आंखों देखी: शांतिपूर्ण मार्च से हिंसक झड़प तक... उपद्रवियों ने कैसे हाईजैक की कोलकाता की छात्र रैली?

कोलकाता में भी शिक्षा प्रणाली सुधार और नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन हुए. इस दौरान उपद्रवियों ने जुलूस को हाईजैक कर लिया था और हिंसा भड़का दी थी. पुलिस के नियंत्रण से बाहर भीड़ ने आंदोलन में जमकर हंगामा किया. पत्रकारों पर भी निशाना बनाकर हमले किए गए थे.

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प्रदर्शन में पत्रकारों को पर भी हमले किए गए. (Photo- ITGD) प्रदर्शन में पत्रकारों को पर भी हमले किए गए. (Photo- ITGD)

तपस सेनगुप्ता

  • कोलकाता,
  • 26 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:01 PM IST

कोलकाता की सड़कों पर रविवार को जो हुआ, वो सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन को साजिश के तहत हिंसा में बदलने की जीती-जागती तस्वीर थी.

भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार, नीट (NEET) पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर वामपंथी छात्र संगठनों ने सियालदह रेलवे स्टेशन से 'महाजुलूस' का आह्वान किया था. हालांकि, कोलकाता पुलिस ने इस रैली को आधिकारिक अनुमति नहीं दी थी.

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इजाजत न मिलने के बावजूद सैकड़ों की संख्या में छात्र आदेश की अवहेलना करते हुए एस्प्लानेड की ओर बढ़ने लगे. मैं और वीडियो जर्नलिस्ट अर्घा घोष, दूसरे मीडियाकर्मियों के साथ इस पूरी कवरेज के लिए जुलूस के सबसे आगे चल रहे थे.

सियालदह से शुरुआत और संदिग्ध तत्वों की एंट्री

रैली शुरू होने के कुछ ही देर बाद हमने एक अजीब बदलाव देखा. राजा बाजार और एंटाली जैसे इलाकों से अचानक नए लोगों की भीड़ जुलूस में शामिल होने लगी. मौके पर मौजूद हमारे और बाकी पत्रकारों के ध्यान में तुरंत ये बात आई कि इनमें से कई लोग किसी भी एंगल से छात्र नहीं लग रहे थे. कई लोगों ने मास्क से अपने चेहरे ढक रखे थे और उनके कपड़े आम छात्रों से बिल्कुल अलग थे.

वो बहुत ही चालाकी से छात्रों के इस जुलूस में घुल-मिल गए. हालांकि छात्र आयोजकों ने इस बढ़ती भीड़ को देखा, लेकिन शुरुआती दौर में रैली का आकार बढ़ता देख उन्होंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

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मौलीली से एस्प्लानेड तक: बदला आंदोलन का रुख

जब जुलूस मौलीली क्रॉसिंग पर पहुंचा, तो उसी समय वहां से एक रथयात्रा निकल रही थी. मौलीली युवा केंद्र के सामने जुलूस को थोड़ी देर रोका गया. रथ यात्रा के गुजरने के बाद पुलिस ने रास्ता साफ किया और पूरे जुलूस को एस्प्लानेड की तरफ मोड़ दिया. रास्ते भर जमकर नारेबाजी हो रही थी. लेकिन जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ा, नारों का लहजा और माहौल ध्रुवीकृत होता दिखा.

आंदोलन का असल मकसद केंद्र सरकार की नीतियों और नीट पेपर लीक के खिलाफ था, लेकिन धीरे-धीरे ध्यान भटकने लगा. अब असल निशाना सरकार की नीतियां नहीं, बल्कि वहां मौजूद मीडियाकर्मी बनने लगे थे.

पार्क सर्कस, राजा बाजार और चांदनी जैसे कोलकाता के कई हिस्सों से भीड़ लगातार आती रही. जब ये जुलूस एस्प्लानेड के डोरीना क्रॉसिंग पर पहुंचा, तो पूरा रास्ता जाम हो चुका था. भीड़ इतनी ज्यादा बढ़ गई कि आयोजकों और पुलिस बल दोनों के कंट्रोल से बाहर हो गई.

रैली का 'हाईजैक' और उग्र होती भीड़

एस्प्लानेड पहुंचते ही माहौल पूरी तरह बिगड़ गया. भीड़ में घुसे अज्ञात लोग मीडियाकर्मियों के साथ गाली-गलौज करने लगे और देखते ही देखते हाथापाई पर उतर आए. वामपंथी छात्र संगठनों के मुख्य आयोजक केंद्र सरकार और मीडिया के खिलाफ नारे जरूर लगा रहे थे, लेकिन वो हिंसक नहीं थे। असली आक्रामकता और हिंसा उस दूसरे समूह की ओर से आ रही थी, जो गलियों के रास्ते जुलूस में शामिल हुआ था. उनकी पहचान भले ही साफ न हो, लेकिन कुछ लोग खुद को बचाने और पहचान छुपाने के लिए तिरंगे झंडे का सहारा ले रहे थे.

