ऋतब्रत-संदीपन साहा... दो नेता जिन्होंने ममता के हाथों से छीन लिया TMC का कंट्रोल

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने 15 साल तक सत्ता की कमान संभाली, लेकिन चुनाव हारते ही टीएमसी में बगावत शुरू हो गई है. ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित करना ममता बनर्जी के लिए सियासी तौर पर महंगा पड़ रहा है, क्योंकि इन्हीं दोनों नेताओं ने खुलकर बिगुल फूंक दिया है.

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संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी बन रहे बंगाल के शिंदे (Photo-ITG) संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी बन रहे बंगाल के शिंदे (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 03 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा इस समय सबसे बड़े चर्चा के केंद्र बने हुए हैं. बीजेपी की लहर में टीएमसी से टिकट पर दोनों ही नेता विधायक बनने में सफल रहे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद से ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला. ममता बनर्जी ने इन दोनों विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया है, लेकिन अब यह एक्शन ममता बनर्जी पर ही भारी पड़ रहा है. 

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ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने टीएमसी में बगावत का बिगुल ऐसा फूंका की ममता बनर्जी को पैरे तले से जमीन खिसक गई. टीएमसी के 80 में से 59 विधायकों का समर्थन ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को मिल रहा है. 

टीएमसी के करीब 59 विधायकों ने हस्ताक्षर करके विधानसभा स्पीकर से मांग की है, नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी को बनाया जाए. इससे साफ है कि टीएमसी अब टूट की कगार पर खड़ी है. ऐसे में सवाल उठता है कि ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा कौन है, जिन्होंने ममता बनर्जी का तख्तापलट करने की पटकथा लिख दी है. 
 

ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं? 
टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा और नाटकीय रहा है। वे बंगाल की राजनीति के उन चेहरों में से हैं जिन्होंने बहुत कम उम्र में बड़ी सफलताएं देखीं. कोलकाता के आशुतोष कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़े ऋतब्रत ने 2000 के दशक की शुरुआत में माकपा की छात्र शाखा SFI के जरिए राजनीति में कदम रखा. वे लगभग 8 साल तक SFI के राष्ट्रीय महासचिव रहे और वामपंथ के युवा नेता माने जाते थे. 

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साल 2014 में महज 34 साल की उम्र में माकपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा, हालांकि, 2017 में पार्टी की विचारधारा के विपरीत आलीशान जीवनशैली (जैसे एप्पल वॉच और महंगे पेन का विवाद) और शीर्ष नेतृत्व (प्रकाश करात, बृंदा करात और मोहम्मद सलीम) के खिलाफ बयानबाजी के कारण उन्हें माकपा से निष्कासित कर दिया गया. 

लेफ्ट से टीएमसी से आए थे

माकपा से निकलने के बाद उन्होंने पाला बदला और ममता बनर्जी को असली वामपंथी बताते हुए तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया. टीएमसी ने उन्हें अपने ट्रेड यूनियन विंग का प्रदेश अध्यक्ष बनाया, साल 2024 में जवाहर सरकार के इस्तीफे के बाद TMC ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा.

साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वे उलुबेरिया पूर्व सीट से TMC के टिकट पर विधायक चुने गए, लेकिन विधायक बनने के तुरंत बाद, दिल्ली के बंग भवन में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से उनकी मुलाकात किया. इसके बाद ही ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था, लेकिन अब ऋतब्रत बनर्जी अब टीएमसी के विधायकों का समर्थन हासिल करके पार्टी पर अपना कन्ट्रोल जमाना चाहते हैं. 

संदीपन साहा कौन है

टीएमसी के बागी विधायक संदीपन साहा का राजनीतिक सफर ऋतब्रत बनर्जी की तुलना में अधिक शांत, लेकिन सियासी तौर पर काफी मजबूत रहा है. संदीपन को सियासत विरासत में मिली है और वो रसूखदार राजनीतिक परिवार से आते हैं. संदीपन साहा कोलकाता के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक स्वर्ण कमल साहा के बेटे हैं.

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संदीपन साहा राजनीति में आने से पहले एक बिजनेसमैन रहे हैं, उन्होंने IIM कलकत्ता से पीजीडीएम (PGDM) की डिग्री हासिल की है और कुछ दिनों कॉरपोरेट में नौकरी करने के बाद अपना कारोबार शुरू किया. इसके बाद  उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कोलकाता नगर निगम में एक काउंसिलर (पार्षद) के रूप में की थी. वो धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए.

साहा 2026 के विधानसभा चुनाव में एंटाली विधानसभा सीट से टीएमसी के विधायक बने. उन्होंने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल को हराकर पहली बार विधानसभा में कदम रखा, लेकिन विधायक बनते ही संदीपन साहा ने ऋतब्रत बनर्जी के साथ हाथ मिला लिया. संदीपन साहा ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला, जिसके चलते ही ममता बनर्जी ने उन्हें तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया है. 

 

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