पिछले 15 सालों से पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस में अब अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिख रही है. हालात ऐसे हो गए हैं कि बंगाल में टीएमसी के 80 विधायकों को एक मंच पर लाना भी ममता बनर्जी के लिए मुश्किल होता जा रहा है. कभी ऐसा दौर था जब ममता बनर्जी की एक आवाज पर सभी विधायक एकजुट नजर आते थे, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है.
चुनाव हारने के बाद यह तीसरी बार हुआ है जब पार्टी प्रमुख की अपील के बावजूद बड़ी संख्या में विधायक बैठकों से दूर रहे. 6 मई को ममता बनर्जी ने जीतकर आए उम्मीदवारों की बैठक बुलाई थी. इस बैठक में 80 में से केवल 70 विधायक पहुंचे, जबकि 10 विधायक अनुपस्थित रहे. इस बैठक में नेता प्रतिपक्ष जैसे अहम पदों को लेकर चर्चा होनी थी.
हर बैठक में घटती गई विधायकों की संख्या
इसके बाद 19 मई को पार्टी की रणनीति तय करने के लिए एक और बैठक बुलाई गई. लेकिन इस बार 80 में से 35 विधायक गायब रहे. यानी सिर्फ 45 विधायक ही बैठक में पहुंचे.
फिर 31 मई को एक और बैठक आयोजित की गई. इस बार स्थिति और खराब रही. बैठक में केवल 20 विधायक पहुंचे, जबकि 60 विधायक अनुपस्थित रहे. पार्टी नेतृत्व को उम्मीद थी कि हार के बाद सभी विधायक एकजुट होकर साथ खड़े होंगे, लेकिन इसके उलट बैठकों में लगातार कम होती मौजूदगी ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं. दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के भीतर फूट पड़ चुकी है और कई नेता तथा विधायक अब पार्टी नेतृत्व से दूरी बनाने लगे हैं.
नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर बढ़ा विवाद
बैठकों से विधायकों की दूरी की एक बड़ी वजह पार्टी के भीतर मौजूद गुटबाजी को माना जा रहा है. लंबे समय से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के करीबी नेताओं को प्रमुख पद दिए जाने की परंपरा रही है. इस बार कई विधायकों की नाराजगी इस बात को लेकर सामने आई कि नेता प्रतिपक्ष के चयन में उनकी राय नहीं ली गई.
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अब तक पार्टी में ममता और अभिषेक बनर्जी की बात अंतिम मानी जाती थी, लेकिन चुनावी हार के बाद पहली बार विधायकों ने खुलकर असहमति जतानी शुरू कर दी.
फर्जी हस्ताक्षर विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें
विवाद की शुरुआत 6 मई की बैठक के बाद हुई. टीएमसी की ओर से विधानसभा सचिवालय को एक पत्र भेजा गया, जिसमें शोभन देव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने की जानकारी दी गई.
विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों के समर्थन वाला आधिकारिक पत्र मांगा. इसके बाद 13 मई को सांसद और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपने हस्ताक्षर वाला पत्र भेजा. हालांकि विधानसभा की ओर से फिर विधायकों की सहमति वाला पत्र मांगा गया.
19 मई की बैठक के बाद 70 विधायकों के समर्थन वाला पत्र तैयार किया गया, जबकि बैठक में केवल 45 विधायक ही मौजूद थे. इसके बाद कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि उनके नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर समर्थन पत्र भेजा गया.
विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई और जांच सीआईडी को सौंप दी गई. सीआईडी ने अभिषेक बनर्जी से जांच में सहयोग करने और समर्थन पत्र की मूल प्रति उपलब्ध कराने को कहा. जांच के सिलसिले में सीआईडी की टीम उनके घर भी पहुंची.
नेताओं के इस्तीफों ने बढ़ाई चिंता
टीएमसी के भीतर असंतोष सिर्फ विधायकों तक सीमित नहीं है. 24 मई को बारासात जिले की अध्यक्ष और टीएमसी सांसद डॉ. काकुली घोष दस्तेदार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार को अपनी नाराजगी की वजह बताया.
26 मई को राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी पार्टी के खिलाफ बयान देते हुए कहा कि बंगाल की जनता ने अराजकता का अंत कर दिया है.
इसके अगले दिन सांसद काकोली घोष टीएमसी के छह विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल होती नजर आईं. इसे बीजेपी के साथ बढ़ती नजदीकियों के तौर पर देखा गया.
दो विधायकों को पार्टी से निकाला गया
27 मई को टीएमसी विधायक रतव्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर कथित फर्जी हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र की शिकायत की. इसके बाद ममता बनर्जी ने दोनों विधायकों को पार्टी से बाहर कर दिया.
28 मई को टीएमसी नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन ने भी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया.
ममता ने बीजेपी पर लगाया दबाव बनाने का आरोप
इन घटनाओं के बीच ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि टीएमसी विधायकों पर दबाव बनाया जा रहा है. उनका कहना है कि पुलिस और बीजेपी के लोग विधायकों से संपर्क कर रहे हैं और उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए कहा जा रहा है.
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वहीं पार्टी नेतृत्व का कहना है कि यदि किसी विधायक को किसी प्रक्रिया पर आपत्ति थी तो उसे पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखना चाहिए था, न कि विधानसभा अध्यक्ष को. पार्टी का दावा है कि स्पीकर को शिकायत भेजना 'एंटी पार्टी एक्टिविटी' की श्रेणी में आता है.
टीएमसी के भीतर बढ़ती नाराजगी और लगातार सामने आ रहे विवादों ने यह साफ कर दिया है कि चुनावी हार के बाद पार्टी संगठन एक कठिन दौर से गुजर रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या पार्टी फिर से अपने विधायकों को एकजुट कर पाती है.
आजतक ब्यूरो