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प्रदर्शन के दौरान मैंने मौके पर मौजूद CJP के एक प्रतिनिधि से बात की. उन्होंने शामिल होने का कारण बताते हुए कहा, 'मैं व्यक्तिगत रूप से इस रैली में शामिल हुआ हूं. क्योंकि ये मुद्दा हमारे मूल्यों से मेल खाता है, इसलिए मुझे लगा कि सड़क पर आकर अपना समर्थन देना जरूरी है.'

मैंने वहां मौजूद एक SFI समर्थक से भी सवाल किया कि मीडियाकर्मियों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? उसने तुरंत इस हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा की. इसके बाद छात्र नेताओं ने माइक संभालकर भीड़ से अपील की कि वो कानून को हाथ में न लें, मीडियाकर्मियों से गाली-गलौज न करें और पुलिस पर हमला न करें.

लेकिन इन अपीलों का उग्र भीड़ पर कोई असर नहीं हुआ. उपद्रवियों के उस समूह ने पूरे आंदोलन को हाईजैक कर लिया था. एक वक्त ऐसा लगा कि कुल भीड़ में 70 फीसदी लोग गैर-छात्र घुसपैठिए थे, जिनका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना था.

पत्रकारों पर भी किए हमले 

माहौल जल्द ही हिंसक हो गया और उपद्रवियों ने मीडियाकर्मियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. महिला पत्रकारों को इसकी सबसे भारी कीमत चुकानी पड़ी. हमने अपनी आंखों से देखा कि एक महिला रिपोर्टर को 5 से 6 लोगों की हिंसक भीड़ घसीटकर ले जाने लगी. खतरा भांपकर आसपास के पत्रकारों ने शोर मचाया और आगे बढ़े, तब जाकर हमलावरों ने उन्हें छोड़ा.

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कई पुरुष पत्रकारों को बेरहमी से पीटा गया, जिससे उनके चेहरे पर गंभीर चोटें और कट आए. कम से कम 5 से 7 पत्रकार खून से लथपथ हो गए, जिन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा. 'आज तक बांग्ला' के संवाददाता राही हलदर के साथ ऑन-एयर लाइव रिपोर्टिंग के दौरान हाथापाई की गई. लाइव ब्रॉडकास्ट के दौरान उनका स्मार्टफोन छीन लिया गया, जो कैमरे में भी कैद हुआ. बाद में फोन बरामद कर पुलिस को सौंप दिया गया, जो अब मामले की जांच कर रही है.

हिंसा को भड़काने में कुछ डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स ने भी आग में घी डालने का काम किया. कुछ वामपंथी रुझान वाले इन्फ्लुएंसर्स लाइव स्ट्रीम के दौरान भीड़ को उकसाते दिखे. हमने देखा कि एक लोकप्रिय सोशल मीडिया क्रिएटर ने मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकारों की तरफ इशारा करते हुए उन्हें 'गोदी मीडिया' कहा और भीड़ को उन्हें अलग-थलग करने के लिए उकसाया. इस भड़काव के बाद भीड़ और उग्र हो गई और पत्रकारों के साथ बदसलूकी और लिंचिंग की कोशिशें होने लगीं.

यह भी पढ़ें: कोलकाता में सियासी बवाल! महिला पुलिसकर्मी को धक्का देने के आरोप में घिरीं ममता बनर्जी, वीडियो वायरल

दोपहर भर पुलिस ने संयम बनाए रखा. लेकिन जब पत्रकारों पर हमले बढ़े और कानून-व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ने लगी, तो पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा. पुलिस ने ज्यागा बल का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उग्र उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए नियंत्रित तरीके से पीछे धकेला. ड्यूटी पर तैनात मीडियाकर्मियों और पुलिस अधिकारियों की सुरक्षा के लिए गैर-छात्र तत्वों को वहां से हटाना बहुत जरूरी हो गया था.

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तनाव देर शाम तक जारी रहा. हालांकि, असली छात्र प्रदर्शनकारी बाद में शांतिपूर्वक चले गए, लेकिन हिंसा भड़काने वाले असामाजिक तत्व शहर में तबाही मचाने के बाद अंधेरे का फायदा उठाकर गायब हो गए.

मेरा आकलन

एजुकेशन सिस्टम में सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ एक जायज छात्र आंदोलन, आखिरकार राजनीतिक उपद्रवियों और असामाजिक तत्वों की भेंट चढ़ गया. छात्रों के मंच का राजनीतिक इस्तेमाल करके इन उपद्रवियों ने मुख्य मुद्दे से ध्यान भटका दिया और पुलिस-मीडिया पर हमले किए. ऐसा करके उन्होंने एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को हिंसक संघर्ष में बदल दिया और आंदोलन की मूल भावना को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया.

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