएंगे.

फिलहाल तो सऊदी अरब (जहां पहले से अमेरिकी सेना बेस मौजूद हैं) ने वाशिंगटन से सैन्य सहायता नहीं मांगी है. लेकिन ट्रंप खुद मदद करने का ऑफर दे चुके हैं. सऊदी टैंकर्स के रास्ता बदलने के बाद ट्रंप ने कहा था कि अगर ऐसा कुछ होता है, तो हम उससे निपट लेंगे. हमने पहले भी हूतियों के साथ ऐसा किया है.

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हालांकि, एक्सपर्ट मानते हैं कि अमेरिकी सेना के लिए यह इतना आसान नहीं हो होगा.

हूतियों ने कठोर और फुर्तीले लड़ाकों के रूप में पहचान बनाई है, जिन्होंने सऊदी और अमेरिकी बमबारी अभियानों का सफलतापूर्वक सामना किया है. उनसे मुकाबला करने का मतलब होगा अमेरिकी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ डालना, जो पहले से ही ईरान से लड़ने और खाड़ी में ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी बनाए रखने पर केंद्रित हैं.

रॉयटर्स से बात करते हुए पेंटागन के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जेसन कैंपबेल ने कहा कि ये क्षेत्र में अपने काफी मजबूत संसाधनों को दो सक्रिय मोर्चों के बीच बांटने जैसा होगा.

मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट से जुड़े कैंपबेल ने आगे कहा कि लाल सागर के खतरे से निपटने का मतलब अमेरिकी युद्धपोतों को खाड़ी से हटाकर यमन के करीब लाना होगा. जिससे उसका फोकस होर्मुज से हटेगा.

साथ ही अगर अमेरिकी नौसेना के जहाजों और विमानों को हूती ड्रोन और मिसाइलों को मार गिराना पड़ा, तो इससे अमेरिकी गोला-बारूद और वायु रक्षा इंटरसेप्टर के घटते भंडार की स्थिति और खराब हो सकती है, जिसके बारे में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है.

अमेरिका के लिए हूतियों से निपटना इतना भी आसान नहीं होगा, जितना ट्रंप समझ रहे. हूतियों पर सऊदी-नेतृत्व वाले अरब गठबंधन ने वर्षों बमबारी की थी. लेकिन यमन के बड़े हिस्से पर कंट्रोल रखने वाले हूती पीछे नहीं हटे. हाल की अमेरिकी बमबारी भी हूतियों को खास नुकसान नहीं पहुंचा सकी थी.

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ट्रंप के पहले कार्यकाल में डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस (मिडिल ईस्ट) रहे माइकल मुलरोय ने कहा, 'हूतियों ने अतीत में कई बार साबित किया है कि उनमें लाल सागर और बाब अल-मंडेब स्ट्रेट में समुद्री यातायात को बाधित करने की क्षमता और इच्छाशक्ति है.'

बीते दो साल से हूती यमन के तट के पास अमेरिकी युद्धपोतों और कमर्शियल जहाजों पर हमले कर रहे थे. पलटवार में यूएस ने लाल सागर के रूट को खुला रखने के लिए हूतियों पर कई हमले किए थे. लेकिन हूतियों को खास नुकसान नहीं हुआ. उल्टा अमेरिका को दो एयरक्राफ्ट कैरियर, दूसरे युद्धपोत, फाइटर जेट और B-2 बॉम्बर जैसे एयरक्राफ्ट यहां लगाने पड़े, जिसमें खूब खर्चा हुआ.

अब यमन के लिए जिन-जिन चीजों की जरूरत पड़ सकती है, उनमें से कई अभी ईरान के साथ चल रहे तनाव/युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, एक अधिकारी ने कहा, 'हम पहले से ही काफी व्यस्त हैं.' उन्होंने बताया कि कुछ युद्धपोतों को सामान्य से ज़्यादा वक्त समुद्र में बिताना पड़ा है क्योंकि ऑपरेशन की रफ्तार बहुत तेज रही है - पहले कैरिबियन में और अब मिडिल ईस्ट में. उम्मीद से ज्यादा तैनाती से सर्विस मेंबर्स पर दबाव पड़ता है. साथ ही जहाजों को मेंटेनेंस के लिए बंदरगाह लौटना ही पड़ता है.

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अभी मिडिल ईस्ट में 20 से ज्यादा अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत और सैकड़ों अमेरिकी सैन्य विमान काम कर रहे हैं. 

अब यमन के पास होने वाले किसी संघर्ष का सीधा असर होगा. अधिकारियों का कहना है कि इसके लिए भारी नौसैनिक और हवाई संसाधनों की जरूरत होगी और अमेरिकी खुफिया संसाधनों का ध्यान भी बंट जाएगा, क्योंकि हूतियों की उन क्षमताओं का पता लगाना जरूरी होगा जो शायद पिछले साल के बाद से बदल गई हों.

सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के रिटायर्ड अमेरिकी मरीन ऑफिसर मार्क कैंसियन ने माना कि रेड सी में दूसरा मोर्चा खुलने से अमेरिकी नौसेना पर दबाव बढ़ेगा.

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि हूतियों को भी सप्लाई पाने में अपनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि ईरान - जो इस ग्रुप का मुख्य समर्थक रहा है - पर अभी नाकेबंदी (ब्लॉकेड) लागू है.

कैंसियन ने कहा, 'अमेरिका की नाकेबंदी 100% असरदार तो नहीं है, लेकिन यह काफी असरदार है. नतीजतन, हूतियों के लिए लंबे समय तक कोई अभियान जारी रखना मुश्किल हो सकता है.'

क्यों कहा जाता है आंसुओं का दरवाजा

Bab el-Mandeb का अरबी में अर्थ है आंसुओं का दरवाजा (Gate of Tears). खतरनाक समुद्री रास्ते की वजह से यहां कई जहाज डूब जाते थे. इन हादसों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती थी, इसलिए इसे 'आंसुओं का दरवाजा' कहा जाने लगा. दूसरा किस्सा ये है कि बहुत पहले एक बड़े भूकंप ने अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप को अलग कर दिया. इसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, इसलिए इस जगह का नाम Gate of Tears पड़ गया.

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